वैश्विक मंच पर ही नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर भी अब इस बात को बहुत गंभीरता से लिया जा रहा है कि दूसरी बार अमेरिका की कमान संभालने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आखिर आर्थिक, सामरिक, राजनयिक, कूटनीतिक से लेकर विश्व स्तर के तमाम मुद्दों और मसलों के साथ-साथ अमेरिका के स्थानीय विवादों को रह-रहकर बयानी हवा इस तरह क्यों दे रहे हैं कि उनकी छवि एक अस्थिर शासनकर्ता के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत होती जा रही है।
दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप ने जिस तेजी से ‘अमेरिका प्रथम’ को लक्ष्य करके नीतिगत निर्णय लेना शुरू किया, उससे कहीं न कहीं स्वयं अमेरिका में भी उहापोह की स्थिति निर्मित हो गई है। वीजा को लेकर ट्रंप ने कोहराम मचाया और अब वर्षभर से टैरिफ वॉर के भंवर में दुनिया को उलझाकर अमेरिका के हित में कौन-सा बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं, यह तो वही जानें, लेकिन इतना तय है कि कभी युद्ध रुकवाने के लिए विभिन्न देशों के बीच मध्यस्थता की लंबी-लंबी डींगे हांकने वाले ट्रंप न तो रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध रुकवा पाए और न ही ईरान, वेनेजुएला से लेकर ग्रीनलैंड तक के मामलों में उनकी स्थिति स्पष्ट हो पाई। इन सभी मुद्दों पर ट्रंप की भूमिका पूरी तरह विवादित हो चुकी है।
सौर ऊर्जा समूह से अचानक बाहर होने का ट्रंप का फैसला भी संपूर्ण अमेरिका की अस्थिरता को उजागर करता है। वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान को लेकर लगातार ट्रंप की बयानबाजी ने अमेरिकी घमंड को सबके सामने ला खड़ा किया है। इस बीच टैरिफ वॉर के माहौल में भारत की ओर से ट्रंप को दिए गए दो-टूक बयान ने कुछ हद तक स्थिति संभाली, लेकिन ट्रंप अपनी आदत से मजबूर नजर आते हैं।
अनेक देशों के बीच युद्ध रुकवाने, खत्म करवाने या मध्यस्थता की भूमिका निभाकर शांति का नोबेल पुरस्कार मुंह से मांगने वाले ट्रंप ने पूरे अमेरिका की चौधराहट को ही हास्यास्पद बना दिया है। फिर रूस और चीन को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोकने के नाम पर ट्रंप वहां भी कुछ न कुछ करने की इच्छा जता चुके हैं। वेनेजुएला में सारा खेल तेल भंडारों के लिए हुआ है। दुनिया इस पूरे घटनाक्रम को भविष्य में तीसरे विश्व युद्ध के खतरे की घंटी के रूप में देख रही है।
हालांकि ईरान ट्रंप के हर बार के दावों, आरोपों और चेतावनियों को न केवल उनके ही अंदाज में नजरअंदाज करता रहा है, बल्कि जवाब भी देता रहा है। ऐसे में भारत पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने का डोनाल्ड ट्रंप का निर्णय धरातल पर आकार लेता नजर नहीं आता, लेकिन इतना तो तय है कि व्यापार, कारोबार और कूटनीति को लेकर ट्रंप की बार-बार बदलती नीतियां दो विश्वसनीय मित्र देशों के बीच कहीं न कहीं एक गहरी और भयावह खाई पैदा करने का कारण बन रही हैं।
इसका आगे-पीछे अमेरिकी हितों की तुला पर विश्लेषण करते हुए दोनों देशों के पेशेवर नागरिक विचलित होते नजर आ रहे हैं। हालांकि सौर ऊर्जा समूह से बाहर निकलने के बाद अब अमेरिका ‘पैक्स सिलिका समूह’ में भारत को शामिल करने का हाथ बढ़ा चुका है। एक ओर अमेरिका ट्रेड डील से पहले दबाव बनाने की रणनीति के तहत भारत पर जबरन नियम थोपने की वैश्विक मंच से घोषणा करता है, तो दूसरी ओर अपने ही बयानों से पलटकर दोस्ती का हाथ भी बढ़ाता है। इससे स्थितियां और अधिक विकट होती जा रही हैं।
टैरिफ और बाजार में पहुंच को लेकर भारत-अमेरिका के बीच मतभेद अब स्पष्ट रूप से सामने आ चुके हैं। भारत अपनी सीमाओं और मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे समझौतों की शर्तों को दरकिनार कर चुका है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और सिंगापुर जैसे सदस्य देशों वाले पैक्स सिलिका समूह जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है में भारत शामिल होता है या नहीं। खासकर तब, जब यह समूह नया है और भारत 500 प्रतिशत टैरिफ जैसे बयानों को पहले ही खारिज कर चुका है।
इन सभी परिस्थितियों में भारत, ईरान, वेनेजुएला और रूस से चौतरफा विवादों की आग को हवा देकर अमेरिका आखिर हासिल क्या करना चाहता है?