पंचकोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिर:।
तत्र पिण्डप्रदानेन तृप्तिर्भवति शाश्वती।। (गरुड़पुराण)
यह तो सच है ही कि जीवित देवी-देवता हमारे माता-पिता ही हैं। उनकी जीवित रहते ही सेवा करनी चाहिए। श्राद्ध ऐसा विधान है, जिससे हमारी भावी पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों का सम्मान करना सीखती है। अच्छी संतान जीवित रहते और मृत्यु के बाद भी अपने बुजुर्गों का आदर सम्मान करती है। अपने बुजुर्गों को स्मरण करने के लिए सनातन धर्म में हर महीने की अमावस्या तिथि है और 15 या 16 दिन चलने वाला श्राद्ध या महालय पर्व है। भाद्रपद पूर्णिमा से चलने वाला महालय पर्व सर्वपितृ अमावस्या के दिन समाप्त हो जाता है। जिनको अपने-अपने पूर्वजों की तिथि पंचांग के अनुसार याद नहीं है, वे सर्वपितृ अमावस्या को ही श्राद्ध करें। ध्यान रहें धन होने पर श्राद्ध में कंजूसी न करें और धन के न होने पर सनातन धर्म के अमूल्य ग्रंथ विष्णु पुराण के अनुसार वन में या अपनी झोपड़ी में ही दोनों भुजाओं को उठाकर कहें-‘मेरे प्रिय पितरों, मेरा प्रणाम स्वीकार करें। मेरे पास श्राद्ध के योग्य न तो धन है, न सामग्री। आप मेरी भक्ति से ही लाभ प्राप्त करें।' यहां कम से कम जल तो जरूर ही अर्पित करें। माना जाता है कि श्राद्ध न करने पर पितर अपने वंशजों को शाप देकर लौट जाते हैं और इसी कारण भविष्य में होने वाली संतानों की कुंडली में पितृदोष आदि देखने में आते हैं।
फोटो - डी डी पांडेय
मत्स्यपुराण में लिखा है-
अहोत्र मुहूर्ता विख्याता देश पच्चं च सर्वदा।
तस्याष्टमो मुहूतार् य: स काल: कुतप: स्मृत:॥
ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे, उस समय उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई। गया असुरों की संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था, इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी। वह सभी देवताओं का सम्मान और आराधना करता था। उसके मन में एक बात खटक रही थी। वह सोचा करता था कि भले ही मेरा स्वभाव संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिल पायेगा। इसलिए क्यों न अच्छे कर्मो से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग प्राप्ति हो। गयासुर ने कठोर तप करके भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया। भगवान ने गयासुर वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा। भगवन आप मेरे शरीर में वास करें, जो मुझे देखे तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं। वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में भी स्थान मिले।
भगवान श्री हरी से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा। जो भी उसे देख लेता उसके सभी पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता। गयासुर के इस कर्म से यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई, कोई भी घोर पापी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाते। यमराज उसके कर्मो के अनुसार उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता। धर्मराज को कर्मो का हिसाब रखने में संकट हो गया था। यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को अभी न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उनके कर्मो के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है। पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोगने लगते है।
ब्रह्माजी ने उसी समय उपाय निकाला, उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे अधिक पवित्र है इसलिए मैं तुम्हारी पीठ पर बैठकर सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा। उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गयासुर सहर्ष तैयार हो गया। ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ एक पत्थर से गयासुर को दबाकर बैठ गए। इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ और वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था। देवताओं को चिंता हुई, उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे भगवान श्री विष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्री हरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा। तब श्री हरि भी उसके शरीर पर आकर बैठ गये।
भगवान श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा- आप सब देवता और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं, सभी जगह घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा। लेकिन मुझे श्री हरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्री हरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें। भगवान श्री हरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए, उन्होंने गयासुर से कहा अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो।
गयासुर ने कहा- ” हे नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए।” भगवान श्री विष्णु ने कहा- गया तुम धन्य हो, तुमने जीवित अवस्था में भी लोगों के कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो। तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं।
तब भगवान श्री हरि ने आशीर्वाद दिया कि जहां गया स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। और इस क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गया नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा। मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा। गया तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा। और साथ ही वहा भगवान “श्री विष्णुजी ने अपने पैर का निशान स्थापित किया जो आज भी वहा के मंदिर मे स्थित हे। गया विधि के अनुसार श्राद्ध फल्गू नदी के तट पर विष्णु पद मंदिर में व अक्षयवट के नीचे किया जाता है। वह स्थान बिहार के गया में हुआ जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता है।
‘गयासिर’ जिसे ‘फल्गुतीर्थ’ भी कहते हैं, यहां पिण्डदान करने से पितरों को शाश्वत तृप्ति व परमगति प्राप्त होती है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ, समुद्र और सरोवर हैं, वे सभी प्रतिदिन एक बार फल्गुतीर्थ आते हैं। फल्गुनदी के किनारे विष्णुपाद मन्दिर में एक शिला पर भगवान विष्णु के चरण हैं जो गयासुर के हिलते हुए शरीर को स्थिर करने के लिए भगवान विष्णु ने गयासुर की छाती पर रखे थे। ये ‘धर्मशिला’ के नाम से जाने जाते हैं। मंदिर परिसर में एक बरगद का वृक्ष है जिसे ‘अक्षयवट’ कहा जाता है, इस वृक्ष के नीचे मृतकों के अंतिम संस्कार की रस्में की जाती हैं। अक्षयवटतीर्थ में पितरों के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है।
प्रेतशिलातीर्थ–जिन बन्धु-बांधवों को प्रेतयोनि प्राप्त हो गई है, उनका यहां श्राद्ध करने से पितृगण प्रेतभाव से मुक्त हो जाते हैं।
मकर-संक्रान्ति, चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण के समय गयातीर्थ में जाकर पिण्डदान करने का दुर्लभ फल मिलता है। गयातीर्थ में श्राद्ध करने से मनुष्य के पंचमहापापों का नाश हो जाता है।
अस्वाभाविक मृत्यु वाले जीवों की गयातीर्थ में मुक्ति–
जिनका मृत्यु के बाद (शव न मिलने से) संस्कार नहीं हो पाता है, जो मनुष्य पशुओं द्वारा मारे जाते हैं, जिन मनुष्यों की चोर-डकैतों द्वारा हत्या हो जाती है, जिनकी मृत्यु सर्प के काटने से होती है। उन सभी का गया में श्राद्ध करने से वे मुक्त होकर स्वर्ग चले जाते हैं उनकी सद्गति हो जाती है।