हमारे परिवार में एक समारोह था। मेरे भाइयों का आग्रह था कि मैं अपने पूरे परिवार सहित गाँव में आयोजित समारोह में सम्मिलित होऊँ। वैसे भी मुझसे बच्चे पूछते ही रहते हैं, ‘‘दादी, आपका गाँव कैसा था?, या नानी आपका स्कूल कैसा था? आप तो खूब बात करती हैं गाँव की, अपने गाँव ले चलिए ना, हम आपके गाँव जरूर चलेंगे।’’ मुझे अच्छा लगा कि बच्चों की मेरे गाँव में इतनी अधिक रुचि है, कि वे वहाँ के तेज घाम, गरमी, और धूल-धस्सड़ से भी नहीं डर रहे हैं।
हम सब गाँव पहुँच गए। छोटी नातिन को ज़रा ज्यादा ही जिज्ञासा थी सब कुछ देखने की। घर पहुँचते ही कहने लगी, ‘‘चलो दादी, दिखाओ वो कुआँ, दिखाओ ना जहाँ आप बाल्टी भर-भर कर नहाती थीं।’’ मेरे भतीजे ने जाली हटा कर उसे कुआँ दिखा दिया। कहा अभी रात है, सुबह पूरा देख लेना। आजकल गाँव में नल आ गये हैं ना? कुआँ आवश्यकता पड़ने पर ही खोलते हैं।’’
दिन ज़रा जल्दी ही निकलता है गाँव में। सब मिलने जुलने वाले लोगों को मालूम हुआ कि मैं आई हुई हूँं। दो-चार घरों से बुलावा भी आया - ‘‘बुआ हमारे घर चहा (चाय) पीने आना या जीमने आना।’’ मैं बच्चों को लेकर पहले मंदिर गई। फिर नदी पर ले गई। हमारे साथ गाँव के दस-बारह बच्चों का एक पूरा टोल चलने लगा। मेरी बड़ी नातिन बोली, ‘‘नानी ये क्या है, पूरी भीड़ चल रही है। क्या इन बच्चों को कोई काम नहीं है? घर क्यों नहीं लौट रहे हैं?’’ मैंने कहा, ‘‘तुम ही इन बच्चों से पूछो।’’ उसने पूछा, ‘‘बच्चो तुम घर क्यों नहीं जाते, घर जाओ ना। कोई काम नहीं है क्या? हमारे पीछे ही घूम रहे हो?’’ बच्चों ने बड़े ही निर्मल मन और भोले भाव से कहा, ‘‘यही तो काम है, बुआ आई है, उनके पीछे घूमना।’’ मेरी नातिन बड़ी जोर से हँसी और बोली, ‘‘अरे वाह! इनके पास समय ही समय है!’’
मैं बच्चों को अपने पुराने घर ले गई, जो अब जीर्ण-शीर्ण होकर टूट रहा था। फिर जहाँ से बुलावा आया था, वहाँ ले गई। सब दूर बच्चों को आनन्द आया। वे गाय-बछुड़ा-बकरी से, तो कहीं कुएँ की पानी खींचने वाली घिर्री से खेले। फिर मैं भागा माँय के घर पहुँची। नब्बे साल की उमर में भी उनके आँख-कान-आवाज़ सब दुरूस्त थे, मात्र पैर के घुटनों में तकलीफ़ थी, इसलिए वेे बैठे-बैठे काम कर लेती हैं।
मेरी आवाज़ सुनते ही वे बहुत खुश हुईं और मुझे गले से लगा लिया। पीठ पर हाथ फेरा, फिर मेरे नाती-पोतियों को गोदी में लेकर चूमा दिया। बच्चों को अच्छा भी लग रहा था और संकोच भी हो रहा था कि ‘यह क्या तरीका है प्यार करने का’। तभी हमारे आस-पास खड़े आठ दस बच्चों के टोल में से उन्होंने किसी एक का नाम लेकर कहा- “कुसुमई, ज़रा चरु तो ला।’’ मेरी बड़ी नातिन ने धीरे से मेरा हाथ दबाते हुए पूछा, ‘‘क्या आपके लिए चारा आ रहा है।’’
कुसुमई सुन्दर-सी चरु (लोटा) लेकर आ गई। वे बैठे-बैठे चूल्हे तक गईं। चूल्हे से कण्डे की राख की डली निकाली और देखते ही देखते चरु को चमका दिया। और फिर चरु पर फूँक मारने लगी, ताकि उसकी पूरी राख निकल जाय।’’ बच्चों के लिए यह सब बड़ा दिलचस्प था। उन्होंने उस चरु को चूल्हे पर रखी दूध की दुतली में डाल कर भर लिया और बच्चों को कटोरियों में दूध दे दिया। नन्हे मुन्ने मेरे तरफ़ देखने लगे। मैंने उनसे कहा, ‘‘पी लो, यह अमृत है।’’ बाद में उन्होंने चरु भरी और मुझसे कहा- “इतना सब तू ही पी ले। बहुत दिनों से दुतली का दूध नहीं पिया होगा।’’ उनका चैका दूध-घी से महमहा रहा था। सब वहाँ से निकले, तो उन्होंने बच्चों को सिकी हुई मूँगफली दी। अब तक तो बच्चों ने ऐसी मुफ़्त में मिलने वाली मूँगफली नहीं देखी थी। वे बड़े खुश हुए। उनके आँगन में ही बहुत से गाय, बछड़े और भैंसें बँधी हुई खड़ी थीं। उन सब के आगे उनका नौकर चारा (घास) डाल रहा था। मेरी बड़ी नातिन बड़ी जोर से हँसी और बोली, ’‘अरे नानी, बच गए। मुझे तो लगा वे आपको बछुड़े जैसा प्यार कर रही थीं, तो आपके लिये चारा ही मँगवा रही होंगी। मुझे तसल्ली तब हुई, जब उन्होंने जिससे चरु मँगवाई थी, वह लोटा ले कर आई।’’
मैंने कहा, ‘‘बात तो सच है। तुम्हें चरु का अर्थ नहीं मालूम, पर मैंने भी तो तुम्हें कभी इस शब्द से परिचय नहीं कराया। सुनो चरु को लोटा, कलश्या, गड़ू भरत्या आदि भी कहते हैं।’’ बच्चे आपस में बात करने लगे।
मैं बताने लगी, चरु है ही बड़े काम की चीज़। हमारे घर में जब भी भोजन करने बैठते थे, तो अकेला ग्लास कभी भी नहीं रखते थे, पहले चरु और उसके साथ ग्लास रखा जाता था। चरु और गिल्लास की जोड़ हुआ करती थी। जब कोई सरकारी मोहकमे के लोग घर आते थे, तो ही उन्हें ग्लास में पानी देते थे। घर आए मेहमान को भी तब चरु भर कर ही पानी देते थे। चरु को दाहिने हाथ की हथेली पर रखकर बायें हाथ की हथेली को दाहिने हाथ की कोहनी से लगाकर, आदर सहित दिया जाता था। चरु को लेकर वे या तो मुँह में ऊपर से पानी डालते थे, या हाथ की ओक बनाकर पानी पीते थे। वे स्वयं पानी पीकर चरु को आगे बढ़ा देते थे। ब्याह-शादियों में भी हम जब पंगत जीमने जाते थे, तो घर से चरु भर कर ले जाते थे।
चरु की बनावट ऐसी होती है कि वह जहाँ भी उसे रखो वह ठीक से बैठ जाती है, लुड़कती नहीं। इसीलिये हमारे स्कूल में जब ‘लोटा दौड़’ टूर्नामैंट में होती थी, तो मैं ऐसी चरु ले जाती थी, कि जिसकी पेंदी का भाग गहरा और गोलाई लिये हो। कारण वह सिर पर रखी चोमल में अच्छे से फँसा रहता था। अतः तेज दौड़ने पर भी लोटा सिर पर से नीचे नहीं गिरता था। जहाँ तक लोटा-दौड़ की बात है, मंै जिला स्तर तक प्रथम ही आती रही। और उसी चरु लौटे से मेरे बाद भी मेरी छोटी बहनों ने लोटा-दौड़ जीती थी।
हमारे स्कूल में कोई विशिष्ट अतिथि आते थे, तो हम पानी से भरी चरु रखकर उसके स्वागत के लिए द्वार पर खड़े रहते थे। अतिथि महोदय प्रसन्न होकर उसमें ताँबे का धेला या पीतल की इकन्नी डालते थे। विवाह के अवसरों पर भी जब दूल्हा बरात लेकर दुलहन के द्वारा पर आता था, तब कुँवारी-कन्या जल से भरी चरु पर जल से भरी चरु रख कर वर के समक्ष खड़ी हो जाती थी। यह शुभमंगल का प्रतीक होता था। इसे ‘वर बेड़ा’ कहते हंै। ऊपर की चरु में दूल्हा मुद्रा डालता है।
चरु बड़े काम की चीज़ होती थी। हम लोग पर-गाँव या आस-पास रिश्तेदारी में या मेला-जत्रा में जाते थे, तो गाड़ी बैल से ही जाते थे। जाते समय गाड़ी में एक मज़बूत पतली रस्सी और एक बड़ी चरु ज़रूर रखते थे। जब प्यास लगती थी तो रास्तें में पड़ने वाले कुएँ के पास रुकते थे। गाड़ी में से चरु और रस्सी निकालते थे। बड़ी चरु में रस्सी बाँधकर उसे कुएँ में डालते थे। डुबुक-डुबुक की आवाज़ के साथ चरु भर जाती थी। ओक से कुएँ का ठण्डा पानी पीकर मुँह धोकर तृप्त होकर चरु को झोले में और रस्सी को गाड़ी की पेटी में वापस रख देते थे। तीर्थों में जाते थे तो गंगा-स्नान करते थे, नर्मदा स्नान करते थे और फिर चरु में जल भरकर देवी-देवताओं को स्नान करा देते थे।
गाँवों में तो पहले लोगों के यहाँ ग्लास यदा-कदा ही होते थे। सब कुछ चरु से ही होता था। नातिन ने पूछा, ‘‘नानी, तुम बताओ तुम्हारे गाँव में ही चरु बोलते है क्या लोटे को?’ मैंने कहा, नहीं, चरुवा बड़ा बर्तन होता है ताँबे का जिसमें पानी भरते हैं। और चरु छोटा बर्तन है जिससे पानी पीते हैं। लोटा, गड़ू कलश्या आदि कई नाम हैं चरु के। चरु तो ठेठ देशज शब्द है। यह बहु उपयोगी वस्तु है। गाँवों में सबके घर मही (मठा) नहीं होता, जिसके घर होता है, लोग उसके घर मही लेने जाते हैं, तो वे चरु ही लेकर जाते हंै। चरु ज्यादा सुविधाजनक होता है। अगर बगोने में दूध, मही ले जायँगे, तो दूध, मही छलकेगा। चरु की बनावट ऐसी होती है कि इसमें से तरल वस्तु, मही या दूध के छलक कर बाहर गिरने का भी भय नहीं रहता। और रही बात चरु की, तो तुलसी कृत श्री रामचरित मानस में तो उल्लेख है इस शब्द का कि जब राजा दशरथ ने पुत्र कामेष्टी यज्ञ किया था तो अग्नि देवता प्रकट हुए थे। उनके हाथ में खीर की चरु ही थी - ‘भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रकटे अगिनि चरु कर लीन्हें।’
जिस चरु में नीचे तली में काठे नहीं होते हंै, उसे भरत्या, बटुआ भी कहते हैं। इसमें दाल, चावल, खीर आदि पकाई जाती है। जो बिना पेंदी के लोटे होते हैं, वे ठीक से सीधे टिकते नहीं, वे किसी भी दिशा में लुढ़क जाते हैं। जो व्यक्ति अपनी बात पर मुक़र्रर या अडिग नहीं रहते हैं, बदल जाते हैं, ढुलमुल रहते हैं, ऐसे लागों को बिन पेंदी का लोटा कहते हैं। ऐसे लोगों को मुरादाबादी लोटा भी कहते थे। मुरादाबाद के लोटे बिना पेंदी के होते थे। पहले चरु घर की आवश्यकता और शान की वस्तु समझी जाती थी।
अब भी गाँव की गलियों में सब बच्चे मुझे घेरे हुए आगे पीछे चल रहे थे। मेरी बड़ी नातिन चरु की बातें सुनकर कुछ ज्यादा ही आनन्दित हो रही थी। मैंने कहा, ‘‘सुनो, अगर चरु का एक और रम्य स्वरूप न बताऊँ तो शायद चरु का आनन्दोमय महत्त्व अधूरा ही रहा जायगा। हमारे यहाँ गणगौर पर्व होता है ना! हम लोग पाती खेलने के लिए चरु ही ले जाते थे। हम सब सखियाँ बाड़ी के कुएँ पर अपनी-अपनी चरुओं को माँजकर इतनी चमका लेते थे मानों हमें किसी बड़ी स्पर्धा में जाना हो, फिर कुएँ से जल खींचकर उन्हें भर लेते थे। उन चरुओं के जल में नव आम्र-पल्लव, अकाव, दूर्वा, लाल-पीले कन्हेर आदि से बड़ी अभिरुचि से सजाकर विविध वर्णी पुष्पों के बीच कैरी (आम्रफल) जमा देते थे। उन चरुओं को गोलाकार जमाकर हम सखियाँ गणगौर के झालरिया गीत गा-गाकर उनकी परिक्रमा करते थे। वे चरु आस्था एवं श्रद्धा के अदभुत समागम लगते थे। पाँच झालरिया देकर उन कलशों को सिर पर रखकर जब गाँव में माता की बाड़ी में आते थे, तो ऐसा मनोरम नज़ारा लगता था मानो सिर पर चरु के रूप में देवी का देदिप्यमान रूप प्रकट हो रहा हो। चरुओं का ऐसा मनमोहक रूप कि आज भी आँखों में उनकी छटा विद्यमान है।
यह सब सुनकर मेरी नातिन बड़ी ज़ोर से हँसी और बोली, ‘‘वाह नानी! मान गए आपको और आपकी चरु-चर्चा को। अब मुझे भी लगने लगा है कि मैं भी चरु में ही पानी पीना प्रारंभ कर दूँ।’’