तकनीक और मानवता का द्वंद्वः एआई के विरोध से भारत को मिला भविष्य का संकेत
दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां तकनीक पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली है, लेकिन भरोसा पहले से कहीं अधिक नाजुक। हाल के महीनों में यही द्वंद्व उस समय सामने आया, जब वैश्विक ब्रांडों ने एआई से बने विज्ञापनों को जनता के सामने रखा और जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। यह विरोध केवल किसी एक ब्रांड या किसी एक प्रचार सामग्री के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध था, जिसमें यह मान लिया गया कि रचनात्मकता को भी मशीनों से बदला जा सकता है।
मैकडॉनल्ड्स और कोका-कोला जैसे विश्वव्यापी ब्रांडों ने जब एआई आधारित विज्ञापन जारी किए, तो उम्मीद थी कि तकनीक की चमक उपभोक्ताओं को आकर्षित करेगी, लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा। लोगों ने उन विज्ञापनों को ठंडा, भावहीन और आत्मा से खाली बताया।
उपभोक्ताओं को ऐसा महसूस हुआ मानो उनके सामने कोई कहानी नहीं, बल्कि किसी एल्गोरिदम की गणना प्रस्तुत कर दी गई हो। यह विरोध अचानक नहीं था, बल्कि उस गहरी थकान का संकेत था, जिसे दुनिया अब कृत्रिम कंटेंट से महसूस करने लगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई आज जिस स्तर पर है, वह बड़ी तेजी से दृश्य बना सकता है, शब्द गढ़ सकता है और ध्वनियां पैदा कर सकता है, लेकिन वह अनुभव नहीं जी सकता। वह दर्द नहीं जानता, खुशी महसूस नहीं करता और स्मृतियों की गर्मी को नहीं समझता।
जब विज्ञापन जैसे क्षेत्र में, जहां भावनात्मक जुड़ाव ही सबसे बड़ी पूंजी होता है, वहां एआई को अंतिम रचनाकार बना दिया जाता है, तो दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। यही कारण है कि एआई से बने कई विज्ञापनों को या तो हटाना पड़ा या सार्वजनिक आलोचना झेलनी पड़ी।
निजी क्षेत्र ने लगभग चौंतीस अरब डॉलर एआई में लगाए
यह संकट उस समय और गहरा हो जाता है, जब हम एआई पर हो रहे वैश्विक निवेश को देखते हैं। आज एआई में अरबों डॉलर झोंके जा रहे हैं। केवल वर्ष 2024 में ही दुनिया भर में निजी क्षेत्र ने लगभग चौंतीस अरब डॉलर एआई में निवेश किए। बड़ी तकनीकी कंपनियां, निवेश फंड और सरकारें सभी इसे भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति मानकर इस दौड़ में लगी हुई हैं। परंतु इस चमकदार निवेश कहानी के नीचे एक असहज सच्चाई छिपी हुई है।
एआई के क्षेत्र में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण
ऐसे समय में भारत की भूमिका असाधारण रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत को किसी दूसरे देश के एआई मॉडल की नकल नहीं करनी है। भारत का एआई भारत की संस्कृति, भाषाओं, जीवनशैली और मानवीय मूल्यों से जुड़ा होना चाहिए। यह केवल तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक उपयोगिता और विश्वास का निर्माण होना चाहिए।
भारत एक ऐसा देश है, जहां तकनीक केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवनरेखा होती है। यहां अस्पतालों की भीड़, किसानों की अनिश्चितता, शहरों का ट्रैफिक, मौसम की मार और संसाधनों की कमी रोजमर्रा की सच्चाइयां हैं। यदि एआई इन परिस्थितियों में काम कर सकता है, डॉक्टरों को बेहतर निर्णय लेने में मदद कर सकता है, किसानों को सही समय पर जानकारी दे सकता है और आपदाओं की पहले से चेतावनी दे सकता है, तो वही एआई दुनिया के किसी भी हिस्से में सफलतापूर्वक काम कर सकता है।
विभिन्न संस्थानों के अध्ययनों से यह सामने आया है कि एआई पर किए गए भारी निवेश के बावजूद अधिकांश कंपनियों को अभी तक कोई ठोस व्यावसायिक लाभ नहीं मिला है। करीब पचानवे प्रतिशत परियोजनाएं ऐसी हैं, जिनसे राजस्व या मुनाफे में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई। यानी पैसा तो लगाया जा रहा है, लेकिन भरोसेमंद कमाई का मॉडल अब तक तैयार नहीं हो पाया है। यह स्थिति किसी आर्थिक बुलबुले के बनने से पहले जैसी है, जहां उम्मीदें बहुत बड़ी होती हैं और जमीन बहुत कम।
रचनात्मकता के क्षेत्र में भारत के पास अनोखी विरासत
रचनात्मकता के क्षेत्र में भी भारत के पास एक अनोखी विरासत है। यहां कहानियां केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्मृति और संस्कार होती हैं। संगीत, सिनेमा और साहित्य में भावनाएं सांस लेती हैं। यदि एआई को यहां केवल सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जाए, न कि प्रतिस्थापन के रूप में, तो भारत दुनिया को यह दिखा सकता है कि तकनीक और संवेदना साथ-साथ चल सकती हैं।
दुनिया आज उस एआई से थकने लगी है, जो केवल दोहराता है, जो हर जगह एक जैसा दिखता है और जो आत्मा से खाली है। ऐसे समय में भारत के पास यह अवसर है कि वह एक अलग रास्ता दिखाए—ऐसा एआई जो मानव के लिए हो, मानव के साथ हो और मानव की तरह महसूस करने की कोशिश करे।
यह सिर्फ एक तकनीकी रणनीति नहीं है, बल्कि सभ्यता का चुनाव है। और शायद यही वह क्षण है, जब भारत इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली अपनी एक अलग डिजिटल पहचान गढ़ सकता है।
लोगों ने इन विज्ञापनों को भावहीन और आत्मा से खाली बताया।