अयोध्या सिर्फ आस्था का नहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना का प्रतीक

प्रणय यादव

Update: 2024-01-21 16:46 GMT

वेबडेस्क।  पूरे देश राममय है। रामभक्ति में सराबोर है। अयोध्या भी सजधज कर तैयार है। रामलला के स्वागत की पूरी तैयारी हो चुकी है। प्राणप्रतिष्ठा के अनुष्ठान भी अंतिम दौर में है। सरयू का तट मंरोच्चार की ध्वनि से गूंज रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्य यजमान है। 121 आधार्यों का समूह वैदिक परंपराओं के अनुसार कर्मकाड़ी में व्यस्त है। जहां इक्क्तीस साल पहले बाबरी ढांचा खाड़ा था, आज उसी जगह पर भव्य राममंदिर बनकर तैयार है। ये सांस्कृति राष्ट्रवाद का पुनर्जागरण का काल है। रामभक्ती का इसी तरह ज्वार 1990 में था। फिर 1992 में भी देश के वातावरण में रामनाम की गूंज थी। अब फिर वही भक्ति दिख रही है। लेकिन इक्कतीस साली में बहुत कुछ बदल गया।

तीस साल पहले अयोध्या युद्ध का प्रतीक बन गई थी। आपसी भाईचारे की दीवार बन गई थी। अयोध्या में सरयू का पानी मात्र था। लेकिन तीस सास के माहौल बिल्कुल अलग है। कही कोई टेंशन नहीं है। किसी तरह का गुस्सा या नाराजगी नहीं है। सरजू का जल शान्त है। माहौल में सिर्फ भक्ति है। हिन्दुओं के साथ बड़ी संख्या में मुस्लिम भी भगवान राम के लिए उपहार भेज रहे हैं। कोई चरण पादुका बना रहा है। कोई रामभजन गा रहा है। कोई पैदल चलकर अयोध्या पहुंचा रहा है। जो नहीं आ सकते वो अपने अपने इलाके में निकल रही प्रभात फेरियों पर फूल बरसा रहे हैं। बाबरी ढांचे के पैरोकार इकबाल अंसारी को भी न्योता मिला है। जो जिंदगी भर राम मंदिर निर्माण के विरोध में अदालतों में केस लड़े वो भी राममंदिर के उ‌द्घाटन में खुशी खुशी शामिल होने की बात कह रहे हैं। ये बहुत बड़ा बदलाव है।

ये गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है। अयोध्या अब भाईचारे, आपसी सदभाव और शक्ति पर भक्ति की जीत का प्रतीक बन रही है। ये सही है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हो रहा है। मंदिर का निर्माण श्रीराम जन्मभूमि तौर्य क्षेत्र ट्रस्ट करवा रहा है। रामभक्ती के चंदे से मिंदर बन रहा है। इसमें सरकार की भूमिका सिर्फ व्यवस्थाओं की है। लेकिन अयोध्या में सिर्फ राम मंदिर नहीं बन रहा है। पूरी अयोध्या का कायाकल्प हो गया है। अयोध्या का राजसी स्वरूप, रामलला की राजधानी का स्वरूप फिर वापस लौटा है। इसका श्रेय तो सरकार को ही जाएगा। पांच सौ साली के बाद रामलला फिर भव्य मंदिर में विराजेंगेष इसकी खुशी तो भक्तों में है। लेकिन दूसरा पक्ष में कोई नाराजगी नहीं है। बम की जगह फूल बरस रहे हैं। गोलियां नहीं प्रसाद के गोले मिल रहे हैं। इस बदलाव का श्रेय भी योगी आदित्यनाथ की सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सासन व्यवस्था को जाना चाहिए।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतीक अयोध्या अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण रामलला की प्राण प्रतिष्ठा सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं है। ये सिर्फ हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं है। अयोध्या अब गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति, सनातन की पुनस्र्स्थापना और सांस्कृतिक राष्ट्र‌वाद के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गई है। नरेन्द्र मोदी की सरकार पिछले दस साल में सबका साथ सबका विकास के मंत्र पर चली। लेकिन मोदी ने अपने कार्य से अपने व्यवहार से सनातन संस्कृति और भारत की गौरवशाली विरासत के प्रति गर्व करना सिखाया। इससे पहले की सरकारे, उसके मंत्री और नेता धर्म की बात करने से डरते थे। मंदिरों में जाने से कतराते थे। लेकिन मोदी ने अपनी आस्था को छुपाया नहीं। वो हर उस स्थान पर गए जिसका सनातन धर्म में महत्व है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक सभी एतिहासिक मठ मंदिरों का पुनर्डद्‌धार शुरू किया। अयोध्या में राम मंदिर के लिए प्रयत्न तो पांच सौ सालों से हो रहे थे। अयोध्या सियासत का केन्द्र बन गई थी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर का निर्माण बड़ा मु‌द्दा बन गया। और अयोध्या इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई।

आस्था और आर्थिक प्रगति का मॉडल अयोध्या नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ आस्था की बात नहीं की। आस्या को आर्थिक प्रगति से जोड़ा। और ये मॉडल ऐसा है जिसके फल होने की गुंजाइश बिल्कुल नहीं है। और इसमें किसी का कोई नुकसान भी नहीं है। आज से पांच साल पहले अयोध्या में क्या था। रामलना टेट में थे। हनुमान गादी, सीता रसोई, कनक भवन, कुछ पुराने मंदिर अखाड़े आश्रम और मरयू के पुराने टूटे-फूटे घाटा अयोध्या जाने के लिए मार तीन चार ट्रेनें यौ या फिर बस सेवा। लेकिन अब अयोध्या बदल गई है। पुरानी संकरी गलियों की जगह चौड़ी रोड है। अयोध्या हाईवे से जुड़ गई है। अयोध्या में इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। अन्तर्राष्ट्रीय स्ता की सुविधाओं वाला रेलवे स्टेशन है। पीक पौराही की रंगत बदल गई है। रोड के किनारे की सभी दुकाने एक जैसी बन गई है। भक्तों को पैदल चलने के लिए फुटपाथ है। सरयू के घाट नए चमचमाते घाट है। सरयू में सोलर वोट्‌स चल रही है। पूरी अयोध्या जगमग है। मोदी आदित्यनाथ का दावा है कि अगले कुछ सालों में अयोध्या की अर्थव्यवस्ता एक लाख करोड़ की होगी। और आज जो स्थिति है। उसमें ये आंकड़ा बढ़ा नहीं लगता। अयोध्या जाने वाले भक्तों की संख्या बढ़ेगी। ती दुकानदारों का आय बढ़ेगी। हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। संपन्नता अपने आप बढ़ेगी। ये सब कपोल कल्पना नहीं है। नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में देश के नौ बड़े मंदिरों का कायाकल्प हुआ है। काशी विश्वनाथ कॉरीडोर बना। इसके बनने से यहां पहुंचने वाले टूरिस्ट की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ। 2021 में हुए जीर्णोद्‌धार के बाद एक साल में 7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने करसी की यात्रा की। एक साल में काशी विश्वनाथ में दान पांच सौ परसेंट बढ़कर 100 करोड़ हो गया। फूली के कारोबार में चालीस परसेंट की बढ़ोतरी हुई। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में मंदिरों से कुल 1.34 लाख करोड़ की कमाई हुई. जो 2021 में 65 हजार लाख के आसपास थी। इन आंकड़ों से साफ है कि आस्था सिर्फ धर्म का मसला नहीं है। धार्मिक पर्यटन अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

अयोध्या और करशी तो सिर्फ बानगी है। सरकार ने चार धाम का विकास किया। वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर के आसपास कॉरीडोर बन रहा है। उज्जैन में माहाकाल लोक बन कर चुका है। सोमनाथ मंदिर के परिसर का सुंदरीकरण हो चुका है। द्वारिका में कॉरीडोर बन रहा है। झारखंड में देवघर धाम का कॉरीडोर बन गया है। गुजरात में पावागढ़ और अंबा जी मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका है। कोयम्बटूर में 112 फीट ऊधी भगवान आदियोगी शिव की प्रतिमा और हैदराबाद में 11 वीं शताब्दी के भक्ति संत रामानुजाचार्य की 216 फीट ऊंची स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी का अनावरण मोदी कर चुके हैं। हनुमानजी चार धाम परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल में बजरंगबली की धार विशाल प्रतिमाएं बनवाई जा रही हैं। महाराष्ट्र में संत तुकारम शिला मंदिर बन चुका है। अब संततुकाराम पालखी मार्ग बन रहा है। चित्रकूट में वनवासी रामपथ, दतिया में पीतांबरा पीठ कॉरिडोर, औरछा में रामराजा लॉक, और इंदौर में अहिल्या नगरीय लौक, महू का जानापाव, गुवाहाटी में कामाख्या मंदिर, कोल्हापुर में महालक्ष्मी तो नासिक से त्र्यंबकेश्वर तक कॉरिडोर बन रहा है।

अच्छी बात ये है कि सिर्फ मंदिरों का विकास नहीं हो रहा है। देवस्थानी तक पहुंचने के लिए हाईवेज भी बनाए जा रहे हैं। जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है। लोगों को रोजगार मिल रहा है। कलेक्टिविटी बेहतर हो रही है। जब किसी तीर्यस्थल का विकास होता है तो उसका असर उस पूरे इलाके पर पड़ता है। प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ती है। नई नई इंडस्ट्री लगती है। फूल का कारोबार, होटल का कारोबार, प्रसाद की दुकान, भोजनालय और कपड़ों से लेकर तमाम तरह के बिजनेस फलते फूमते हैं। इस वक्त हमारे देश में मंदिर की अर्थव्यवस्था करीब साढ़े तीन लाख करोड़ के आसपास है। जो देश के जीडीपी का करीब ढाई परसेंट है। देश में हर साल पर्यटन से होने वाली आमदनी का करीब 60 पररीट राजस्व धार्मिक पर्यटन से ही आता है। हमारे देश में तो धार्मिक यात्राओं की परंपरा रही है। ये सनातन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इसीलिए आदिशंकर ने देश के चार कोनों में चारधामों की स्थापना की। माघ मेला, कुभ मेला, गंगासागर सागर मैला ये सब धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से दुनिया के सामने उदाहरण पेश करते हैं। नरेन्द्र मोदी ने सनातन की इसी शक्ति को पहचाना। उन्होंने धर्म को विकास के साथ जोड़ा। और अब उसका असर दिख रहा है।

सियासत का अखाड़ा अयोध्या

चूंकि लोकसभा चुनाव में अब सिर्फ तौन महीने के वक्त बधा है। और इस समय रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का समारोह होना। नरेन्द्र मोदी का मुख्य बजमान होना। राममंदिर का उदघाटन करना। पूरे देश में रामभक्ति का ज्वार पैदा होना। जाहिर इससे बीजेपी का राजनीतिक फायदा होगा। बीजेपी ने बीएचपी और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के साथ मिलकर जिस तरह इस मौके को एक राष्ट्रीय उत्सव का स्वरूप दे दिया है। उसले कांग्रेस समेत सभी विरोधी दल पोशान है। राहुल गांधी, ममता बनजी, लालू खंदर, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, उद्‌धव ठाकरे, अरविन्द केजरीवाल जैसे तमाम नेता बीजेपी पर राम के नाम पर सियासत करने का इल्ज़ाम करने का इल्जाम लगा है। विरोधी दलों ने राममदिर के उद्‌घाटन समारोह का बॉ कॉट करने का फैसला किया है। उनका में फैसला कलहाड़ी पर पैर मारने जैसा है। कांगेस के नेता दावा करते हैं कि प्रभु राम की मूर्तिया कांग्रेस के जमाने में रखी गई, राममंदिर का ताला उन्ही के शासन में खुला, मंदिर के जमीन का अधिग्रहण उन्हीं के कार्यकान में हुआ। यानि एक तरफ तो वो राममंदिर का श्रेय लेने की कोशिश करते हैं दूसरी तरफ बीजेपी पर राम मंदिर के नाम पर सियासत का इल्जाम लगाकर प्राण प्रतिष्ठा के समारोह का बॉयकॉट करते है। ये भी तो सियासत का हिस्सा है। जहां तक सवाल नरेनेद्र मोदी की राजनीति का है। पुनावी रणनीति का है। तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि बीजेपी कोई सामाजिक संगठन तो नहीं है। राजनीतिक इन है। सता के लिए सियासत करती है। बाकी दूसरे राजनीतिक दल भी तो यही करते हैं। अगर कांग्रेस या केजरीवाल हनुमान चालीसा का पाठ कराते हैं। वो भी उसी तरह राजनीति का हिस्सा है। और अगर ये गलत नहीं है। तो फिर अगर बीजेपी राम मंदिर निर्माण का श्रेय ले रही है।

चुनाव में इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है इसमें गलत क्या है। अयोध्या का मु‌द्दा बड़ा चुनावी इश्यू होगा। और इसका बीजेपी को लाभ औ होगा। अगर विरोधी दलों के नेता राम मंदिर के उद्‌घाटन में शामिल होते रामलला की प्राणप्रतिष्ठा के समारोह के साक्षी बनते तो शायद यो भी बड़े नुकसान से बच जाते लेकिन अब उक्त निकल चुका है। अब विरोधी दलों के नेता अयोध्या या भगवान राम का नाम जितना ज्यादा लेगे, बीजेपी को जितना ज्यादा कोसँगे नुकसान उतना ज्यादा होगा।

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