राजमाता के साथ जाते थे चुनाव प्रचार करने
ग्वालियर/प्रशांत शर्मा। समय के साथ चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के साथ प्रचार के तौर तरीके भी बदल गए हैं, लेकिन चार दशक पहले चुनाव प्रचार में जाने वाले कार्यकताओं का जितना ध्यान प्रत्याशी या बड़े नेता रखते थे, वह बात अब नहीं रही। एक वह भी समय था, जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया के साथ कार्यकर्ता चुनाव प्रचार के लिए जाते थे तो अम्मा महाराज स्वयं सभी कार्यकर्ताओंं के भोजन आदि का ध्यान रखती थीं। राजमाता के साथ भाजपा कार्यकर्ता के रूप में चुनाव प्रचार के लिए जाने वाले पार्षद गंगाराम बघेल उस समय को याद कर भावुक हो जाते हैं। श्री बघेल ने स्वदेश से चर्चा के दौरान बताया कि अम्मा महाराज सभी कार्यकताओं के साथ पुत्रवत स्नेह करती थीं। गांवों में उनके साथ जब चुनाव प्रचार के लिए जाते थे तो राजमाता को कार्यकर्ताओं की सबसे अधिक चिंता रहती थी। अब पहले जैसे नेता नहीं रहे।
आज चुनाव के समय प्रत्याशी के यहां ही कार्यकर्ताओं के लिए सुबह के नाश्ते से ले लेकर रात के खाने-पीने की व्यवस्था हो जाती है। चार दशक पहले चुनाव में ऐसा नहीं होता था। पार्टी का कार्यकर्ता अपने घर से चाय नाश्ता कर साथ में दोपहर के समय खाने के लिए पूड़ी पराठा तथा अचार साथ ले जाता था। गर्मी के दिनों में सिर पर अंगोछा बांधकर गांव-गांव चुनाव प्रचार किया करते थे। गांव में किसी पेड़ की छाया में बैठकर घर से लाया भोजन कर पानी से गला तर कर लेते थे, लेकिन आज यह सब नहीं होता है। कार्यकर्ता प्रत्याशी के साथ चुनाव प्रचार में जाने से पहले एसी वाहन की डिमांड करने लगे हैं। साथ में खाने के पैकेट भी ले जाना पड़ते हैं। इससे अब प्रत्याशी का चुनाव खर्च भी बढ़ गया है।
नाम मात्र के खर्च में जीत जाते थे चुनाव
70 के दशक में प्रत्याशी नाम मात्र के खर्च मेंं विधायक तथा सांसद का चुनाव जीत जाता था। तब जनसंध और कांग्रेस ही दो प्रमुख राजनीतिक दल हुआ करते थे। बाद में भाजपा तथा अन्य क्षेत्रीय दलों का जन्म हो गया। चुनाव से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए 70 वर्षीद गंगाराम बघेल बताते हैं कि शहर के महाराज बाड़े पर होने वाली सभाओं में भारी भीड़ होती थी। चुनाव प्रचार के लिए भी कोई पाबंदी नहीं थी। लोग खुलकर बिना किसी डर के अपनी पसंद के राजनीतिक दल का चुनाव प्रचार करते थे। अधिकांश चुनाव प्रचार पैदल या साइकिल पर ही हुआ करता था।
अटल जी का नहीं था कोई मुकाबला
शहर में जब अटल जी की सभा होती थी तो उनको सुनने के लिए इतनी भीड़ होती थी कि लोग अपने घरों की छतों से अटल जी को सुनते थे। इतना ही नहीं जब अटल जी 1984 में ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़े और उन्हें इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद भी अटल जी ने महल के मैदान में कार्यकर्तओं की बैठक लेकर कहा था कि हार-जीत होती रहती है।
अब जड़ पर नहीं पत्तों पर ध्यान देते हैं
चर्चा के दौरान श्री बघेल ने बताया कि पहले नेता जड़ पर ध्यान देते थे। मतलब पुराने लोगों को अपने साथ लेकर चलते थे, लेकिन अब नेता सिर्फ पत्तों पर ध्यान देने लगे हैं।