पुलिस विभाग में तबादलों को लेकर बढ़ सकता है विवाद

Update: 2019-03-14 15:15 GMT

डीजीपी के पास है पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार

प्रशासनिक संवाददाता भोपाल

राज्य सरकार और लोकायुक्त संगठन के बीच पुलिस अधिकारियों की पदस्थापना और तबादलों को लेकर शुरू हुआ विवाद और बढ़ सकता है। दरअसल विवाद शुरू होने के बाद सरकार ने प्रदेश के एडवोकेट जनरल राजेन्द्र कुमार तिवारी से इस मामले में राय मांगी थी, जिस पर हाल ही में उनके द्वारा राज्य सरकार को दिए सुझाव में कहा कि संगठन में पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार पुलिस महानिदेशक को है। अब अगर सरकार ने एडवोकेट जनरल की राय पर अमल किया, तो स्थितियां बिगडऩा तय मानी जा रही है। क्योंकि हाल ही में की गई नियुक्तियों पर संगठन ने अपना अधिकार बताया है।

विवाद की शुरूआत तब हुई थी, जब राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मधु कुमार बाबू की सीधे लोकायुक्त में पदस्थ कर दिया था। इस पर लोकायुक्त संगठन ने दावा किया था कि चूंकि नियुक्ति हमारी सहमति के बिना हुई है, इसलिए उनकी आमद नहीं कराई जाएगी। विवाद के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने एडवोकेट जनरल को पत्र लिखकर राय मांगी थी। सरकार ने जानना चाहा था कि लोकायुक्त संगठन में नियुक्ति का अधिकार किसे है? जिस पर एडवोकेट जनरल ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि लोकायुक्त संगठन में नियुक्ति का अधिकार सिर्फ और सिर्फ राज्य के पुलिस महानिदेशक को है। चूंकि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मध्यप्रदेश सरकार के अधीन काम करते हैं, इसलिए यह साफ हो गया कि संगठन में सीधी नियुक्ति शासन कर सकता है। लोकायुक्त संगठन का मानना था कि नियुक्ति का अधिकार सरकार को है, लेकिन किसी भी अधिकारी को नियुक्त करने से पहले संगठन से सहमति लेना जरूरी है।

विवाद के बाद मधु को मिली आमद

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मधु कुमार बाबू ईओडल्यू में महानिदेशक (डीजी) के पद पर पदस्थ थे। कांग्रेस सरकार ने उन्हें वहां से हटा दिया था। दूसरे दिन उनके तबादले में संशोधन करते हुए उनकी पदस्थापना लोकायुक्त संगठन में एडीजी के पद पर कर दी गई। लोकायुक्त में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रहे रवि कुमार गुप्ता को वहां से हटा दिया गया था। लोकायुक्त न्यायाधीश एनके गुप्ता ने मधु कुमार को यह कहकर आमद कराने से मना कर दिया था कि नियुक्ति में हमारी सहमति नहीं ली गई है। गुप्ता को कार्यमुक्त करने से भी मना कर दिया था। मुख्यमंत्री कमल नाथ और जस्टिस गुप्ता की मुलाकात के बाद मसला सुलझा था। एडवोकेट जनरल ने माना कि अपराधों की होने वाली जांच के पर्यवेक्षण का भी लोकायुक्त संगठन के पास सीमित अधिकार हैं। अगर कोई शिकायत शपथ पत्र के साथ की जाती है, तो उसकी जांच संगठन अपने विधि अधिकारी से करा सकता है। जांच में साक्ष्य मिलने पर डीजी लोकायुक्त को प्रकरण दर्ज करने के लिए भेज सकते हैं।

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