चंद्रयान-4 के लिए लैंडिंग साइट तयः साउथ पोल के मॉन्स माउटन पहाड़ पर उतरेगा मिशन
इसरो ने चंद्रयान-4 के लिए चंद्रमा के साउथ पोल पर मॉन्स माउटन पहाड़ को लैंडिंग साइट के रूप में चुना, यहीं से मिट्टी-चट्टान के सैंपल लाए जाएंगे।
नई दिल्ली। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब इसरो अपने अब तक के सबसे चुनौतीपूर्ण मून मिशन की तैयारी में जुट गया है। चंद्रयान-4 के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास एक संभावित लैंडिंग साइट की पहचान कर ली गई है। इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों के आधार पर मॉन्स माउटन (MM-4) क्षेत्र को सबसे उपयुक्त माना है। भारत ने 14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा से चंद्रयान-3 लॉन्च किया था, जो 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के साउथ पोल पर सफलतापूर्वक उतरा था। अब चंद्रयान-4 मिशन उस उपलब्धि को एक कदम आगे ले जाने वाला है.
मॉन्स माउटन क्यों बना पहली पसंद
मॉन्स माउटन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित करीब 6,000 मीटर ऊंचा पर्वत है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी चोटी काफी हद तक सपाट है, जो सुरक्षित लैंडिंग के लिहाज से बेहद जरूरी मानी जाती है। स्टडी के अनुसार MM-4 साइट पर औसतन ढलान करीब 5 डिग्री है, जबकि चंद्रयान-4 का लैंडर 10 डिग्री तक के ढलान पर सुरक्षित उतर सकता है। इलाके में बड़े पत्थरों की संख्या भी कम पाई गई है। ज्यादातर बोल्डर 0.3 मीटर से छोटे हैं, जिससे लैंडिंग के दौरान जोखिम काफी घट जाता है.
लंबे समय तक मिलेगी सूर्य की रोशनी
वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र को इसलिए भी अहम माना है क्योंकि यहां लगातार 11 से 12 दिन तक सूर्य की रोशनी मिलने की संभावना है। इससे लैंडर और अन्य उपकरणों को पर्याप्त ऊर्जा मिल सकेगी।इसके अलावा मॉन्स माउटन क्षेत्र में वॉटर आइस मौजूद होने की संभावना भी जताई जाती है, जो भविष्य के चंद्र अभियानों और मानव मिशन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
चंद्रयान-2 की तस्वीरों से तय हुई रणनीति
OHRC कैमरे ने आसान किया फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस स्टडी को लूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC 2026) में पेश किया गया। लैंडिंग साइट की पहचान के लिए चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरे (OHRC) की तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया। यह कैमरा चंद्र सतह को करीब 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल के रेजोल्यूशन में दिखाता है। इससे छोटे क्रेटर, पत्थर, ढलान और सतह की बनावट साफ नजर आती है, और खतरनाक इलाकों की पहचान पहले ही हो जाती है.
नाम की कहानी भी दिलचस्प
मॉन्स माउटन को पहले लीबनिट्ज बीटा के नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम नासा की प्रसिद्ध गणितज्ञ और कंप्यूटर प्रोग्रामर मेल्बा रॉय माउटन के सम्मान में रखा गया। यह क्षेत्र चंद्रमा के साउथ पोल पर स्थित है और वैज्ञानिक शोध के लिहाज से बेहद खास माना जाता है।
चंद्रयान-4 लाएगा चंद्रमा से सैंपल
करीब 2104 करोड़ रुपए की लागत वाले चंद्रयान-4 मिशन का लक्ष्य चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों के नमूने पृथ्वी पर लाना है। इसके लिए इसरो दो अलग-अलग रॉकेट का इस्तेमाल करेगा। LVM-3 (हेवी लिफ्टर) मुख्य मॉड्यूल ले जाएगा और PSLV सपोर्टिंग पेलोड को कक्षा में स्थापित करेगा मिशन को दो स्टैक में बांटा गया है। स्टैक-1 में डिसेंडर और एसेंडर मॉड्यूल होंगे, जो चंद्र सतह से सैंपल इकट्ठा करेंगे। स्टैक-2 में प्रोपल्शन मॉड्यूल, ट्रांसफर मॉड्यूल और री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे, जो सैंपल को सुरक्षित पृथ्वी तक वापस लाएंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान-4 तकनीकी रूप से बेहद जटिल मिशन है, लेकिन इसकी सफलता भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के एक नए स्तर पर ले जाएगी.