जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करेगा, देश विश्वगुरु बना रहेगा: डॉ. भागवत
धर्म सृष्टि के संचालन का मूल सिद्धांत है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि धर्म पूरे ब्रह्मांड का चालक है और जब तक वही भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, देश विश्वगुरु बना रहेगा। उन्होंने यह बातें रविवार को छत्रपति संभाजीनगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहीं।
डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के संचालन का मूल सिद्धांत है। जब सृष्टि का निर्माण हुआ, तब उसके संचालन के लिए जो नियम बने, वही धर्म कहलाए। संसार की प्रत्येक वस्तु अपने कर्तव्य और अनुशासन के अनुसार चलती है। जैसे पानी का धर्म बहना है और आग का धर्म जलना, उसी प्रकार मनुष्य और समाज के भी आचरण के नियम हैं।
उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का उल्लेख करते हुए कहा कि चाहे कोई भी व्यक्ति हो, सभी को चलाने वाली शक्ति एक ही है और वह शक्ति धर्म है। यदि जीवन रूपी गाड़ी धर्म के अनुसार चलाई जाए, तो किसी प्रकार की दुर्घटना नहीं होती।
भारत को उसके सर्वोच्च गौरव तक पहुंचाना है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संगठन का उद्देश्य समाज के साथ मिलकर भारत को उसके सर्वोच्च गौरव तक पहुंचाना है। संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न किसी से प्रतिस्पर्धा करता है और न ही किसी प्रतिक्रिया में बना संगठन है। संघ स्वयं बड़ा होने की बजाय पूरे समाज को आगे बढ़ाना चाहता है।
आध्यात्मिक परंपरा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि देश को सदैव संतों और ऋषियों का मार्गदर्शन मिलता रहा है। भारत के पास जो आध्यात्मिक ज्ञान है, वह विश्व में दुर्लभ है। अन्य देशों में आध्यात्मिकता की कमी के कारण ऐसा गहन ज्ञान उपलब्ध नहीं हो पाया।
उन्होंने कहा कि कोई राज्य व्यवस्था भले ही धर्मनिरपेक्ष हो सकती है, लेकिन कोई भी व्यक्ति या रचना धर्म के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती। भारत के सामान्य जनमानस में धर्म गहराई से समाया हुआ है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
जातिगत भेदभाव पर चिंता जताते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि इसे समाप्त करने के लिए सबसे पहले मन से जाति की भावना को मिटाना होगा। उन्होंने बताया कि पहले जाति व्यवस्था कार्य और पेशे से जुड़ी थी, लेकिन समय के साथ यह भेदभाव का कारण बन गई।