मोबाइल गेम्स या टूटता संवाद? बच्चों की आत्महत्याओं के पीछे छिपा बड़ा सच

सोनाली मिश्रा

Update: 2026-02-04 11:04 GMT

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आज जो चौंकाने और डराने वाला समाचार आया, उसने सभी को स्तब्ध कर रख दिया है और बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। आज सुबह ही यह समाचार आया कि कैसे एक परिवार की तीन लड़कियों ने एक गेम के चलते एक साथ आत्महत्या कर ली। वे तीनों ही नौवीं मंजिल से नीचे कूद गईं। हालांकि अब जो निकलकर आ रहा है, उसके अनुसार एक लड़की आत्महत्या कर रही थी और शेष दोनों उसे रोकने के कारण नौवीं मंजिल से नीचे गिर गईं। उनकी डायरी से सुसाइड नोट भी मिला है, जो इसकी पूरी कहानी कहता है। पहले यह कहा जा रहा था कि गेम के कारण लड़कियों ने आत्महत्या कर ली, परंतु अभी-अभी पुलिस का बयान है कि गेम के कारण नहीं, बल्कि लड़कियों को कोरियाई कल्चर से बहुत प्यार था, और चूंकि उनका मोबाइल उनके मातापिता ने लेने की बात की थी, इसलिए वे बहुत परेशान थीं। 

मगर यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि आखिर वह क्या कारण था, जिसके कारण बच्चे ऑनलाइन गेम या दूसरे क्लचर की तरफ आकर्षित हो जाते हैं? ऐसा भी कहा जा रहा है कि तीनों लड़कियां कोरोना के बाद से स्कूल भी नहीं जा रही थीं। अब जबकि लॉकडाउन हटे हुए भी काफी समय हो गया है, उसके बाद भी घरवालों ने लड़कियों को स्कूल क्यों नहीं भेजा?

तमाम प्रश्न उठ रहे हैं, परंतु सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि बच्चों की दुनिया मोबाइल तक सीमित करने में सबसे बड़ी भूमिका किसकी होती है? वे कौन से कारक होते हैं, जिनके कारण बच्चे अपनी वास्तविकता से कटकर एक काल्पनिक दुनिया में चले जाते हैं और उनके मातापिता को इसकी भनक भी नहीं लगती?

आखिर कब तक यह कहा जाता रहेगा कि पश्चिमीकरण ने बच्चों को दूर कर दिया है? कब यह गलती मानेंगे कि बच्चों को अपने से दूर करने में कहीं न कहीं मातापिता भी जिम्मेदार होते ही हैं क्योंकि यदि मातापिता संवाद का सेतु बनाए रखें और जीवन के प्रति अपना लक्ष्य निर्धारित करके चलें तो शायद ही कोई बच्चा मोबाइल की ओर इस सीमा तक खिंचे कि वह अपनी वास्तविकता को भूलकर काल्पनिक लोक में ही जीने लगे। 

भोपाल में भी एक बच्चे ने की गेम के कारण आत्महत्या 

ऐसा नहीं है कि गाजियाबाद में ही तीन जीवन समाप्त हुए हों। जहां गाजियाबाद में 16,14 और 12 वर्ष की तीन लड़कियों के कोरियाई कल्चर के कारण आत्महत्या की तो वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी एक 14 वर्षीय बच्चे ने इस कारण आत्महत्या कर ली कि उसे गेम खेलने की लत थी, और चूंकि उसकी माँ ने उसे डांटा तो उसने मोबाइल छोड़ने के स्थान पर आत्महत्या कर ली!

एक ही दिन में ऑनलाइन गेम के कारण एक नहीं चार-चार जीवन, जो कि अभी देश और समाज के लिए काफी कुछ कर सकते थे, वे जीवन जिनमें तमाम सपने थे, जो पूरे हो सकते थे, वे चले गए। असमय जीवन दीप बुझ गए और कई परिवार सूने हो गए। 

कई चौखटों पर न जाने कब तक दीपक नहीं अब जलेगा, मगर इसके लिए उत्तरदायी कौन है? क्या तकनीक उत्तरदायी है या फिर वे मातापिता जो अपने बच्चों को समय नहीं देते या फिर समाज का वह वर्ग जो महंगे मोबाइल, टीवी आदि को ही उन्नति और प्रगति का मापदंड मानता है और उसमें बच्चे फँसते जाते हैं। फँसकर वे ऐसे खोल में जाते हैं, जहां से वापसी की कोई राह नहीं रह जाती है। 

ये दोनों ही घटनाएं ऐसी हैं, जो केवल परिवार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए खतरनाक है और कई प्रश्न खड़े करती हैं।


लेखिका- सोनाली मिश्रा 

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