वरिष्ठ पत्रकार सत्यनारायण श्रीवास्तव - एक संपादक, रणनीतिकार और गुरु की स्मृति
शलभ भदौरिया
एक जागरूक, कर्मठ, निष्ठावान संपादक के रूप में, उन्होंने न केवल समाचारों को प्रस्तुत करने का तरीका बदला, बल्कि पत्रकारिता को समाज के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी लेखनी में सत्य, निष्पक्षता और सामाजिक सरोकारों का समावेश था। वे उन पत्रकारों में से थे, जो न केवल खबरों को लिखते थे, बल्कि समाज की नब्ज को समझकर उसे दिशा देने का प्रयास करते थे। 70 और 80 के दशक में मध्यप्रदेश की राजनीति जटिल थी। यह वह दौर था जब कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व था, लेकिन आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व की चुनौतियां भी कम नहीं थीं। ऐसे में सत्यनारायण जी की राजनीतिक समझ और रणनीतिक दृष्टिकोण ने उन्हें एक अलग पहचान दी। उनकी लेखनी और संपादकीय नीतियों ने न केवल पाठकों को प्रभावित किया, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी उनकी राय को गंभीरता से लिया जाता था।
राजनीतिक रणनीति का बेजोड़ नमूना सत्तू भैया ने उस समय प्रस्तुत किया, जब उन्होंने अपने प्रधान संपादक को राज्यसभा चुनाव जितवाया। जो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी । यह वह समय था जब कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था, और विपक्षी दलों का दबाव भी चरम पर था। लेकिन सत्यनारायण जी की रणनीतिक सूझबूझ और राजनीतिक दूरदृष्टि ने इस असंभव से प्रतीत होने वाले कार्य को संभव कर दिखाया। उन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से और उनकी राजनेताओं में लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए न केवल जनमत को प्रभावित किया, बल्कि राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच एक ऐसी रणनीति तैयार की, जिसे 45 साल बाद भी अब तक याद किया जाता है ।
उनकी यह उपलब्धि उनकी राजनीतिक समझ, संगठनात्मक कौशल और लोगों के बीच विश्वसनीयता का परिचायक है। सत्यनारायण जी केवल एक संपादक ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी थे, जिन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग समाज और राजनीति के हित में किया था। समाचार भारती के बाद 1971 में मुझे उनके आशीर्वाद से प्रिंट मीडिया में प्रवेश मिला और वे पत्रकारिता में मेरे गुरु बन गए। वे मेरे लिए न केवल एक प्रेरणा हैं, जिन्होंने मुझे प्रिंट मीडिया की बारीकियों से परिचित कराया। उनकी शिक्षा और मार्गदर्शन आज भी प्रासंगिक हैं। सत्यनारायण जी ने पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में देखा, न कि केवल एक पेशा। उनकी नजर में पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज को जागृत करना और उसे सही दिशा में ले जाना था। उनके संपादकीय लेखों में गहरी अंतर्दृष्टि और तथ्यों का समावेश होता था। वे अपने लेखों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक समानता, को उठाते थे। उनकी लेखनी में एक ऐसी ताकत थी, जो पाठकों को न केवल सोचने पर मजबूर करती थी, बल्कि उन्हें कार्य करने के लिए भी प्रेरित करती थी।
सत्यनारायण जी की विरासत केवल उनके लेखों और संपादकीय कार्यों तक सीमित नहीं है। उनकी विरासत उन मूल्यों में है, जो उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित किए। निष्पक्षता, साहस, और समाज के प्रति जवाबदेही उनके कार्यों के मूल में थे। उन्होंने हम जैसे दसियों पत्रकारों को यह सिखाया कि एक पत्रकार का कर्तव्य केवल सत्य को सामने लाना नहीं, बल्कि उस सत्य को इस तरह प्रस्तुत करना है कि वह समाज में सकारात्मक बदलाव लाए। उनका योगदान मध्यप्रदेश की पत्रकारिता और राजनीति में आज भी प्रासंगिक है। उनकी रणनीतिक सोच और बौद्धिक गहराई ने न केवल उनके समकालीनों को प्रभावित किया, बल्कि आज की पीढ़ी के पत्रकारों के लिए भी एक प्रेरणा का स्रोत है। कुल मिला कर सत्यनारायण जी एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी और रणनीतिक कौशल से न केवल पत्रकारिता को एक नई पहचान दी, बल्कि मध्यप्रदेश की राजनीति और समाज को भी प्रभावित किया। उनकी विलक्षण प्रतिभा, बौद्धिक गहराई और समाज के प्रति समर्पण, उन्हें एक युगपुरुष बनाता है। मैं अपनी 55 साल की पत्रकारिता में भी उन्हें अपना गुरु मानता हूँ । उनकी शिक्षाएं और मार्गदर्शन मेरे और मेरी पत्रकारिता के लिए आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस दौर में थे। उनकी जीवन गाथा और उपलब्धियां न केवल एक लेख का विषय हैं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को पत्रकारिता के उच्च आदर्शों की ओर ले जाएगी।