फिर कहा न्यायालय ने कि लिव इन में ब्रेक अप के बाद बलात्कार का आरोप सही नहीं
सोनाली मिश्रा
एक बार फिर से लिव इन को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। लिव इन के विषय में तमाम बातें होती हैं और लिव इन का विरोध करने वालों को पिछड़ा, दकियानूसी या फिर प्यार का विरोधी ठहराया जाता है। वह और बात है कि लिव इन का तात्पर्य भी उन लोगों को नहीं स्पष्ट होता है, जो इस व्यवस्था में जाना चुनते हैं।
आइए पहले जानते हैं कि लिव इन का अर्थ क्या होता है?
लिव इन का अर्थ होता है, बिना विवाह किये एक साथ रहना। लिव इन में रहने वाले लोगों का तर्क यह होता है कि इस व्यवस्था में दोनों को ही आजादी होती है और इसमें यह नहीं होता कि कोई दूसरे पर बोझ है। दोनों लोग अपने मन से अपना खर्च करते हैं और खर्च और जिम्मेदारियाँ एक दूसरे में बराबर विभाजित होती हैं।
सुनने में यह बहुत ही आकर्षक लगता है कि आप बिना किसी बोझ के एक दूसरे के साथ रह रहे हैं और जब भी अलग होना चाहें, तब अलग हो जाएं। परंतु क्या अलग होना इतना ही सरल होता है? न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी अलग होना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। जहां एक तरफ पुरुष इसका प्रतिशोध महिला और अपने बीच के निजी पलों के वीडियो को वायरल करके लेते हैं, या फिर लड़की पर हिंसा के माध्यम से तो वहीं ब्रेक अप के बाद महिला भी पुरुष साथी पर बलात्कार का आरोप लगाती है और यह कहती है कि विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए।
इसलिए यह कहना कि इसमें अलग होना सरल है, पूरी तरह से गलत तथ्य है क्योंकि अलग होना सहज संभव नहीं है। प्यार निजी हो सकता है, परंतु लिव इन का निर्णय निजी कैसे हो सकता है? और इसके साथ ही यदि इन संबंधों के चलते गर्भ ठहरता है या फिर बच्चा पैदा होता है तो फिर उस बच्चे का क्या होगा? क्योंकि लिव इन का समर्थन इसलिए लोग करते हैं कि इसमें कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है।
जो बच्चा वैवाहिक संबंधों में प्रेम और स्वागत का केंद्र होता है, वही बच्चा इन संबंधों में अवांछित होता है। 24 जनवरी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में पुरुष की उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए यह टिप्पणी की कि "युवाओं में बिना शादी के साथ रहने की बढ़ती प्रवृत्ति है, जो पश्चिमी विचारों और लिव-इन कॉन्सेप्ट से प्रभावित है... जब ऐसे रिलेशन फेल हो जाते हैं, तो FIR दर्ज की जाती है। चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में हैं, इसलिए लड़के/पुरुष उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराए जाते हैं जो लिव-इन के कॉन्सेप्ट के अस्तित्व में आने से पहले बने थे।"
इससे पहले मद्रास उच्च न्यायालय में भी इन्हें लेकर टिप्पणी की थी कि लिव इन संबंधों को भारतीय गंधर्व विवाह के जैसा माना जाए और यह भी कहा कि ऐसे संबंधों में महिलाओं को पत्नी दर्जा दिया जाए, जिससे उन्हें कानूनी सुरक्षा मिले।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब महिलाओं को लिव इन में रहते हुए समस्त अधिकार पत्नी वाले चाहिए, तो फिर लिव इन का नाम क्यों? विवाह क्यों नहीं? और जब स्वेच्छा से लड़की ने लिव इन में जाना चुना, तो फिर ब्रेक अप के बाद पुरुष पर बलात्कार का आरोप लगाना, महिला अधिकारों एवं महिला स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
लेखक - सोनाली मिश्रा