जो सत्ता में है, वह इतना ताकतवर है कि वे कुचले ही जाएंगे। इधर प्रदर्शन चल रहे थे और मीडिया में यह शोर होने लगा था कि एक और देश की सरकार बदलने वाली है। परंतु क्या इतना ही सरल होता है सब कुछ? और यह भी प्रश्न है कि प्रदर्शन के समय इस सीमा तक कवरेज करने वाले लोग और उकसाने वाले लोग अब जब वहाँ पर कत्लेआम चल रहा है, कहाँ हैं? अब ईरान में विरोध प्रदर्शनकारियों का भयानक दमन चल रहा है। वहाँ पर बच्चों तक को नहीं छोड़ा जा रहा है। लोगों को बिलबोर्ड से अपने परिजनों की मौत के विषय में पता चल रहा है और भारत में इस पूरे दमनचक्र पर कुछ भी आवाज नहीं निकल रही है।
अलजज़ीरा के अनुसार अमेरिका आधारित मानवाधिकार न्यूज़ एजेंसी का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान लगभग साढ़े चार हजार लोग मारे गए, जिनमें 4219 प्रदर्शनकारी थे, 197 सुरक्षाकर्मी थे और 35 लोग 18 साल से कम के थे और 38 लोग केवल खड़े थे, जो न ही प्रदर्शनकारी थे और न ही सुरक्षाकर्मी! दिसंबर के अंत में कुछ दुकानदारों द्वारा महंगाई के आधार पर शुरू हुए प्रदर्शनों की आग जल्दी ही पूरे देश में फ़ाइल गई थी। हालांकि उसकी आंच में सरकार नहीं जली बल्कि वे आम लोग जल उठे, जिन्होनें सरकार से बचने के लिए प्रदर्शन आरंभ किये थे।
वे मर रहे हैं, वे लगातार हिंसा का शिकार हो रहे हैं, जो फ़ोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर हैं, वे डराने वाले हैं, जो तस्वीरें बीबीसी और अलजजीरा आदि पर हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं, परंतु यह भी बात सच है कि फिर भी पूरी दुनिया में चुप्पी है और भारत में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाले वर्ग में भी चुप्पी है। ईरान के शाह के निर्वासित बेटे रजा पहलवी ने भी प्रदर्शनकारियों से अनुरोध किया था कि वे जमकर प्रदर्शन करें और इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंके। मगर इस आह्वान के परिणामस्वरूप प्रदर्शन तो तेज हुए, परंतु अब जब दमन चक्र चल रहा है और हजारों लोग मारे जा रहे हैं, तब चुप्पी खल रही है।
आखिर खुले आम चल रहे इस कत्लेआम पर इस चुप्पी का अर्थ क्या है? हजारों मौतों पर कहीं भी कोई आवाज क्यों नहीं है? क्यों केवल सोशल मीडिया ही इन तस्वीरों से भरा है, अधिकार समूहों के होंठों पर चुप्पी है?
लेखिका - सोनाली मिश्रा