राजनीति के गिरते नैतिक मूल्य और उनकी पुनर्स्थापना

आदित्य राजौरिया अजनबी

Update: 2026-01-19 15:00 GMT

राजनीति के गिरते नैतिक मूल्यों के विषय पर कुछ विचार व्यक्त करते हुए मैं कहना चाहता हूं। की किसी भी देश में जो की एक लोकतांत्रिक देश है उस देश के लोकतंत्र की आत्मा राजनीति में निहित होती है। और किसी भी देश की राजनीति की आत्मा हमेशा से उसके नैतिक मूल्यों से निर्धारित होती है। लेकिन जब नैतिकता कमजोर पड़ती है, तो अपना लोकतंत्र भी बहुत हद तक खोखला होने लगता है। आज अगर हम देखें तो भारतीय राजनीति सहित विश्व राजनीति में नैतिक मूल्यों का क्षरण एक गंभीर चिंता और विमर्श का विषय बन चुका है। सत्ता के लाभ और स्वार्थ एवं अवसरवाद ने आदर्शों, सिद्धांतों और जनसेवा की जो भावना राजनीति में होनी चाहिए उसको काफी कुछ पीछे धकेल दिया है। पहले जो राजनीति समाज-सेवा और जनहित का माध्यम माना जाता था। अब उसकी परिभाषा बदल कर परिवार सेवा और स्वहित तक आ पहुंचीं है।

हम अगर पहले की बात करें तो वर्तमान सोशल मीडिया युग भले ही किसी की कैसी भी तस्वीर प्रस्तुत करता हो लेकिन पहले के नेताओं ने चाहे वो महात्मा गांधी जी, जयप्रकाश नारायण जी, डॉ. राममनोहर लोहिया जी हों उन्होंने नैतिकता, सत्य और त्याग को राजनीति का आधार बनाया था। और उनके उन्हीं सिद्धांतों के वजह से प्रचार और प्रसार के इतने माध्यम नहीं होने के बाद भी लोग उनकी बातों पर भरोसा करते थे। अगर ये भी कहा जाए अपने नेताओं को देवताओं की श्रेणी में रखने से भी परहेज नहीं करते थे तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। किंतु आज के इस समय में हमको देखने को मिल रहा है कि राजनीति में व्यक्तित्व नहीं व्यक्तित्व का प्रबंधन,सिद्धांत नहीं केवल समीकरण को और सेवा की जगह सत्ता को प्रमुखता दी जाने लगी है। वर्तमान राजनीति के परिदृश्य पर अगर चर्चा करें तो सबसे पहला उद्देश्य सत्ता प्राप्ति है। उसके लिए भले ही कोई भी कार्य करना पड़े इसके परिणामस्वरूप राजनीति में नैतिक मूल्यों की गिरावट स्पष्ट दिखने लगी है।

लेकिन इस के लिए हम केवल राजनीति में सक्रिय लोगों को दोष दें तो वो भी पूरी तरह से सही नहीं होगा क्योंकि इस आर्थिक युग में जब चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ गया है। जनता भी जाति बाद और अर्थ बाद से नियंत्रित होने लगी है। तो कहीं न कहीं देश के राजनीतिक क्षत्रप जनता के इस व्यवहार का भरपूर फायदा उठाने से नहीं चूकते हैं। आप सभी देखते होंगे आज चुनाव जीतने के लिए झूठे वादे, जाति-धर्म की राजनीति, भावनात्मक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार इतना आम हो गया है जितना कभी सच और ईमानदारी का हुआ करता था। और जब ऐसे लोग राजनीति के शिखर पर पहुंच रहे हैं जो कि धनबल और बाहुबल और जातिवाद धर्म और अपराध का जमकर उपयोग कर रहे हैं। तो फिर शासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाना कोई नई बात नहीं है। और जब सत्ता पर काबिज होने के लिए नीत और नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ानी पड़ेगी तो उनसे नीत नियमों की उम्मीद करना ही बेईमानी है। जब कानून बनाने वाले ही कानून का सम्मान न करें और गलत तरीकों से सत्ता पर काबिज होंगे , तो समाज में अनुशासन कैसे स्थापित हो सकता है

राजनीति में गिरते नैतिक मूल्यों का एक बड़ा कारण स्वयं व्यक्तियों के गिरते नैतिक मूल्य भी है फिर चाहे वो नेता हो या जनता। सत्ता की अतृप्त लालसा भी कहीं न कहीं लोगों को राजनैतिक मूल्य गिराने पर मजबूर कर दे रही है। दल-बदल, खरीद-फरोख्त, गठबंधन तोड़ना—ये सब भी जब सत्ता प्राप्ति के साधन बन गए हैं तो फिर मूल्यों की अवधारणा कैसे सही सलामत रह सकती है। पहले राजनीति विचारधारा से प्रेरित होती थी तो उसके मूल्यों में विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था।

लेकिन अब विचारधाराओं की जगह लाभ-हानि का गणित बैठाया जाने लगा है जिसके साथ लाभ उससे दोस्ती और जिससे हानि उससे दूरी बनाई जाने लगी है। इससे देश की जनता का भी राजनैतिक विश्वास लगातार टूटता जा रहा है और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। जिससे देश की लगभग 60 प्रतिशत जनता तो आज अपनी राजनैतिक भागीदारी के प्रति इतनी उदासीन है कि उसको देश की राजनैतिक स्थिति और परिस्थिति से कोई सरोकार ही नहीं रहा है। नैतिक मूल्यों में आई इस गिरावट का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि समाज के हर स्तर पर पड़ रहा है। जब नेता अनैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, तो आम नागरिक भी नियमों की अनदेखी और मौलिक कर्तव्यों की अवेहलना को सहज मानने लगा है। जिससे अपराध,भ्रष्टाचार, असहिष्णुता और सामाजिक विभाजन लगातार बढ़ता जा रहा है। युवाओं में राजनीति के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पनप रहा है, जो भविष्य के लिए इतना घातक है। जिसके बारे में चर्चा कर अगर समाधान नहीं ढूंढा गया तो भारतीय लोकतंत्र जिसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दर्जा प्राप्त है,वो अपने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर पाएगा कि नहीं यह कहना आज तो अत्यंत कठिन प्रतीत होता है।

हालाँकि इस समस्या का समाधान असंभव नहीं है इसका समाधान दृढ़ इक्षा शक्ति के द्वारा आज भी किया जा सकता है। उसके लिए सबसे पहले राजनीतिक दलों को केवल सत्ता प्राप्ति का मोह छोड़कर अपनी मूल विचारधारा पर वापिस आना पड़ेगा। राजनैतिक दलों को अपने दलों के अंदर आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता अपनानी होगी जिससे योग्य नेतृत्व निकलकर देश का नेतृत्व कर सके। राजनैतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन में चरित्र, योग्यता और जनसेवा को प्राथमिकता देनी होगी केवल धनबल और बाहुबल ही प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया से दूरी बनानी होगी। चुनावी खर्च और फंडिंग को पारदर्शी बनाने के लिए केवल नियम बनाना ही नहीं उनका पालन भी अनिवार्य करना होगा और इसमें अनियमितता पाए जाने पर सदस्यता समाप्ति का कड़ा नियम बनाना पड़ेगा जिसमें किसी भी प्रकार के प्रबंधन की कोई भी गुन्जाईश नहीं रहेगी।

इन सबके साथ ही, समग्र शिक्षा और नागरिक चेतना और जन जागृति के माध्यम से मतदाताओं को इतना जागरूक बनाना होगा कि वे हर हाल में केवल, नैतिकता को महत्व देने वाले नेताओं का ही चयन करें। और किसी भी प्रकार के लोभ लालच या जातिवादी सोच वाले नेताओं को पूरी तरह से नकार देने की हिम्मत और जज्बा रखें। और जैसा कि हम सभी जानते ही है राजनीति कहीं न कहीं समाज का ही दर्पण होती है। यदि संपूर्ण समाज धीरे धीरे ही सही नैतिकता की मांग करेगा, तो आज नहीं तो कल राजनीति भी नैतिकता को अपनाने और नैतिक मूल्यों की रक्षा करने को बाध्य होगी। हमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करते हुए यह समझना होगा कि लोकतंत्र में केवल वोट देने से ही हमारा कर्तव्य पूर्ण नहीं हो जाता है, बल्कि सही को सही और गलत को गलत कहने के साहस से ही हमारा लोकतंत्र मजबूत होता है।

ऐसा करने के लिए हमको अपनी अंतरात्मा में भी नैतिकता का भाव जगाना होगा और गलत को गलत और सही को सही कहने की शुरुवात अपने घर परिवार और समाज से करनी होगी। और अगर हमको आगामी शताब्दियों तक भारतीय लोकतंत्र को सुचारू रूप से संचालित होते हुए देखना है। तो राजनीति में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना करना ही होगी और उसके लिए सबसे पहले स्वयं के अंदर नैतिकता का उचित निर्धारण करना होगा। क्योंकि जब समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना हो जाएगी तो राजनीति अपने आप नैतिक मूल्यों की स्थापना कर एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की स्थापना करेगी। जो कि आज भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण है।


लेखक - आदित्य राजौरिया अजनबी

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