मकर संक्रांति : सूर्य, संस्कृति और सभ्यता का महापर्व
डॉ. अंजना सिंह सेंगर
भारतीय संस्कृति में पर्वों की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि वह खगोलशास्त्र, ऋतुचक्र, कृषि-व्यवस्था और सामाजिक समरसता की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। ये पर्व प्रकृति, समाज और मानव जीवन के गहरे अंतर्संबंधों को अभिव्यक्त करते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक महापर्व है, जो भारतीय सभ्यता की वैज्ञानिक दृष्टि, सांस्कृतिक निरंतरता और लोकजीवन की सहजता को एक सूत्र में बाँधता है।
यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का सूचक है और चंद्र-आधारित पंचांग से भिन्न सौर गणना पर आधारित है। यही कारण है कि इसकी तिथि लगभग स्थिर रहती है। मकर संक्रांति सामान्यतः 14 जनवरी को मनाई जाती है और यह उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है।
मकर संक्रांति का खगोलीय एवं वैज्ञानिक आधार:
भारतीय खगोलशास्त्र अत्यंत प्राचीन और उन्नत रहा है। मकर संक्रांति का आधार पृथ्वी की सूर्य के सापेक्ष स्थिति और उसकी धुरी के झुकाव से संबंधित है।जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध पर अधिक समय तक पड़ने लगती हैं। इसे उत्तरायण कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप दिन बड़े होने लगते हैं, तापमान में क्रमिक वृद्धि होती है और शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है। यह परिवर्तन कृषि, वनस्पति और जैविक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रकार मकर संक्रांति विशुद्ध रूप से एक प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक घटना पर आधारित पर्व है जो प्रकृति के नवजागरण का संकेत माना जाता है।
वैदिक परंपरा में सूर्य और मकर संक्रांति
ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में सूर्य की उपासना के अनेक मंत्र मिलते हैं। सूर्य को ‘सविता’, ‘पूषा’ और ‘आदित्य’ के रूप में संबोधित किया गया है। मकर संक्रांति पर सूर्योपासना का विशेष महत्व इसी वैदिक परंपरा से उपजा है गायत्री मंत्र
“ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥”
सूर्य को बुद्धि और चेतना का प्रेरक घोषित करता है, जिसमें सूर्य को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर कल्याणकारी माना गया है।
उत्तरायण का आध्यात्मिक महत्व
भारतीय दर्शन में उत्तरायण को आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व प्राप्त है। भगवद्गीता (8.24) में कहा गया है कि
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
अर्थात् उत्तरायण में देह त्याग करने वाला योगी ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह अवधारणा यह संकेत देती है कि उत्तरायण को चेतना के प्रकाश और उर्ध्वगमन का काल माना गया है। इस प्रकार मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष का प्रतीक भी है।
महाभारत में भीष्म पितामह का प्रसंग:
मकर संक्रांति का सबसे प्रसिद्ध पौराणिक संदर्भ भीष्म पितामह से जुड़ा है। महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह ने शरशय्या पर पड़े-पड़े उत्तरायण की प्रतीक्षा की और सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने प्राण त्यागे।
कृषि पर्व के रूप में मकर संक्रांति
भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का मूल आधार कृषि रहा है। मकर संक्रांति का समय खरीफ फसलों की कटाई और रबी फसलों की तैयारी का होता है। इस अवसर पर किसान सूर्य, पृथ्वी, जल, पशुधन आदि के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। इसीलिए इसे कृषि धन्यवाद पर्व भी कहा जा सकता है।
तिल, गुड़ और आयुर्वेदिक दृष्टि
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन अनिवार्य रूप से किया जाता है, जो केवल परंपरा नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से भी उचित है। जहां तिल इस मौसम में वातनाशक, ऊष्मावर्धक का कार्य करता है वहीं गुड़ ऊर्जा का स्रोत है तथा पाचन में सहायक होता है। सांस्कृतिक रूप से तिल-गुड़ सामाजिक सौहार्द और मधुरता का प्रतीक है।
दान परंपरा और सामाजिक चेतना
मकर संक्रांति पर खिचड़ी, तिल और वस्त्र आदि के दान की परंपरा भारतीय समाज में सामाजिक संतुलन को बनाए रखने का माध्यम रही है। दान को केवल पुण्य नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा गया है।
क्षेत्रीय विविधताएँ और सांस्कृतिक एकता
भारत के विभिन्न राज्यों में भी मकर संक्रांति अलग-अलग नामों तथा अपने-अपने ढंग से मनाई जाती है
- पंजाब में लोहड़ी के अलाव के चारों ओर ढोल- नगाड़ों के साथ भांगड़ा और गिद्ध नृत्य तथा लोकगीतों के साथ मनाते हैं
- असम में माघ बिहू पर सामूहिक भोज,
- तमिलनाडु में पोंगल पर मिट्टी के नए बर्तनों में उबलता दूध,-
- उत्तर भारत में बच्चे छतों पर पतंग उड़ाते हैं।
- गुजरात: उत्तरायण
- महाराष्ट्र: तिलगुल
पतंग उत्सव : लोक स्वप्नों की उड़ान
मकर संक्रांति पर पतंगबाज़ी विशेष रूप से लोकप्रिय है। इस दिन लोग अपनी छतों पर या घर के पास ही बने मैदानों में पतंगबाज़ी करते हैं, किंतु पतंगबाज़ी केवल खेल ही नहीं, एक शिक्षा भी है। जब एक पिता अपने बच्चे को पतंग उड़ाना सिखाता है, तो वह अनजाने में उसे संतुलन, धैर्य और प्रतिस्पर्धा का पाठ पढ़ा रहा होता है। लोकजीवन में पतंग कहती है
“ऊँचा उड़ो, पर डोर थामे रखो।”
दान-पुण्य और लोक करुणा
मकर संक्रांति के दिन ख़ासतौर से गाँवों में बिना किसी औपचारिकता के दान होता है। कोई चुपचाप कंबल रख जाता है, कोई अनाज का बोरा, कोई गुड़। यह लोक करुणा बताती है कि दान दिखावे का नहीं, संवेदना का विषय है। इन सभी विशेषताओं को देखते हुए निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति भारत की आत्मा का लोक उत्सव है। आज के समय में जब पर्यावरण असंतुलन, सामाजिक विघटन और उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, मकर संक्रांति प्रकृति-सम्मान, सामूहिकता और संतुलित जीवन का संदेश देती है।
मकर संक्रांति भारतीय सभ्यता का ऐसा पर्व है, जिसमें विज्ञान, धर्म, कृषि और समाज चारों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही मानव जीवन का आधार है। इस प्रकार मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं बल्कि एक संदेश है “अंधकार से प्रकाश की ओर, शीत से ऊष्मा की और और संकीर्णता से उदारता की ओर बढ़ने का।
लेखिका - डॉ. अंजना सिंह सेंगर