स्वामी विवेकानंद जयंती, हमारे आदर्श- स्वामी विवेकानंद- शिवप्रकाश
शिवप्रकाश
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1865 को कलकत्ता में हुआ था। वे अधिवक्ता विश्वासनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के परिवार में जन्मे थे। उनका बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। बाल्यकाल में उन्हें ‘नरेन’ के नाम से पुकारा जाता था। श्रीरामकृष्ण परमहंस से दीक्षा लेने के बाद वे संन्यास मार्ग पर अग्रसर हुए और आगे चलकर संपूर्ण विश्व में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वामी विवेकानंद केवल एक संत ही नहीं, बल्कि महान विचारक, समाज सुधारक, धर्म प्रचारक और राष्ट्र जागरण के प्रेरक थे। भारत की स्वतंत्र चेतना और आत्मगौरव को जगाने में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनके विचारों से प्रेरित होकर अनेक युवाओं ने देश और समाज के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।
स्वामी विवेकानंद 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म संसद में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण के कारण विश्व प्रसिद्ध हुए। यह आयोजन कोलंबस के अमेरिका आगमन के 400 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में किया गया था। इस आयोजन के अंतर्गत एक भव्य और विशाल प्रदर्शनी भी आयोजित हुई थी, जिसे लाखों लोगों ने देखा। विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी और सारगर्भित भाषण से भारत की आध्यात्मिक परंपरा और हिंदू धर्म का वैश्विक स्तर पर पुनः प्रतिष्ठापन हुआ। उन्होंने संपूर्ण विश्व को यह संदेश दिया कि “समस्त विश्व एक परिवार है” और सभी धर्म अपने-अपने मार्गों से एक ही सत्य तक पहुँचते हैं। उनके भाषण के अगले ही दिन अमेरिका के सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने उनके चित्र के साथ उन्हें “हिंदू धर्म का प्रतिनिधि” बताते हुए प्रकाशित किया।
भारत सरकार ने वर्ष 1984 से स्वामी विवेकानंद की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों में संप्रदायिकता, कट्टरता और हिंसा को मानवता के लिए घातक बताया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि धर्म के नाम पर घृणा और विभाजन बढ़ा, तो यह समाज के पतन का कारण बनेगा। दुर्भाग्यवश आज भी यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सका है। उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रखर स्वर में कहा था कि यह हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है। उनका मानना था कि सामाजिक समानता के बिना राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है। अनेक प्रयासों के बावजूद यह कार्य आज भी पूरी तरह पूर्ण नहीं हो पाया है, जिसके लिए हमें निरंतर प्रयास करना होगा।
स्वामी विवेकानंद युवाओं को राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। उनका कहना था कि “मुझे मांसल शरीर, प्रखर बुद्धि और विशाल हृदय वाले युवा चाहिए।” वे मानते थे कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी गरीबी नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आत्मविश्वास, स्वाभिमान और स्वदेशी भाव से राष्ट्र निर्माण में जुटें। स्वामी विवेकानंद केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं थे, बल्कि भारत के आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के भी समर्थक थे। वे विज्ञान और तकनीक को राष्ट्र की प्रगति का आधार मानते थे। प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा को भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) की स्थापना की प्रेरणा भी स्वामी विवेकानंद से ही मिली थी।
स्त्री समानता पर उनके विचार अत्यंत प्रगतिशील थे। उन्होंने कहा था कि भारत की स्त्रियाँ पश्चिमी नकल से नहीं, बल्कि सीता, सावित्री और गार्गी जैसे आदर्शों से आगे बढ़ें। वे मानते थे कि जिस समाज में नारी सम्मान सुरक्षित है, वही समाज सशक्त होता है। स्वामी विवेकानंद के विचारों से अनेक क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी नेता प्रेरित हुए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने उन्हें भारत की आत्मा को जाग्रत करने वाला महान संत बताया था। उनका प्रसिद्ध कथन “दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है”आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। स्वामी विवेकानंद का दृढ़ विश्वास था कि भारत का लक्ष्य केवल अपना उत्थान नहीं, बल्कि विश्व को शांति, सहअस्तित्व और मानवता का संदेश देना है। उनके अधूरे सपनों को साकार करना और उनके विचारों को व्यवहार में उतारना ही उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी।