सीमा आनंद जैसे विमर्श भारतीय समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होंगे
मर्यादा और उत्तरदायित्व भारतीय समाज की मूल अवधारणा है
आदित्य राजौरिया अजनबी
सीमा आनंद के एक पॉडकास्ट को देखा सुना और समझा उसके बाद सोशल मीडिया पर आई लोगों की कई तरह की प्रतिक्रियाओं को भी पढ़ा। उसके बाद उनकी विचारधारा हमारे भारतीय समाज को किस तरह से प्रभावित करेगी। या हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ी इन सबसे कितना प्रभावित होगी उस विषय पर अपने विचारों को कलमबद्ध करने का जब प्रयास किया तो जो मेरे विचारों में निष्कर्ष निकला है वो कुछ इस प्रकार है।
अगर हम वर्तमान भारतीय सामाजिक परिदृश्य की चर्चा करें तो हम कह सकते हैं कि इस समय हमारा ज्यादातर भारतीय समाज उस संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। जिसमें वो पूरी तरह से दिग्भ्रमित है उसे खुद को ही पता नहीं है कि उसे सनातन संस्कृति उसकी परंपरा और वर्तमान आधुनिकता में से किसका चयन करना है। ऐसे दोराहे पर खड़े इस समाज में जब कोई व्यक्ति यौन संबंधों और उनकी अभिव्यक्ति पर,रिश्तों और स्त्री-पुरुष के संबंधों पर खुलकर बोलता है, तो वह हमारे भारतीय समाज में स्वाभाविक रूप से चर्चा और विवाद के केंद्र में आ जाता है। क्योंकि हमारे समाज की परंपरा में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यौन संबंध हमेशा से पर्दा और सीमा में ही रहे हैं। खासकर भारतीय समाज में महिलाओं पर इस मर्यादा के पालन की जिम्मेदारी अधिक रही है। सीमा आनंद जो आजकल इसी विषय पर विमर्श की एक प्रमुख आवाज़ बनी हुई हैं। कुछ लोग इस बात से प्रभावित दिखाई देते हैं कि उनकी बातें सामाजिक मर्यादा की नीचे दबी हुई सच्चाइयों को सामने ला रहीं है। लेकिन वहीं मेरे जैसे कुछ लोगों का मानना है कि उनकी बातें भारतीय समाज और जीवन शैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहीं हैं।
जो लोग उनके समर्थक है वो सीमा आनंद का सबसे बड़ा योगदान इसे मान कर चल रहे हैं कि उन्होंने भारतीय समाज में यौन संबंध जैसे वर्जित विषय पर संवाद की शुरुआत की। मैं भी इस बात का समर्थक हू कि निस्संदेह,अज्ञान और चुप्पी से किसी भी समाज को नुकसान होता है। विषय कोई भी हो उसके बारे में समझ और जानकारी संपूर्ण समाज को होनी चाहिए। लेकिन यहां मेरा प्रश्न यह है कि क्या सीमा आनंद द्वारा किया जा रहा संवाद और तर्क हमारी भारतीय सामाजिक संरचना और मानसिकता के अनुरूप है? इन संवादों की पहल से हमारे भारतीय समाज का सांस्कृतिक विघटन नहीं होगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा। की किसके द्वारा कही गई बात का किस पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ेगा इसका निर्धारण ना तो कहने वाला कर सकता है और ना ही सुनने वाला कर सकता है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता और अपने अनुरूप अर्थ निकालने की तर्क क्षमता हमेशा ही भिन्न होती है। इसलिए वो किस विषय को कैसे आत्मसात करेगा यह कहना अत्यंत कठिन है।
सीमा आनंद की प्रस्तुतियाँ कहें या वक्तव्य हो सकता है शहरी, उच्च शिक्षित और अपेक्षाकृत अत्यंत स्वतंत्र जीवनशैली वाले वर्ग के उन तार्किक लोगों को प्रासंगिक लग रहे हों जिनके तर्क आज भी ज्यादातर लोगों के लिए कुतर्क से अधिक कुछ नहीं हैं। लेकिन भारत का एक बड़ा हिस्सा आज भी पारंपरिक, सामूहिक जीवन शैली पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों से बंधा हुआ है और जिसके द्वारा परंपरागत रूप से पर्दा के विषय को आज भी पर्दा का विषय माना जाता है। जिनमें से एक विषय यौन संबंध भी है। ऐसे में सीमा आनंद के यह विचार जिनको उनके द्वारा यौनैतिक कहा जा रहा है समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए अत्यंत पीड़ादायक और कष्टकारी भी लग रहे हैं।
सीमा आनंद अपनी बात को तार्किक रूप से मजबूत करने और उसकी सत्यता सिद्ध करने के लिए भारतीय ग्रंथों, विशेष रूप से कामसूत्र और कुछ तांत्रिक परंपराओं का उल्लेख करती हैं जिनमें नग्नता को महत्व दिया गया हो सकता है। और कहती हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति मूलतः यौन संबंधों के मामले में स्वतंत्र रही है। हो सकता है उनके द्वारा निकाले गए अर्थों में यह तर्क आंशिक रूप से सही भी हो या यह भी हो सकता है उन्होंने ग्रंथों के अर्थों को केवल दूसरे रूप में ही समझा हो उसका अन्य कोई और भी मतलब निकलता हो जिस तक वो न पहुंच पाईं हो और उन्होंने अपने हिसाब से व्याख्या की हो और यही चयनात्मक व्याख्या इस विषय की मुख्य समस्या भी हो सकती है।
क्योंकि हमारी सनातन संस्कृति में हो सकता है कुछ अपवाद हों लेकिन भारतीय परंपरा केवल भोग या इच्छा की नहीं रही है। बल्कि नियम संयम, दायित्व और सामाजिक मर्यादा ही भारतीय समाज की परंपरा रही है। लेकिन जब कोई लेखक हो वक्ता हो संत हो महात्मा हो चाहे आधुनिक हो या पुरातन हो जब वह परंपरा के केवल सुविधाजनक अंशों को प्रस्तुत करेगा तो वो कहीं न कहीं अपने इस कृत्य से,पूरी सांस्कृतिक तस्वीर को विकृत करेगा जो कि कहीं न कहीं हमारे समाज के आधारभूत ढांचे के लिए नुकसानदायक साबित होगा। इसलिए मेरे विचारों में इसका पुरजोर विरोध किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
जब आप सीमा आनंद को सुनें और उस पर गौर करें तो उनकी विचारधारा में आप पाएंगे कि वो केवल व्यक्तिगत इच्छा और स्वतंत्रता को ही महत्व देती दिखाई दे रही हैं। जो कि उनके हिसाब से आधुनिक लोकतांत्रिक सोच के अनुरूप हो सकती है। लेकिन जब हम अपने चारों तरफ के समाज का आंकलन करते हैं तो हम देखते हैं भारतीय समाज केवल स्वतंत्र व्यक्तियों का समूह ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना है।
जिनके बिना भारतीय समाज की और सनातन संस्कृति की कल्पना किया जाना ही अकल्पनीय है। इसलिए यहां मेरा मानना है कि केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर नहीं भागा जा सकता। विवाह संबंध परिवार और हमारे आपसी सामाजिक बंधन केवल कोई दमनकारी नीतियों के उपकरण नहीं हैं, बल्कि हमारी आपसी सुरक्षा और स्थिरता के मूल कारक भी रहे हैं। उनको इन सामाजिक व्यवस्थाओं और संस्थाओं की आलोचना करते समय इन नियमों नीतियों और संस्थानों के सामाजिक योगदान को नज़रअंदाज़ करना और उन्हें नकारना उनकी संतुलित सोच का परिचायक नहीं है।
इन सभी को लेकर उनकी जो सोच है वो अगर आज हमारे समाज द्वारा अपना ली गई तो कहीं न कहीं भारतीय समाज और संस्कृति अपने विनाश की राह पर इतनी तेजी से अग्रसर कर देगी जिसकी कल्पना करना भी आज संभव प्रतीत नहीं होता। क्योंकि यहां में अपनी वही बात फिर दोहरा रहा हूं कि किसी के कहे का या किसी द्वारा उसके सुने गए का किस पर क्या प्रभाव होगा और कब प्रभाव होगा वो न तो कहने वाला जानता है, और न ही सुनने वाला जानता है।
वर्तमान परिदृश्य में देखें तो सोशल मीडिया के इस वर्तमान समय में उनकी बातें विशेष रूप से युवाओं द्वारा ही सुनी और समझी जा रहीं है। जो कि उनको आकर्षित करेंगी क्योंकि ज्यादातर युवा तो हमेशा से ही पुरातन परंपराओं का विरोधी रहा है और जीवन शैली में नित नए बदलाव का समर्थक रहा है। लेकिन हर युवा समान रूप से मानसिक परिपक्वता तो नहीं रखता क्योंकि ईश्वरीय संरचना मानव का बौद्धिक स्तर अलग अलग स्तर का है। ऐसे में हम बिना किसी पर्याप्त नैतिक,भावनात्मक और सामाजिक संदर्भ की व्यवस्थाओं में बांधे हुए उनको यदि केवल स्वतंत्रता का संदेश देंगे तो आगे जाकर हमारी वर्तमान पीढ़ी और आगे आने वाली पीढ़ी में यह सोच और विमर्श भ्रम, असंतोष और रिश्तों के प्रति गैर-जिम्मेदारी को जन्म दे सकता है। और अगर ऐसा हुआ तो भारतीय समाज का ताना बाना इतनी बुरी तरह से बिखर जाएगा कि आगे जाकर इसे खंड खंड होने से कोई नहीं रोक पाएगा।
जिन पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों और मर्यादा से भारतीय समाज बंधा हुआ है अगर आपने अपने वक्तव्यों और विमर्शों से उसे तोड़ने का प्रयास किया तो फिर इसको विखंडित होने से कौन बचायेगा। में यहां यह भी नहीं कह रहा हूं कि सीमा आनंद पूरी तरह से गलत हैं और उनकी बातें पूरी तरह से नकारने योग्य हैं। हो सकता है कि समाज के एक तबके को पूरी तरह से सही भी लग रहीं हों अब केवल अकेला में ही तो बुद्धि नहीं रखता सभी का अपना अपना बुद्धि और विवेक है। मेरा सोचना है कि अगर वे किसी खास एजेंडे का हिस्सा नहीं हैं तो वे उस खाली जगह को भरने का प्रयास कर रही हैं, जिसे परिवार समाज और शिक्षा व्यवस्था के द्वारा लंबे समय तक अनदेखा किया गया है।
किंतु उनकी विचारधारा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रूप में सामाजिक संतुलन और समग्रता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अगर बिना सामाजिक परंपरा और पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्व की जिम्मेदारी को छोड़कर केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे को लेकर उनकी बातों से लोग प्रभावित हुए तो भारतीय समाज और संस्कृति एक ऐसे अंधेरे कुएं में गिर जाएगी जिसमें से निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन की श्रेणी में आ जायेगा। हो सकता है कि सीमा आनंद की बातें आपको भी प्रभावित करती हों लेकिन उनके प्रभाव में आने से पहले भारतीय समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक आधारभूत संरचना पर विचार करोगे तो पाओगे। भारतीय समाज के लिए सही मार्ग केवल पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्व से परिपूर्ण विवेकपूर्ण मध्य मार्ग में ही निहित है। ना कि किसी प्रकार की यौन संबंधों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में।
लेखक - आदित्य राजौरिया अजनबी