हां मैं गांधी विरोधी हूं - बाबा आदिविद्रोही

गांधी विरोध क्या केवल उग्र असहमति है या एक ज़रूरी वैचारिक प्रश्न? पढ़िए अहिंसा, सत्ता और लोकतंत्र पर संतुलित लेकिन तीखा विचार।

Update: 2026-01-20 17:00 GMT

हां मैं गांधी विरोधी हूं,

कब से ये कहना मुश्किल है,

वैसे गांधी विरोध आसान है,

क्योंकि गांधी के विरोध से किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं। अपने मूल में सभी कहीं न कहीं गांधी विरोधी हैं।

अवसर पाकर, मात्रा अनुसार, बाहरी रूप से सब गांधीवादी, समर्थक, भक्त या अनुयायी हो जाते हैं।

गांधी केवल एक संज्ञा नहीं हैं, बल्कि उपसर्ग और प्रत्यय, उपमा, अलंकार अथवा क्रोध भाव उत्पन्न होने पर उपयोग में आने वाले भावनात्मक भाव की प्रतिमूर्ति के रूप में भी प्रयोग होते हैं।

आप किसी कायराना कृत्य को गांधीजी का सहारा लेकर सही ठहरा सकते हैं।

उदाहरण – अगर मैं गांधीवादी नहीं होता तो तेरा मुंहतोड़ देता।

अथवा, भ्रष्टाचारी से नहीं, भ्रष्टाचार का विरोध करो, भ्रष्टाचारी से प्रेम करो।

कोई इस गाल पर मारे तो उस गाल को आगे करो, परंतु जिस देशकाल में गांधी हुए, तब सत्ता गाल पर नहीं, बल्कि आपकी देह के पार्श्व भाग में दाएं और बाएं भाग को दंड से समान रूप से पुरस्कृत करती थी, जिसके बाद अहिंसा का भाव स्वतः समाप्त हो जाता था।

संभवतः गांधीजी की कहानी में कर्ता-क्रिया-काल काल्पनिक रहे होंगे। वैसे भी भारत में सदियों से अहिंसा प्रवचनों का आभूषण रही है। सामान्य जनमानस किसी भी क्रिया की प्रतिक्रिया समान वेग एवं ऊर्जा से ही करता है, यही विज्ञान का नियम भी है। लेकिन व्यासपीठ पर बैठकर पिटने की प्रेरणा देना भारतीय संस्कृति कतई नहीं है, जब तक आपको इस हेतु पर्याप्त प्रोत्साहन न हो।

गांधी विरोधी होना एक स्वतंत्र विचार है। यह आगे जाकर विचार की धारा का स्वरूप ले सकता है। यह धारा अविरल होकर किसी सागर में जब तक न मिले, तब तक इस विचार की धारा अपने अनुयायियों को प्रेरित करती रहेगी।

गांधी विरोध व्यक्तिवादी विरोध का पर्याय है। भारत कतई व्यक्तिवादी नहीं है, क्योंकि भारत में व्यक्ति के चरित्र की “गारंटी” दे पाना असंभव कृत्य है। व्यक्ति की “गारंटी” उसके परिनिर्वाण के उपरांत ही संभव है।

गांधी असल में घोर व्यापारिक बाजार-प्रधान व्यवस्था के समर्थक हैं। स्वदेशी का समर्थन भी गांधी तब तक ही करते हैं, जब तक विदेशी वस्तुएं बाज़ार में उपलब्ध हैं। जब तक विदेशी अपनाने की बात हो, उनसे अधिक विदेशी समर्थक विरले ही रहे होंगे।

विदेशी का विरोध भी इतना अहिंसक हो कि इस विरोध से तनिक भी विदेशी असहज न हों। विदेशी से आग्रह भाव से विनम्र अभिवादन स्वीकार करते हुए ही भारत से प्रस्थान का आग्रह करना ही मूल गांधीवादियों की पहचान है।

आज गांधीजी के सिद्धांतों पर चलकर देश तरक्की कर रहा है। पूंजी का केंद्रीकरण, बाज़ार की शक्ति के सम्मुख अहिंसक विरोध है। पूंजीपति की भावनाएं किसी भी तरह से आहत न हों, सत्य के अनुप्रयोगों में समाज को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

पूंजीपति ही देश की आत्मा हैं। पूंजी के दास ही चरण दास हैं। सत्य और सत्ता पर्यायवाची हैं। इसके लिए पूंजीपति जैसे भक्त अनुयायी परम आवश्यक हैं। ये वे पथप्रदर्शक हैं, जो पूंजी के अत्यधिक केंद्रीकरण की अवस्था को उत्पन्न करते हैं, ताकि आम जनमानस सत्य की भक्ति-मार्ग पर अनवरत लीन हो सके।

धन जनसामान्य में हिंसा का कारक हो सकता है, वैमनस्य बढ़ा सकता है। इसलिए धन की उपलब्धता केवल पूंजीपतियों के पास ही हो। वे पूंजी को केवल कुछ सत्य के अनुयायियों तक सीमित रखकर जनसामान्य को अर्थ से विमुख होने की प्रेरणा देते हैं।

आज गांधी के विचार बहुत अधिक प्रासंगिक हैं। उनके विचारों का प्रभाव इतना गहरा है कि गांधी के बिना देश की आर्थिक तरक्की असंभव सी है। लेकिन फिर भी मैं गांधी विरोधी क्यों हूं, यह समझना तर्क से परे है।

गांधी कभी स्थापित व्यवस्था का सीधे विरुद्ध होने के विचार का समर्थन नहीं करते। वे आमरण अनशन की प्रेरणा देते हैं, ताकि सांप भी मर जाए और लाठी को बुरा न लगे। मरने के लिए वे एक प्रकार का पथप्रदर्शन करते हैं।

उनके समीप हमेशा बड़े उद्योगपति चंवर हिलाते रहे। उनके आलीशान घरों में सत्संग और प्रवचन की अविरल धारा बहती रही।

आज देश को गांधी विरोध की परम आवश्यकता है। गांधीवादियों के विरोध की भी। पटेल और नेहरू के विरोध, गांधी विरोध का चक्रवर्ती ब्याज है।

गांधीवादी विचार ने हमको नपुंसक बना दिया। पाकिस्तान और बांग्लादेश की छोड़िए, हमको श्रीलंका, नेपाल, मालदीव भी जो आज आंख दिखा रहे हैं, उसमें गांधीजी का ही प्रभाव है।

गांधी टॉल्सटॉय के भी समर्थक थे, लेकिन रूसी क्रांति से वे बिल्कुल प्रभावित नहीं थे। उन्होंने शायद टॉल्सटॉय की वार एंड पीस नहीं पढ़ी होगी। लोलिता पढ़ी होगी, यह भी कहना कठिन है।

मेरा पूरा बचपन गांधी के निबंध के प्रतिकार में गुज़रा। गांधी की तारीफ़ में कसीदे पढ़ना, आत्मावलोकन और संघर्षशील होने को प्रेरित करता रहा। आप आंतरिक रूप से असहमत होकर भी केवल अंक प्राप्ति के लिए तारीफ़ कर सकते हैं। यह गुण आपको झूठ सफ़ाई से बोलने के हुनर में पारंगत बनाता है।

आज गांधी को अमेरिका ने अपना लिया है। उसे भी अहिंसा बहुत पसंद है। आज अमेरिका से बड़ा अहिंसा समर्थक कोई राष्ट्र नहीं है। ट्रम्प से बड़ा गांधी विचारक कोई नहीं है। भारत को उन्हें गांधी शांति अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से ज़रूर नवाज़ना चाहिए। ट्रम्प को गांधीवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए नोबेल नहीं तो “भारत रत्न” दे ही देना चाहिए।

गांधी विरोधी होने के नाते मैं ट्रम्प की आलोचना करता हूं। मुझे ट्रम्प का गांधी प्रेम कतई नहीं रास आ रहा।

लेकिन मैं अकेला ट्रम्प का विरोध क्यों करूं? और भी गांधी विरोधी यह काम करेंगे, ऐसी आशा नहीं, विश्वास है।

गांधी विरोधी होकर मैं प्रतिद्वंदी की लकीर मिटाने की चेष्टा कर रहा हूं। गांधी आंतरिक लोकतंत्र के घोर विरोधी थे। उन्होंने सुभाष बाबू को चुनाव में जीतने पर भी अध्यक्ष नहीं बनने दिया।

आज गांधीवाद के समर्थक भी उसी दिशा में प्रयासरत हैं। उन्हें खड़गे जी के निर्वाचन में खुली प्रतिस्पर्धा रखनी चाहिए थी। इतने बड़े संगठन में केवल एक ही नामांकन हो, भला यह कैसा आंतरिक लोकतंत्र है?

खैर, गांधी विरोधी होना गुजराती विरोधी होना कतई न समझा जाए। मैं पूर्णतः गुजरात के अंदर नशामुक्ति के लिए शराबबंदी का समर्थन करता हूं। यह मांग और उपलब्धता के सिद्धांत को गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के विपरीत सिद्ध करता है।

गांधी का अनुप्रयोग बिना दांत के मुंह में कंचे खेलने जैसा है। जो आपको संतरे की गोली के होने का आभास तो देता है, लेकिन घंटों उन्हें मुंह में घुमाने के बाद भी कोई स्वाद नहीं देता। न ही कंचों को कोई नुकसान होता है।

सार यही है 

जिसका विरोध करना है, नहीं कर सकते तो, जिसका कर सकते हो उसका करो, लेकिन करो…

विरोध, प्रतिकार की क्रिया महत्वपूर्ण है, न कि विरोध का केन्द्रीय पात्र।

विरोध प्रतिकार की यात्रा का आनंद लेना है। अडिग रहना है। कायर नहीं होना है। मौन अहिंसा का समर्थन नहीं करना है। शाब्दिक आलोचनात्मक हिंसा जीवित होने का प्रमाण है। मौन अहिंसा दरबारी होने का, मूक कायर होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

गांधी का विरोध गांधी के लिए नहीं है।

विद्रोह, विरोध के कौशल के उन्नयन के लिए है।

विरोध के पात्र भले बदलें, विरोध की आत्मा अमर है।

विरुद्ध होने में ही अमरत्व है।

इसलिए हम गांधी विरोधी हैं।

व्यवस्था अथवा ढर्रा विरोधी हैं।

दरबारी अहिंसा और मौन मौज-पन के विरोधी हैं।

व्यक्तिवादी खोखले आदेशों के विरोधी हैं।

पट्ठावादी व्यवस्था में योग्यता की हत्या के प्रयासों के विरोधी हैं।

और सीधे-सीधे कहें तो, गांधी विरोधी हैं।

गांधीवाद के खात्मे तक, विरोध जारी रहेगा…

गांधी विरोधी - बाबा आदिविद्रोही

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