हेमू कालाणी: 19 साल का वह चेहरा, जो फांसी के तख्ते पर भी नहीं झुका
सिंध के युवा क्रांतिकारी हेमू कालाणी की कहानी, जिन्होंने 19 साल की उम्र में देश की आज़ादी के लिए फांसी स्वीकार की।
सिंध की काकोरी क्रांति का क्रांतिवीर हुतात्मा हेमू कालाणी
रक्षामंत्री माननीय श्री राजनाथ सिंह जी ने गत वर्ष 23 नवंबर को सिंधु समाज के एक कार्यक्रम में भारत रत्न श्री लालकृष्ण आडवाणी जी द्वारा लिखित एक पुस्तक के एक अंश के संदर्भ में अखंड भारत की अवधारणा पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज सिंध प्रांत भारत का भौगोलिक भाग नहीं है, परंतु सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक वैचारिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से इसका संबंध भारत से सतत रहा है और सदैव रहेगा। इस संदर्भ में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अखंड भारत के सिंध प्रांत में हुतात्मा हेमू कालाणी का बलिदान भी लखनऊ की काकोरी ट्रेन क्रांति से प्राप्त प्रेरणा का प्रतीक है।
स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान, 09 अगस्त 1925 को ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन क्रांति में क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में, क्रांतिकारियों ने लखनऊ ज़िले में काकोरी रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन पर आक्रमण करके अंग्रेज़ सरकार के राजकोष पर कब्ज़ा कर लिया था। इस क्रांति के आरोप में, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी एवं डॉ. रोशन सिंह को फांसी दे दी गई तथा अन्य 14 क्रांतिकारियों को काला पानी कैद की सज़ा हुई। 17 वर्ष पश्चात, 1942 में अविभाजित भारत के सिंध प्रदेश में भी काकोरी ट्रेन क्रांति की साहसिक पुनरावृत्ति करते हुए, 19 वर्षीय हेमू कालाणी ने अपना जीवन बलिदान कर दिया।
1957 की क्रांति के पश्चात प्रखर राष्ट्रवाद की धारा धीरे-धीरे सिंध प्रांत में भी जागृत हो रही थी। क्रांति नायक चंद्रशेखर आज़ाद की प्रेरणा से सुक्कर नगर में डॉ. मंघाराम कालाणी के नेतृत्व में “स्वराज सेना” का गठन हुआ। इस सेना द्वारा सिंध के युवाओं में क्रांति की भावना जागृत करने का कार्य प्रारंभ किया गया। क्रांतिवीर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के बलिदान से प्रेरित किशोर वय हेमू कालाणी भी क्रांति के उस ज्वार में कूद पड़ा।
1924 में, शहीद भगत सिंह के बलिदान दिवस 23 मार्च को जन्मे हेमू किशोरावस्था से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सम्मिलित हो गए। उनके नेतृत्व में उनके सहयोगी किशोर क्रांतिकारी साहित्य बांटने तथा संदेश प्रसारित करने का कार्य करते थे तथा भूमिगत होकर अंग्रेज़ सरकार के अभिलेख नष्ट करते थे। “पुलिस निरीक्षक के छद्म आदेश से उन्होंने अपने साथी को जेल से रिहा कराने का अद्भुत प्रयास किया।” परंतु हेमू के विद्रोही मन में अमर बलिदानी भगत सिंह जैसा ही कुछ क्रांतिकारी कार्य करने की प्रबल इच्छा थी। उसे पता चला कि ब्रिटिश सेना के हथियारों से भरी एक मालगाड़ी सुक्कर नगर से गुजरने वाली है। जनता के दमन तथा आज़ादी के आंदोलन को कुचलने के लिए आ रही हथियारों की इस मालगाड़ी को उसने गिराने की योजना बनाई।
23 अक्टूबर 1942 की मध्य रात्रि में दो सहयोगियों के साथ उसने नगर के बाहर एक कारखाने के पीछे सुनसान क्षेत्र में मालगाड़ी गुजरने के कुछ देर पहले रेल पटरी की फिश प्लेटें निकाल लीं। परंतु लगभग उसी समय पुलिस के एक गश्ती दल ने उन्हें देख लिया। हेमू ने अपने साथियों को भगा दिया, परंतु स्वयं निडर होकर रेल पटरी तोड़ना जारी रखते हुए स्वयं को गिरफ़्तार होने दिया। अपने सहयोगियों तथा दूसरी क्रांतिकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए उसे जेल में यातनाएं दी गईं, परंतु उसने साहस के साथ मौन रखा। उसके विरुद्ध मार्शल लॉ एक्ट के अधीन अंग्रेज़ सेना की मार्शल कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सज़ा दी। परंतु हैदराबाद सिंध के सीनियर मार्शल कोर्ट में अंग्रेज़ कर्नल रिचर्डसन ने उसकी सज़ा को मृत्युदंड में बदल दिया। कलेक्टर ने हेमू को अपने साथियों एवं नेताओं के नाम बताने पर मृत्युदंड से मुक्त करने का लालच दिया, परंतु हेमू ने खिलखिलाते हुए कलेक्टर के लिए यह लालच ठुकरा दिया।
चूंकि हेमू की योजना में किसी जनहानि का उद्देश्य नहीं था, अतः अनेक संगठनों तथा समाज सेवियों के साथ जन सामान्य ने हेमू को जीवनदान हेतु प्रदर्शन तथा सत्याग्रह किया, परंतु निर्दयी अंग्रेज़ अधिकारियों ने कोई संवेदना नहीं दिखाई। अंततः 21 जनवरी 1943 को, इंकलाब जिंदाबाद, हिंदुस्तान जिंदाबाद के बुलंद नारों के साथ, 19 वर्षीय हेमू ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपना जीवन न्योछावर कर दिया। स्वतंत्रता के बाद 1983 में हेमू कालाणी के बलिदान की स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया तथा 21 अगस्त 2023 को संसद भवन के परिसर में तत्कालीन प्रधानमंत्री आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने हेमू की प्रतिमा का अनावरण किया।
हेमू के अमर बलिदान को कोटिशः नमन।
वंदे भारत।
लेखक -डॉ. सुखदेव माखीजा, स्वतंत्र लेखक एवं समीक्षक हैं