लोकलुभावन के बजाय आर्थिक सेहत ठीक करने वाला बजट

उमेश चतुर्वेदी

Update: 2026-02-03 04:33 GMT

अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है द रॉन्ग पिलर टू स्वैलो। हिंदी में इसका मतलब होगा, पीटर से लेकर पॉल को देना। दुनिया की हर सरकार बजट के लिए इस मुहावरे का इस्तेमाल करती है। मीडिया भी हर बजट के दिन एक खबर जरूर बनाता है—क्या आम आदमी को कुछ मिला या नहीं। इसका मतलब भी इसी मुहावरे जैसा ही होता है। बजट प्रवचन में दुनियाभर की सरकारें एक व्यक्ति या स्रोत से लेकर दूसरे को देने की बात कहती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर बजट ऐसा ही होता है। लोकसभा में साल 2026-27 के लिए प्रस्तुत बजट को इस मुहावरे के तहत देखा जा सकता है। बजट प्रस्तुति की सीमाएं होती हैं, लेकिन गहराई से देखें तो कुछ बातें साफ होती हैं। इस बजट के बारे में कहा जा सकता है कि यह लोकलुभावन नहीं है।

साल 2024-25 और 2025-26 के बजट को देखें तो इन दोनों वर्षों में मोदी सरकार पर जनता से किए गए वादों को पूरा करने का दबाव था। इसलिए बीते दोनों बजटों में लोकलुभावन घोषणाएं देखने को मिलीं। भारतीय राजनीति की रवायत रही है कि चुनावों से पहले आने वाले बजट प्रस्तावों में उन राज्यों के लिए लुभावनी घोषणाओं की बाढ़ आ जाती है, जहां चुनाव होने वाले होते हैं। पश्चिम बंगाल पर बीजेपी जहां कब्जे की कोशिश में दिन-रात एक किए हुए है, वहीं झारखंड और तमिलनाडु भी अपनी ताकतवर उपस्थिति जताने के लिए जोर लगाए हुए हैं। तमिलनाडु के पड़ोसी केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी चुनाव होना है। इसी तरह बीजेपी की कोशिश ‘गॉड्स ऑन कंट्री’ यानी भगवान के अपने घर केरल में कमल का फूल खिलाने की है, जबकि असम में तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीति भी अहम है।

राजनीतिक स्वार्थ के मुताबिक, मौजूदा बजट प्रस्तावों में इन राज्यों के लिए घोषणाओं की बाढ़ आनी चाहिए थी, लेकिन निर्मला सीतारमण ने अपने इस बजट भाषण में ऐसा कुछ भी नहीं किया। लिहाज से यह बजट भारतीय राजनीति का नया चेहरा प्रस्तुत करता नजर आता है। इस बजट के बारे में कहा जा सकता है कि यह लोकलुभावन घोषणाओं के बजाय संरचनात्मक सुधारों, वित्तीय अनुशासन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व ईवी जैसे भविष्य के क्षेत्रों पर केंद्रित है। जिस तरह ‘पीएम शक्ति’ के जरिए महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन देने की बात है, बेकार और अनुपयोगी हो चुके कानूनों को बदलने के लिए समिति बनाने का प्रस्ताव है, या सात बड़े शहरों को विकसित बनाने की बात कही गई है, उससे यह बजट अलग स्वरूप में दिखता है।

मनरेगा की जगह आए नए कानूनों को रोजगार से जोड़ने का प्रस्ताव, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को गति देने की योजना और बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाने की सोच भी इस बजट का हिस्सा है। शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री इसे वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को मजबूत बनाने वाला बजट बता रहे हैं। हालांकि पूर्व वित्तमंत्री और अर्थशास्त्री पी. चिदंबरम मानते हैं कि इस बजट प्रस्तुति में सरकार कुछ क्षेत्रों में अमेरिकी दबाव में दिख रही है। लेकिन विदेशी समाचार माध्यमों और एजेंसियों की नजर में यह बजट एक तरह से ऐतिहासिक है।

दुनिया की जानीमानी आर्थिक समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग का कहना है कि भारत ने अपने बजट में 133 बिलियन डॉलर का इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान पेश किया है, जिससे भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सुपरचार्ज करने की तैयारी में है। इसके साथ ही ब्लूमबर्ग ने बजट में 12.2 लाख करोड़ रुपये के कैपेक्स को ग्लोबल स्तर पर अहम बताया है। सप्लाई चेन के लिए बजट संकेतक माना जा रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इस बजट प्रस्तावों को लेकर कहा है कि भारत के इस बजट में वित्तीय अनुशासन बनाम विकास का द्वंद्व दिखता है। एजेंसी के मुताबिक सरकार ने 4.3 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा है और बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाया है।

मोदी सरकार के इस कदम पर बदलाव के प्रतीक के तौर पर प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध आर्थिक अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने कहा है कि वित्तीय संतुलन और राजकोषीय विवेक के बीच भारत का यह कदम स्थिरता की दिशा में है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एएफपी ने भारत के बजट में बुनियादी ढांचे के लिए रिकॉर्ड 133 अरब डॉलर देने के बाद का स्वागत किया है। मूडीज ने भी इस बजट को टेक्निकल यानी रूपांतरकारी करार दिया है। मूडीज का मानना है कि यह बजट तुरंत बदलाव नहीं करेगा, लेकिन भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए अच्छा है।

इन प्रतिक्रियाओं को प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सोच से भी जोड़ा जा रहा है। भारतीय मध्यम वर्ग को हर बार बजट से बड़ी उम्मीद रहती है। इस बार के बजट में आयकर स्लैब में बदलाव न होने से मध्यम वर्ग को उतनी राहत नहीं मिली, जितनी उम्मीद थी। सरकारी कर्मचारियों और आम लोगों को उम्मीद थी कि आयकर में कोई बड़ी घोषणा या बदलाव होगा, लेकिन वित्त मंत्री ने इससे परहेज किया। सरकार ने ‘मार्ट्स’ नामक प्लेटफॉर्म शुरू करने का फैसला किया है, जहां सिर्फ महिला उद्यमी, स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण कारीगर अपना सामान बेच सकेंगे।

इससे महिलाओं को बिचौलियों की जरूरत नहीं रहेगी। इसी तरह कैंसर के इलाज से जुड़ी दवाओं पर कर में कमी की गई है। सात दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए बाहर से आयात होने वाली दवाओं और उपकरणों पर शुल्क माफ कर दिया गया है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भी ऐलान किया गया है। ग्रामीण विकास पर लगभग 73 हजार 108 करोड़ रुपये और कृषि एवं कृषि विकास पर लगभग 62 हजार 671 करोड़ रुपये का बजट प्रस्ताव ग्रामीण क्षेत्रों को रफ्तार दे सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं) 

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