भारतीय नारी के सशक्तिकरण और स्वतंत्रता का अर्थ समझाते हुए, जंतर-मंतर की घटना के माध्यम से सामाजिक मर्यादाओं का आत्ममंथन का आह्वान किया गया है।
आज की भारतीय नारी हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। सेना की वर्दी से लेकर अंतरिक्ष तक, न्यायपालिका से लेकर विज्ञान और खेल तक, भारतीय बेटियाँ अपने परिश्रम, अनुशासन और चरित्र से यह सिद्ध कर रही हैं कि सशक्तिकरण का अर्थ जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना है।
भारत की संस्कृति में नारी को केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि आदर्शों की भी प्रतिमूर्ति माना गया है। हमारे यहाँ नारी को शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्वरूप मानकर माँ दुर्गा, माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। यह वही भूमि है, जहाँ गार्गी और मैत्रेयी ने ज्ञान के शिखर को छुआ, रानी लक्ष्मीबाई ने मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए, अहिल्याबाई होल्कर ने आदर्श शासन का उदाहरण प्रस्तुत किया, सावित्रीबाई फुले ने महिला शिक्षा का दीप जलाया और आधुनिक भारत में कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, पी. वी. सिंधु, मैरी कॉम, अवनी चतुर्वेदी तथा नीरजा भनोट जैसी असंख्य महिलाओं ने विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया।
आज की भारतीय नारी हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। सेना की वर्दी से लेकर अंतरिक्ष तक, न्यायपालिका से लेकर विज्ञान और खेल तक, भारतीय बेटियाँ अपने परिश्रम, अनुशासन और चरित्र से यह सिद्ध कर रही हैं कि सशक्तिकरण का अर्थ जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना है। ऐसे समय में यदि किसी सार्वजनिक आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान कुछ युवतियों द्वारा अश्लील, अमर्यादित या सामाजिक मर्यादाओं के विपरीत व्यवहार सामने आता है, तो वह केवल व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न नहीं रह जाता। सार्वजनिक स्थानों पर भाषा, व्यवहार और अभिव्यक्ति का स्तर समाज के संस्कारों का भी प्रतिबिंब बन जाता है।
भारतीय संस्कृति कभी भी नारी की स्वतंत्रता की विरोधी नहीं रही। उसने सदैव नारी के सम्मान, स्वाभिमान और नेतृत्व का समर्थन किया है। किंतु स्वतंत्रता और उच्छृंखलता के बीच की रेखा मिटा देना न तो समाज के हित में है और न ही महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के पक्ष में। यदि अभिव्यक्ति अशिष्टता का रूप ले ले, यदि विरोध अश्लीलता में बदल जाए और यदि स्वतंत्रता सामाजिक गरिमा को आहत करने लगे, तो वह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि आत्मविनाश का मार्ग बन जाता है।भारत की करोड़ों बेटियाँ आज भी अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अनुकरणीय कार्य कर रही हैं। वे विद्यालयों में पढ़ा रही हैं, सीमाओं पर राष्ट्र की रक्षा कर रही हैं, अस्पतालों में सेवा दे रही हैं, विज्ञान में नए आयाम स्थापित कर रही हैं और समाज को दिशा दे रही हैं। यही भारत की वास्तविक पहचान है।
आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। परिवारों को बच्चों में संस्कार, शालीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराना होगा। विद्यालयों और महाविद्यालयों में चरित्र-निर्माण, नागरिक कर्तव्यों और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर गंभीर संवाद होना चाहिए। सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और मीडिया को भी ऐसी अभिव्यक्तियों का महिमामंडन करने के बजाय सकारात्मक आदर्शों को सामने लाना चाहिए।सच्चा सशक्तिकरण वह है, जो नारी को केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि समाज का पथ-प्रदर्शक भी बनाए। जंतर-मंतर जैसी घटनाएँ हमें यह सोचने का अवसर देती हैं कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसी स्वतंत्रता देना चाहते हैं वह जो समाज को विभाजित करे, या वह जो चरित्र, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण को सशक्त बनाए। नारी का सम्मान उसके स्वर की ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसके चरित्र की ऊँचाई से होता है। राष्ट्र की प्रगति केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि अधिकार और कर्तव्य के संतुलन से सुनिश्चित होती है।
राष्ट्र-निर्माण का मार्ग अधिकार और मर्यादा, दोनों के समन्वय से ही प्रशस्त होता है। आज के सभी शिक्षित और जागरूक माता-पिता तथा शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर कार्यरत जिम्मेदार शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। प्रत्येक क्षण उन्हें अपनी संतानों और विद्यार्थियों के व्यवहार का विश्लेषण करना होगा। उन्हें हर परिस्थिति में 'राष्ट्र प्रथम' का भाव याद दिलाना होगा। तभी हमारा भविष्य सुरक्षित और राष्ट्र वैभवशाली होगा। हमें सदैव यह भी स्मरण रखना होगा-
"गौरवशाली था भूत, भविष्य भी महान है,
अगर संभाल सके उसे, जो वर्तमान है।"
निष्कर्ष
डिजिटल युग और सोशल मीडिया की संस्कृति में पली-बढ़ी यह युवा पीढ़ी अपनी बेबाकी को ही अपनी पहचान मानती है। जंतर-मंतर के मंच और धरना-स्थल पर जिस तरह के अशोभनीय शब्दों, आपत्तिजनक स्लोगन और अमर्यादित टिप्पणियों का प्रयोग किया गया, उसने विरोध-प्रदर्शन के पारंपरिक और सभ्य दायरे को पीछे छोड़ दिया। गंभीर मुद्दों पर बात करने के बजाय फूहड़ता और आक्रामकता को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाना एक चिंताजनक बदलाव है। प्रदर्शन के दौरान इस बात की परवाह भी नहीं की गई कि सार्वजनिक मंचों से समाज में किस प्रकार का संदेश जा रहा है। अधिकारों की मांग और व्यवस्था से नाराजगी अपनी जगह वैध हो सकती है, परंतु आचरण की अमर्यादिता और भाषा का यह स्तर हमारी संवाद संस्कृति के गंभीर पतन को दर्शाता है।

मेजर डॉ. मीनू मेहरोत्रा
(लेखक हिंदू कॉलेज, मुरादाबाद में मनोविज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)