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भारतीय राजनीति में उथल-पुथल

कॉकरोच जनता पार्टी: फ्लॉप प्रदर्शन को लेकर कथित लिबरल नाराज क्यों?

सोनाली मिश्रा


कॉकरोच जनता पार्टी फ्लॉप प्रदर्शन को लेकर कथित लिबरल नाराज क्यों

भारत में पिछले कई दिनों से कथित लिबरल्स बहुत प्रसन्न थे। वे भारत में नेपाल और बांग्लादेश रिपीट होने का सपना देखने लगे थे। उन्हें लग रहा था कि अब देश बस क्रांति से कुछ ही कदम दूर है और अमेरिका में बैठा हुआ एक पूर्व आम आदमी का सदस्य उन्हें अपना मसीहा लगने लगा था।  वैसे वे अपना मसीहा किसी में भी खोज सकते हैं। वे अपना मसीहा हर उस आदमी में खोज सकते हैं, जो उन्हें मोदी से छुटकारा दिला दे। इसलिए वे तालीबानियों के सत्ता में आने का स्वागत कर सकते हैं, वे बांग्लादेश में निर्वाचित सरकार को गिराने का भी स्वागत कर सकते हैं। वे सब कुछ कर सकते हैं, मगर उनका सब कुछ करना भी उनके काम नहीं आ रहा है। 

उन्होनें कन्हैया कुमार से लेकर उमर खालिद तक तमाम अपने नायक खोज लिए, कई युवाओं के कैरियर बलिदान करवा लिए और कइयों का जीवन बर्बाद कर दिया, मगर फिर भी उन्हें वह मसीहा नहीं मिला, जो उन्हें मोदी से छुटकारा दिला दे। कथित लिबरल वर्ग भाजपा से हृदय से घृणा करता है, इसलिए वह अराजकता को भी न्योता दे सकता है। यह अराजकता उन्हें सुकून देती है। यह अराजकता उन्हें शांति देती है और यह शांति इस सीमा तक है कि वे कुछ भी सोच सकते हैं और कर सकते हैं। हालांकि वे बहुत सेफ चलते हैं, वे ऐसा कुछ नहीं कहते और करते हैं कि जिनसे उन्हें सरकार के कोप का सामना करना पड़े या फिर उनकी अय्याशी वाली लाइफ स्टाइल खराब हो, उस पर कोई भी असर आए। वे बस बाहरी लोगों से आस लगाते है कि कोई तो आएगा और उन्हें मोदी से बचाएगा। 

ऐसा ही उन्हें अमेरिका के अभिजीत से लगा था, उन्हें आस थी और अभी भी है। मगर अभी वाली आस कुछ मद्धम है। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोवर्स वाली कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन को उन्होनें एक समय के लिए अपना सब कुछ मान लिया था। भारत का अपना जेन जी मूमेंट कहा। यह कयास लगाए कि छ जून को सुबह से ही जंतर मंतर भर जाएगा और युवा आकर इस जगह में बैठ जाएंगे और फिर अमेरिका से अभिजीत आएगा और वह उस आंदोलन का अगुआ बनेगा। और फिर देखते ही देखते जनता का रेला आएगा और प्रधानमंत्री को कुछ ही घंटों में इस्तीफा देना होगा। 

इसके लिए शयाद योजना भी बनाई गई थी, तभी शायद पहले से आंदोलन की अनुमति नहीं ली गई थी, मगर दिल्ली पुलिस ने तत्काल ही अनुमति दे दी और जैसे ही जंतर-मंतर पर कथित क्रांतिकारी पहुंचे, वैसे ही लोगों की निराशा झलकने लगी थी। वहाँ पर पिकनिक मनाने वाले लोग अधिक दिख रहे थे और आजादी गैंग के लोग थे। और भाजपा और संघ से घृणा करने वाले भी, मगर आंदोलन किस विषय पर था, वह नहीं पता था। यहाँ तक कि कुछ लोग जो आए थे, उन्हें भारत के शिक्षामंत्री का नाम ही नहीं पता था। जैसे-जैसे ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते गए, इस कथित आंदोलन को लेकर उपहास के भाव और फैलते रहे, मगर सबसे मजेदार था उसी वर्ग का सोशल मीडिया पर विलाप कि लोग नहीं आए, जो एक दिन पहले तक इस बात की कल्पना से गोलगप्पे जैसे फूल रहे थे कि अब तो क्रांति होकर रहेगी और मोदी को युवा शक्ति से डरकर भागना होगा। 

यह समझ नहीं आता है कि यदि उस वर्ग को भाजपा और प्रधानमंत्री से इतनी ही घृणा है और वे लोग वाकई प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को हटाना चाहते हैं तो वे खुद क्यों नहीं सड़कों पर आते हैं, उन्हें देश के भटके हुए युवाओं का कंधा क्यों चाहिए? सोशल मीडिया पर क्रांति का सपना देखने वाले लोगों के लिए छ जून की शाम बहुत दुख लेकर आई और एक बार फिर से उनका थोपा हुआ नायक विफलता की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, हालांकि यह अभी शुरुआत है और वे लोग भाजपा और नरेंद्र मोदी विरोध में किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 

इस पूरे दिन में प्रोपोगैंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी का वह वीडियो भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होनें कहा था कि दो करोड़ लोगों में से एक प्रतिशत भी नहीं आए हैं। ऐसी ही निराशा सोशल मीडिया पर कई लोगों के चेहरों पर थी!

सोनाली मिश्रा

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