कुछ लोग जीवन के हर क्षेत्र में "मैं-मैं" करते हुए पाए जाते हैं। वे दूसरों के योगदान को अनदेखा कर स्वयं को केंद्र में रख लेते हैं। पहली नज़र में लगता है यह उनका दोष है, परंतु गहराई से देखें तो यह उनकी अज्ञानता और सीमित सोच का परिणाम है। वे वास्तव में अपनी प्रजाति का परिचय दे रहे होते हैं। जैसे बकरा केवल "मैं-मैं" की आवाज़ निकालता है और अंततः काटा भी जाता है, वैसे ही यह लोग भी धीरे-धीरे अपने कर्मों का फल भोगते हैं। उन्हें लगता है कि दान के पैसे को खाने का, दूसरों के श्रम का श्रेय लेने का, या दूसरों पर हुक्म चलाने का उन्हें विशेष अधिकार है। लेकिन हर अंतरात्मा जानती है कि कौन कहाँ सही था और कहाँ गलत।
जीवन का न्याय अदृश्य है, परंतु अटल है। ऐसे लोगों के घरों में अक्सर धन का अपव्यय होता है, बीमारियाँ बनी रहती हैं और मानसिक शांति उनसे कोसों दूर रहती है। कारण यह है कि उन्होंने अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास ही नहीं किया। मैं जब ऐसे लोगों को देखता हूँ, तो मन में सहानुभूति भर जाती है। क्योंकि वे यह नहीं समझ पाते कि-जिसे आसानी से ठगा जा सकता है, उसके साथ किया गया व्यवहार ही असल में तुम्हारा व्यक्तित्व बताता है।
साधारण लोग हमेशा तय राह पर ही चलते हैं, परंतु साहसी, शायर और सपूत वह हैं जो परंपरागत राह छोड़कर सृजन और साहस के नए मार्ग खोजते हैं। इसी प्रकार जीवन में भी जो लोग केवल "मैं" में फंसे रहते हैं, वे एक ही लीक पर चलते हैं। उनके जीवन में न नया सृजन होता है, न नयापन। और यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।सच्चाई यह है कि-आप कभी भी मक्खी को यह नहीं समझा सकते कि फूल कचरे से ज्यादा खूबसूरत है। मक्खी की दृष्टि सीमित है। उसी तरह, जिनका स्वभाव संकीर्ण और अज्ञान से भरा है, उन्हें जीवन की सच्चाई और सुंदरता दिखाना संभव नहीं।
गुणवत्तापूर्ण उदाहरण-जैसे कोई व्यापारी दूसरों को ठगकर धन इकट्ठा करे, तो वह धन शांति नहीं देता। बीमारी, मानसिक तनाव और परिवारिक कलह उस घर के स्थायी अतिथि बन जाते हैं। वहीं, जो व्यक्ति निष्काम भाव से कार्य करता है, उसका नाम और उसकी आभा चुपचाप चारों ओर फैलती है।
व्यक्तित्व की पहचान इस बात से नहीं होती कि आपने कितना धन कमाया, या कितने लोगों पर शासन किया। व्यक्तित्व की सच्ची पहचान इस बात से होती है कि आपने दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया। इसलिए, सौ बातों की एक बात-अपने स्वभाव को "मैं" से निकालकर "हम" की ओर ले जाइए।क्योंकि सच्चा फूल वही है, जो अपनी खुशबू बाँटता है, चाहे बगल में कचरा क्यों न पड़ा हो।

लेखक - सतीश शर्मा