संघ कार्य के 100 वर्षों में मध्यप्रदेश का झोंकर गांव बलिदान, समर्पण और संगठन की मिसाल बना। जानिए स्वयंसेवकों के संघर्ष और इतिहास की कहानी।
बलिदानी गांव से वर्षों तक चुपचाप ओटीसी में जाते रहे स्वयंसेवक
इंदौर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि से झोंकर एक ऐतिहासिक गांव माना जाता है। इंदौर, उज्जैन और शाजापुर के संघ कार्य को भी झोंकर से प्रेरणा मिली है। शाजापुर से 28 और उज्जैन से 44 किमी दूर स्थित यह गांव संघ की दृष्टि से उज्जैन से अधिक जुड़ा रहा है। सन् 1937 में श्री दिगम्बर रावजी तिजारे मक्सी आए थे, इसी कारण उनका झोंकर से निकट संबंध बना। उन्होंने उज्जैन में रहकर मक्सी-झोंकर में प्रवास कर यहां शाखा स्थापित की। प्रारंभ में श्री धूलजीभाई चौधरी, श्री दौलत सिंह, श्री नारायण सिंह चौहान, श्री पूरणसिंह, श्री बिहारीलाल राठौर, श्री बाबूलाल गुप्ता श्री रामनारायण अग्रवाल, श्री रामगोपाल गुप्ता तथा श्री सिद्दनाथ सिंह डोंगरे जैसे युवा जुड़े। पश्चात् श्री भैयाजी कस्तुरे, श्री मदनमोहनजी दुबे, श्री बसन्तीलालजी शर्मा (गजामहाराज) जैसे प्रचारकों ने इन युवकों को तराशा। श्री एकनाथजी रानडे नागपुर से प्रांत प्रचारक नियुक्त होकर आए तो उन्होंने इन ग्रामीण युवकों को संघ शिक्षावर्ग में जाने को प्रेरित किया। श्री नारायणसिंह चौहान जब तृतीय वर्ष के लिए नागपुर गए, तभी उनकी माताजी का देहावसान हो गया, परन्तु वे पूर्ण प्रक्षिक्षण करने के पश्चात् ही वापस लौटे।
झोंकर के तत्कालीन युवकों में संघ शिक्षा वर्ग (ओटीसी) में जाने का जुनून चढ़ गया था। श्री दौलतसिंह जब शिक्षित होकर आये और दोनो हाथो से तलवार घुमाने का प्रदर्शन करते थे तो युवको का उत्साह द्विगुणित हो जाता था। श्री अम्बाराम परिहार एक होनहार युवक था। उसके पिताजी कपड़े सीने का काम करते थे। इस युवक ने भी ओटीसी जाने का निश्चय किया। पिताजी से अनुपम-विनय की। परन्तु वे एक महीने के लिए भेजने को तैयार नहीं थे। अम्बाराम की पूरी तैयारी हो गई थी, उसने पुनः निवेदन किया कि मुझे तो जाना ही है। उसके पिताजी टस से मस नहीं हो रहे थे और क्रोध में बोले कि-'जाओगे तो मार डालूंगा' बात बढ़ गई और अम्बाराम थेला उठाकर घर से बाहर निकला ही था कि पिता का गुस्सा आसमान पर था। आव देखा ना ताव तलवार के एक वार से सिर धड़ से अलग हो गया। गांव में हाहाकार मच गया था। घटना के पश्चात् झोंकर में वर्षों तक स्वंयसेवक चुपचाप बिना बताए ओटीसी में जाते रहे। वे अपनी सामग्री एकत्रित कर अड़ोस-पड़ोस में रख देते थे और यथासमय घर से बिना अनुमति लिए ही निकल जाते थे। इस मैं वर्ष 1968 में अपने तृतीय वर्ष के शिक्षण के लिए नागपुर गया था, तब परिचय में मैंनें झोंकर निवासी बताया तो श्री गुरूजी भाव विभोर हो गए और उन्होंने उपस्थित सभी स्वंयसेवकों को अम्बाराम के बलिदान की गाथा सुनाई। संघ क्षेत्र में झोंकर को 'संघ का गढ़' कहते है।
झोंकर के शिक्षक को निलंबित कर दिया, शेजवलकरजी ने केस लड़ा, 8 वर्ष बाद बहाली हुई ध्वजयुक्त शाखा का मैं प्रथम मुख्य
सन् 1960 से 2000 तक: 1956 झोंकर से हम बाल स्वयंसेवकों की टोली तराना शीत शिविर में गई थी। शारदाशंकरजी व्यास मुख्य शिक्षक थे और श्री भगवानदास जेथलिया तथा श्री रामनाथजी लाठीगण शिक्षक थे। श्री
1957 में पुनः उज्जैन के उण्डासा ग्राम में तालाब किनारे शिविर में बाल स्वयंसेवको नें भाग लिया। श्री दत्ताजी ने डॉ. केलकरजी के निवास पर सायं शाखा के लिए ध्वज प्रदान किया। खातीपुरा में गोपालजी की चक्की के निकट खाली मैदान में इस शिक्षक था। श्री राजाभाऊ के बलिदान के पश्चात् श्री बाबासाहब नातु के प्रवास प्रारम्भ हुए। श्री गोवर्धनलाल गुप्ता को तहसील कार्यवाह का दायित्व दिया गया। उन दिनों संघ कार्य में अभूतपूर्व प्रगती हुई। श्री अर्जुनसिंह, श्री देवनारायण पटेल, श्री देवनारायण सोनी मंत्री, श्री दुर्गाशंकर नागर व श्री मदन शर्मा की टोली ने ग्राम विकास सड़क निर्माण, कन्या शाला, बस संचालन आदि कार्यों को सम्पन्न कराया। इन्ही दिनों श्री संतोषजी त्रिवेदी जिला प्रचारक बनकर आये। श्री बाबासा. नातु की पारखी आंखों ने झोंकर के कार्यकर्त्ताओं के कत्तृव्य को देखकर श्री गोवर्धनलाल गुप्ता को जिला कार्यवाह नियुक्त किया। संघ के साथ-साथ जनसंघ के कार्य में भी प्रगती हुई। कच्छ सत्याग्रह, किसान आंदोलन आदि में सक्रियता के कारण झोंकर के कार्यकर्ता श्री कुशाभाऊ ठाकरे व श्री प्यारेलालजी के प्रिय पात्र बन गए थे। इस कारण भिंड-मुरैना व अन्य दुर्गम क्षेत्रों में इन्हें निर्वाचन में प्रचारार्थ भेजा गया था। वहां से ये टोली यशस्वी होकर लौटी थी।
झोंकर निवासी श्री आत्माराम सोनी सरकारी विद्यालय मे शिक्षक थे। संघ के स्वयंसेवक होने से उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया गया। मा. बाबासा नातु के परामर्श से उनका केस श्री नारायण कृष्णराव शेजवलकरजी (ग्वालियर) ने लड़ा और लगभग 8 वर्ष पश्चात् उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर उनकी पुनर्स्थापना करवाई। जो उस समय एक इतिहास बन गया था। मा. सुदर्शनजी जब प्रांत प्रचारक थे, तब वे भी झोंकर के उत्साही कार्यकर्ताओं के पुरूषार्थ से प्रभावित होकर प्रेरित करते रहते थे। झोंकर के 6 स्वंयसेवक तृतीय वर्ष शिक्षित तथा 50 से भी अधिक द्वितीय वर्ष शिक्षित है।
कश्मीर के सत्याग्रह में झोंकर के नारायण सिंह शामिल हुए
1950 से 1960: झोंकर की पहाड़ी पर शीत शिविर लगाया गया, जिसमें श्री हरीभाऊ वाकणकर मुख्य शिक्षक थे। वही उन्हें 'कायथा संस्कृति' का एक अवशेष भी प्राप्त हुआ था। इसी शिविर में श्री हरिहर प्रपन्न भी उपस्थित थे।
उज्जैन से श्री रामकोटवानीजी का आगमन हुआ और उन्होंने राममंदिर की दूसरी मंजिल पर स्वयंसेवकों को संबोधित किया था। श्री रामगोपालजी गुप्ता ने 'जब दुर्गावती रण में निकली हाथों में थी तलवारे दो' सुनाकर सभी का उत्साहवर्धन किया था। इस कार्यक्रम में मेरे सहित अनेक बाल स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया।
उन दिनों शाखाएं संध्या 8 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि 11 बजे तक चलती थी। ग्रामीण स्वयंसेवक आते जाते थे और कबड्डी खेलने में जुट जाते थे।
संघ के विजयादशमी उत्सव में श्री बाबूलालजी गुप्ता ने श्री अटलजी की कविता- 'हिन्दू तनमन, हिन्दूजीवन, रंग रंग हिन्दू मेरा परिचय' सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
1953 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर सत्याग्रह 'एक देश में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नहीं चलेंगे' सत्याग्रह प्रारंभ किया। झोंकर से श्री नारायणसिंह चौहान को इस सत्याग्रह में जाने के लिए विदाई दी गई।
राजाभाऊ महाकाल सोनकच्छ से आते थे
श्री राजाभाऊ महाकाल सोनकच्छ से तथा श्री कमलाकर शुक्ल मक्सी से आना प्रारम्भ हुए। श्री राजाभाऊ ने झोंकर में श्री मांगीलाल राठौर, श्री जगन्नाथ राठौर, श्री गोवर्धनलाल गुप्ता, श्री अम्बाराम पटेल, श्री रामचरण सिंह जैसे युवाओं को धार दी। उन्होंने झोंकर में मुस्लिम आतंकवाद पर प्रहार किया तथा हिन्दुओं को ताजिए पर चोंगे चढ़ाने और फकीरी पहनने की प्रथा से विलग किया। उनका झोंकर से संबंध काफी गहरा हो गया था। अतः उन्होंने चौक बाजार में स्थित 'द्रोणापुरी महाराज की समाधि' का जीर्णोद्धार करने का बीड़ा उठाया। बाल-तरूण-वृद्ध सभी ने श्रमदान कर उस समाधि को एक सुंदर ओटले के रूप में परिवर्तित कर दिया, जो आज भी बाजार की शोभा बढ़ा रही है। हमें गर्व है कि उन दिनों राजाभाऊ ने हम जैसे बाल स्वयंसेवकों को भी गिलहरी वत छोटे-छोटे कार्यों में संलग्न किया था।
श्री राजाभाऊ ने झोकर में जनसंघ की स्थापना कर श्री रामचन्द्रजी सोनी 'काका' को प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया। इन्हीं दिनों 'गोवा मुक्ति संग्राम' प्रारंभहुआ। हम सभी ग्रामवासियों ने उनको विदाई दी। पश्चात् तो 15 अगस्त 1955 को उनकी शहीदी के समाचार आल इंडिया रेडियो पर सुनकर सारा गांव शोकमग्न हो गया था, जब उनके अस्थिकलश को लेकर श्री कुशाभाऊ ठाकरे मक्सी बस स्टैंड पर आए तब झोंकर, मक्सी व निकटस्थ ग्रामों से हजारों लोग उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली देने उमड़े थे, हर किसी को वह दिन आज भी स्मरण है, श्री राजाभाऊ की लोकप्रियता झोंकर में इतनी थी कि प्रत्येक घर में उनके चित्र आज भी विद्यमान है।
12 स्वयंसेवकों से तीन माह जेल में घट्टी पिसवाई
1937 से 1950 : झोंकर के उत्साही स्वंयसेवकों ने पैदल तथा सायकल पर जाकर निकटस्थ ग्रामों सूरजपुर, खरेली, उपड़ी, कनास्या, सिरोल्या में शाखाएं प्रारंभ की। सन् 1949 में महात्मा गांधीजी की हत्या का आरोप संघ पर मढ़कर प्रतिबंध लगाकर श्री गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस प्रतिबंध के विरोध में झोंकर से संघ के 12 स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारियां दी थी। पश्चात कारागार में उन्हें भंयकर यातनाएं दी गई। श्री बद्रीलाल गुप्ता ने बताया था कि उन्हें घट्टी पीसने की सजा दी गई थी। तीन माह पश्चात् उन्हें छोड़ा गया, परन्तु किसी ने भी क्षमा नहीं मांगी।