हालिया जांच में डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर भारत की संप्रभुता और शांति पर हमले की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। इसमें मेटा और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका उजागर हुई है।
क्या आप वाकई वह देख रहे हैं जो सच है, या आपको सिर्फ वही दिखाया जा रहा है, जो कोई और आपको दिखाना चाहता है? हाल ही में समाप्त हुआ सीजेपी प्रदर्शन केवल एक आंदोलन भर नहीं था, बल्कि इसने आधुनिक भारत के इतिहास में डिजिटल मैनिपुलेशन के सबसे खतरनाक और संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया है। जांच एजेंसियों ने जो खुलासे किए हैं, वे रीढ़ में सिहरन पैदा करने वाले हैं। भारत के भीतर से लेकर विदेशों में बैठी भारत-विरोधी ताकतों और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज के गठजोड़ ने हमारे देश की संप्रभुता और शांति पर डिजिटल माध्यम से जमीनी स्तर पर मल्टीफेस्ड हमला बोला था।
हैरानी की बात यह है कि इस खेल में मेटा के भारत ऑपरेशंस को संभालने वाली टीम के ऑपरेशन मॉडल्स और एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका भी सामने आई है। इतना ही नहीं, देश के 180 से 200 नामचीन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स आज जांच के दायरे में हैं, जिन्होंने किसी खास एजेंडे के तहत समाज में नफरत और भ्रम फैलाने का काम किया। यह देश के युवाओं के लिए एक अलार्म बजाने वाली घंटी है। रील्स और शॉर्ट्स के स्क्रॉल बार के पीछे छिपे इस सच को अब समझना ही होगा।
यह कोई सामान्य आक्रोश नहीं था, बल्कि इसके पीछे मनोविज्ञान और तकनीक का एक क्रूर कॉकटेल काम कर रहा था। जब युवा अपने फोन की स्क्रीन पर किसी क्लिप को देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे एक वास्तविक घटना देख रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे फ्रेमिंग थ्योरी के शिकार हो रहे होते हैं। फ्रेमिंग थ्योरी और सेलेक्टिव आउटरेज के तहत किसी भी घटना के पूरे सच को छिपाकर, उसके एक छोटे और चुनिंदा हिस्से को इस तरह पेश किया जाता है, जिससे देखने वाले के भीतर तुरंत गुस्सा या सहानुभूति पैदा हो। 25 मिनट की शांतिपूर्ण घटना में से केवल 30 सेकंड का वह हिस्सा काटा (Selective Clip-Cutting) जाता है, जहां उत्तेजना हो, और उसे ही अंतिम सच बनाकर परोसा जाता है। इसे कहते हैं 'सिलेक्टिव आउटरेज', यानी गुस्सा भी आपका अपना नहीं है, वह भी किसी पीआर एजेंसी द्वारा प्रायोजित और फ्रेम किया गया है।
लाइट, साउंड और सिनेमैटिक इफेक्ट्स का खेल भी जमकर होता है। कभी ध्यान से देखिएगा, इन प्रोपेगेंडा वीडियोज के पीछे एक खास तरह का भारी, डरावना या उत्तेजित करने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक लगाया जाता है। विजुअल्स की कलर ग्रेडिंग को जानबूझकर डार्क या अत्यधिक कंट्रास्ट दिया जाता है, ताकि अवसाद या गुस्से की भावनाएं तीव्र हो सकें। यह न्यूरो मार्केटिंग और माइंड कंट्रोल का हिस्सा है, जिसका सीधा निशाना नवयुवक होते हैं, क्योंकि इस उम्र में भावनाएं तार्किकता पर हावी हो जाती हैं।
जैसे ही आप कौतूहलवश ऐसे किसी एक वीडियो पर 3-4 सेकंड से ज्यादा रुकते हैं, सोशल मीडिया का अल्गोरिदम सक्रिय हो जाता है। वह आपकी स्क्रीन को वैसे ही सैकड़ों वीडियो से भर देता है। इसे 'इको चैंबर' कहते हैं, जहां आपको लगने लगता है कि पूरी दुनिया में यही हो रहा है और आपका गुस्सा सही है। जबकि हकीकत में, आप उस टेक जायंट के बिजनेस मॉडल और देश-विरोधी नैरेटिव के चक्रव्यूह में फंस चुके होते हैं।
आज धीरे-धीरे इन तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं, पेड इन्फ्लुएंसर्स और डिजिटल आकाओं के चेहरों से नकाब उतर रहा है। लेकिन इस पूरे गंदे खेल में सबसे बड़ा नुकसान किसका होता है? हमारे देश के युवाओं का और आम जनता का। जब एक युवा भड़ककर सड़कों पर उतरता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है या सोशल मीडिया पर नफरत फैलाता है, तो उसका करियर, उसका भविष्य और देश की छवि दांव पर लगती है। जिन इन्फ्लुएंसर्स ने आपको भड़काया, उन्हें तो व्यूज, लाइक्स और डॉलर्स मिल गए, लेकिन जमीन पर नुकसान सिर्फ आम भारतीय का हुआ।
हमें यह समझना होगा कि हर चमकती हुई चीज या स्क्रीन पर तैरता हुआ हर रोता-चिल्लाता चेहरा हमेशा पीड़ित नहीं होता। सोशल मीडिया का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करना आज के समय की सबसे बड़ी देशभक्ति है। किसी भी खबर को फॉरवर्ड करने, उस पर प्रतिक्रिया देने या सड़कों पर उतरने से पहले खुद से पूछें, 'इस वीडियो का सोर्स क्या है? क्या मैं पूरी कहानी जानता हूं?'
आज भारत वैश्विक पटल पर एक नई महाशक्ति बनकर उभर रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ रही है, तकनीक और बुनियादी ढांचे में हम आत्मनिर्भर हो रहे हैं। लेकिन यह प्रगति कुछ वैश्विक ताकतों और उनके वामपंथी विचारकों के गठजोड़ को हजम नहीं हो रही है। जब वे भारत को बाहरी मोर्चे पर नहीं हरा पाते, तो वे 'ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज' के साथ मिलकर इसे अंदर से अस्थिर करने की साजिश रचते हैं।
सीजेपी प्रदर्शन के पीछे की यही कड़वी हकीकत थी। वे नए-नए तरीकों से, नए-नए मुद्दों को उछालकर देश में अराजकता और अशांति का माहौल बनाए रखना चाहते हैं, ताकि विदेशी निवेश रुके, देश की विकास दर थमे और युवा रचनात्मक कार्यों को छोड़कर आंतरिक कलह में उलझ जाएं।
हमें अब बेहद सावधान रहने की आवश्यकता है। किसी के बहकावे में आकर 'इन्फ्लुएंस्ड डिसीजन' यानी किसी के प्रभाव में लिया गया फैसला नहीं करना है, बल्कि आपको तथ्यों को जांचकर एक 'वेल-इन्फॉर्म्ड डिसीजन' यानी पूर्णतः सचेतन और जागरूक फैसला लेना है। आपकी ऊर्जा इस देश का भविष्य है, इसे किसी भी देश-विरोधी प्रोपेगेंडा की भट्टी में स्वाहा मत होने दीजिए।
सजग बनिए, भारतीय मूल्यों को पहचानिए और इस डिजिटल युद्ध में देश के सुरक्षा कवच बनिए। भारत विश्व का सबसे युवा देश है। इसके युवाओं पर सबकी नजर है। हमें अपने आचरण से घोषणा करनी है कि भारत-विरोधी शक्तियां इस देश को सड़कों की भीड़ की अराजकता में नहीं झोंक सकतीं। हम सभी को देश, संविधान, सदन, संवाद और समन्वय से आगे बढ़ाना है।

विप्लव विकास
(लेखक कोलकाता निवासी स्तंभकार हैं)