मनोहरराव मोघे की जीवनी, जिन्होंने अपने त्याग और समर्पण से संघ कार्य को आगे बढ़ाया, युवाओं को राष्ट्रकार्य की प्रेरणा दी।
नागपुर का संघ शिक्षा वर्ग चल रहा प्रशिक्षण के कठोर अनुशासन, बौद्धिक चर्चाओं और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत वातावरण के बीच एक युवक अपने जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय ले रहा था। घर से संदेश आया था कि विवाह की तिथि निश्चित हो चुकी है और उसे तत्काल लौटना चाहिए। पिता ने स्वयं पत्र लिखकर आग्रह किया था। पर उस युवक ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया 'मैं वर्ग छोड़कर नहीं जाऊँगा।' जब डॉक्टर हेडगेवार ने समझाया, तब उसने केवल एक शर्त रखी विवाह के बाद उसे पुनः वर्ग में लौटने की अनुमति मिलनी चाहिए। अनुमति मिली। वह विवाह के एक दिन पूर्व इंदौर पहुँचा, वैवाहिक संस्कार सम्पन्न किया और दूसरे ही दिन नागपुर लौटकर पुनः शिक्षा वर्ग में सम्मिलित हो गया। यह युवक था- मध्यभारत में संघ कार्य की नींव को अपने श्रम, त्याग और तपस्या से सींचने वाले मनोहरराव मोघे।
सन् 1935 में स्वयंसेवक बने मनोहरराव मोथे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने संघ कार्य को केवल संगठनात्मक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन-साधना माना। 1937 में उन्होंने प्रांत से सबसे पहले संघ शिक्षा वर्ग किया तथा बाद में द्वितीय और तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। प्रारंभ से ही उनमें कार्य के प्रति ऐसी निष्ठा थी कि व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन के बीच कभी कोई संघर्ष दिखाई नहीं दिया; राष्ट्रकार्य सदैव उनकी प्राथमिकता बना रहा।
साइकिल पर चलता संगठनः आज जब संचार और परिवहन के असंख्य साधन उपलब्ध हैं, तब यह कल्पना करना कठिन है कि एक समय पूरे प्रांत का संगठनात्मक प्रवास साइकिल से किया जाता था। इंदौर, धार, देवास, रतलाम और निमाड़ सहित विस्तृत क्षेत्र में संघ कार्य का विस्तार करने के लिए मनोहररावजी महीनों तक साइकिल से यात्रा करते रहे। उस समय वे औपचारिक रूप से प्रांत प्रचारक नहीं थे, किंतु उनकी कार्यवृत्ति किसी प्रांत प्रचारक से कम नहीं थी। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में वे निकलते तो लगभग एक माह तक निरंतर प्रवास करते हुए पूरे क्षेत्र का भ्रमण कर वापस लौटते। धूल भरे मार्ग, लंबी दूरियों और साधनों का अभाव उनके उत्साह को कभी कम नहीं कर सके।
जब जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित श्री मनोहरराव मोघे
हुआः सन् 1942 के खंडवा संघ शिक्षा वर्ग में बाबासाहब आप्टे आए थे। चर्चा के दौरान मनोहररावजी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखा कि प्रशिक्षित और जिम्मेदार स्वयंसेवक नौकरी अथवा व्यवसाय के कारण बाहर चले जाते हैं, जिससे कार्य प्रभावित होता है। इसका समाधान क्या हो? बाबासाहब का उत्तर था -'समय आ गया है कि नवयुवक अपने जीवन के कम से कम दो वर्ष राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित करें।' यह केवल एक उत्तर नहीं था, बल्कि एक आह्वान था। इंदौर के सात स्वयंसेवकों ने उसी क्षण इसे स्वीकार करने का निश्चय किया। उनमें स्वयं मनोहरराव मोघे भी थे। शीघ्र ही वे प्रचारक जीवन में प्रविष्ट हुए और उज्जैन में कार्य करने लगे।
संगठन के प्रति आजीवन निष्ठा
सन् 1945 में भैयाजी दाणी के नागपुर लौटने के बाद मनोहररावजी ने पुनः प्रांत का कार्य संभाला। बाद में मध्यभारत प्रांत के पुनर्गठन के पश्चात उन्हें प्रांत कार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। 1977 तक वे इस उत्तरदायित्व का निर्वहन करते रहे। दायित्व से मुक्त होने के बाद भी उनका सक्रिय जीवन समाप्त नहीं हुआ। वे स्वयं को सदैव एक साधारण स्वयंसेवक ही मानते रहे। शाखा की नियमितता, कार्यकर्ताओं से संपर्क और संगठन को आवश्यक मार्गदर्शन देना उनके जीवन का स्वाभाविक क्रम बना रहा। आज भी मनोहरराव मोघे का जीवन यह सिखाता है कि संगठन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत त्याग, अनुशासन और निरंतर कर्म से खड़ा होता है। मनोहरराव मोघे की जीवनयात्रा हमें बताती है कि जब व्यक्ति स्वयं को किसी महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर देता है, तब उसका जीवन केवल निजी कथा नहीं रह जाता, वह इतिहास की प्रेरक धरोहर बन जाता है।
परिवार, जिसने तपस्या को समझा
राष्ट्रकार्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों के पीछे प्रायः एक त्यागी परिवार भी खड़ा होता है। मनोहररावजी का जीवन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। एक बार उन्हें संघ शिविर में जाना था। ठीक दो दिन पहले उनकी दादीजी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। परिवार को आशंका थी कि अंतिम समय निकट है। ऐसे में उनके पिता ने उन्हें बुलाकर कहा - 'तुम्हें शिविर में जाना है। यदि कोई अनहोनी हो गई तो फिर तुम्हारा जाना संभव नहीं होगा। इसलिए आज ही निकल जाओ, यहाँ की चिंता मत करो।' यह केवल अनुमति नहीं थी: यह राष्ट्रकार्य के प्रति परिवार की आस्था का प्रमाण था।
पत्नी का मौन बलिदान
मनोहररावजी के जीवन का एक अत्यंत प्रेरक पक्ष उनकी धर्मपत्नी का योगदान है। उन्होंने कभी संघ कार्य का विरोध नहीं किया, पर यह भी चाहा कि परिवार किसी पर बोझ न बने। स्वयं शिक्षित होने के कारण उन्होंने नौकरी करने की इच्छा व्यक्त की। प्रयास हुए और उन्हें उज्जैन के एक कन्या विद्यालय में अध्यापिका का कार्य मिल गया। उस समय समाज में महिलाओं का अकेले बाजार जाना, घर की आर्थिक जिम्मेदारी उठाना या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना सामान्य बात नहीं थी। किंतु जब मनोहररावजी संघकार्य के लिए प्रवास पर रहते, तब घर-परिवार, बच्चों की देखभाल, अतिथियों का सत्कार और दैनिक जीवन की समस्त जिम्मेदारियों उनकी पत्नी निभातीं। सामाजिक ताने, उपेक्षा और कठिनाइयों भी आई, पर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। यह त्याग भी मनोहररावजी की साधना का अभिन्न हिस्सा था।