नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू के सबसे लंबे प्रधानमंत्रित्वकाल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है और 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। भाजपा और राजग ने इस उपलब्धि का जश्न मनाया।
राजकुमार सिंह
नरेंद्र मोदी भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले प्रधानमंत्री बन गए हैं। 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बराबरी की थी, तो अब प्रधानमंत्रित्वकाल के मामले में उनका रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। जाहिर है, मोदी की इस उपलब्धि का भाजपा और राजग ने जश्न भी मनाया।
1989 के बाद देश जिस राजनीतिक अस्थिरता से गुजरा, उसके मद्देनजर इतना लंबा प्रधानमंत्रित्वकाल महज आंकड़ों की बात नहीं है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इसके गहरे निहितार्थ हैं। मोदी स्वतंत्र भारत में जन्मे देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकारों का नेतृत्व तो मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल ने भी किया, पर वे मूलतः कांग्रेसी ही थे। सही मायनों में देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बने।उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में देश ने दूसरा परमाणु परीक्षण भी किया, लेकिन गठबंधन सहयोगियों पर टिकी उनकी सरकारें हिचकोले ज्यादा खाती रहीं। पहली बार तो बहुमत साबित किए बिना ही 13 दिन में विदा हो गई, जबकि दूसरी बार 13 महीने चल पाई। तीसरी बार वाजपेयी सरकार कुछ अटल नजर आ रही थी, तो ‘शाइनिंग इंडिया’ की आत्ममुग्धता में समय पूर्व चुनाव की शिकार हो गई।
उसके बाद लगातार दस साल कांग्रेसनीत संप्रग शासन और भाजपा के दो बार चुनावी पराभव के मद्देनजर देखें, तो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने के बाद बदली देश की राजनीतिक तस्वीर का सही महत्व समझा जा सकता है।देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में मात्र 44 सीटों पर सिमट गई, तो चार दशक लंबे अंतराल के बाद किसी एक दल के रूप में भाजपा स्पष्ट बहुमत पाने में सफल हो गई। दरअसल, 2014 का चुनाव परिणाम केंद्र में सत्ता परिवर्तन से ज्यादा देश की राजनीति का परिवर्तन था, जो अब लगातार तीसरी बार केंद्र में मोदी सरकार और देश के तीन-चौथाई राज्यों में भाजपा या राजग सरकार के रूप में हमारे सामने है।
इसलिए मोदी के प्रधानमंत्रित्वकाल के 12 साल सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि देश के राजनीतिक परिदृश्य में निर्णायक बदलाव का संकेत भी हैं। मुख्य शासक दल के रूप में भाजपा ने कांग्रेस की जगह ले ली है, पर सक्रिय और प्रभावशाली विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस अभी तक भाजपा की जगह लेती नहीं दिखती।2014 में 44 सीटों पर सिमटी कांग्रेस विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ बनाकर 2024 में अपनी सीटें 99 तक पहुंचाने में तो सफल रही, पर गठबंधन धर्म से लेकर जिम्मेदार विपक्ष तक की भूमिका के निर्वहन में नाकाम ही नजर आती है।बेशक, 2019 के लोकसभा चुनाव में 282 से आगे बढ़कर 303 सीटों तक पहुंची भाजपा 2024 में 240 सीटों पर ही ठिठक गई, लेकिन ऐन चुनाव से पहले चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) की राजग में वापसी सत्ता की हैट्रिक के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक साबित हुई।
यह सच है कि यह भाजपा नहीं, राजग सरकार है, पर सरकार की कार्यशैली पर उसका ज्यादा असर नजर नहीं आता। बेशक, संसदीय लोकतंत्र में संख्या गणित महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए संसद में परिसीमन विधेयक गिर गया, लेकिन उसे दोबारा लाकर पारित करवाने को प्रतिबद्ध मोदी सरकार किसी भी मोर्चे पर अपनी रफ्तार मंद करती नजर नहीं आती।चुनौतियां पिछले प्रधानमंत्रित्वकालों में भी पेश आई थीं, लेकिन मोदी सरकार कई मोर्चों पर ऐतिहासिक दिशा-परिवर्तन में सफल रही है। धारा 370 की समाप्ति, तीन तलाक प्रथा की समाप्ति, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और समान नागरिक संहिता राजनीतिक मुद्दे तो दशकों से रहे, पर उन्हें मुकाम तक मोदी सरकार ने ही पहुंचाया।
राज्यसभा में बहुमत के बिना ऐसे दिशा-परिवर्तक निर्णय सरकार के दृढ़ संकल्प के साथ ही कुशल राजनीतिक प्रबंधन का प्रमाण भी हैं। बेशक, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय से आया, लेकिन उसके लिए जरूरी और अनुकूल पैरवी का श्रेय सरकार को भी जाता है।विधायिका में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण 2029 से लागू करने के इरादों पर परिसीमन विधेयक के अटकने से ब्रेक तो लगा है, पर खासकर पश्चिम बंगाल में जीत के बाद तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों में वह ब्रेक इसी साल हट जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ‘एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में भी सरकार बढ़ ही रही है।
बात पश्चिम बंगाल की हो रही है, तो मोदी राज में भाजपा के राजनीतिक विस्तार पर भी नजर डालना जरूरी है। पूर्ववर्ती जनसंघ के 1977 में जनता पार्टी में विलय के बाद 1980 में नया अवतार लेने वाली भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में मात्र दो सीटों पर सिमट गई थी। उसी चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस 400 से भी ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही थी, जो उपलब्धि फिर किसी प्रधानमंत्री और दल को नहीं मिली।जाहिर है, वैसी निराशाजनक शुरुआत के बाद केंद्रीय सत्ता तक का सफर आसान तो हरगिज नहीं रहा। कभी 13 दिनों में केंद्रीय सत्ता से विदाई झेली, तो कभी 13 महीने में। वही भाजपा आज न सिर्फ केंद्र में लगातार तीसरी बार सत्तारूढ़ है, बल्कि देश के तीन-चौथाई राज्यों में भी उसकी या उसकी अगुवाई वाले राजग की सरकारें हैं।
कभी शहरी सवर्ण वर्ग की पार्टी कही जाने वाली भाजपा का कमल आज पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिम भारत तक खिल रहा है। गुजरात में वह दशकों से सत्ता में है, तो हरियाणा जैसे राज्य में भी उसने सत्ता की हैट्रिक का करिश्मा कर दिखाया है। उत्तर प्रदेश में भी अगले साल सत्ता की हैट्रिक को लेकर शायद ही किसी को संदेह हो।बिहार में पहले भाजपाई मुख्यमंत्री का सपना साकार हो चुका है, तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मस्थली पश्चिम बंगाल में भी पिछले महीने प्रचंड बहुमत से भाजपा की सरकार पदारूढ़ हो चुकी है। हां, दक्षिण भारत में सत्ता का सूनापन अवश्य अखरता होगा, पर वहां की भिन्न जमीनी राजनीतिक जरूरतों को समझे बिना और उसके अनुरूप दीर्घकालिक रणनीति बनाए बिना वहां कमल खिल पाना मुश्किल है।
दक्षिण भारत की राजनीति का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले कर्नाटक में कमल खिला भी था, पर उसके मुरझा जाने में बागवानों की गलतियां भी कम नहीं रहीं। फिर भी, मुश्किलों के बीच मोदी की यह मैराथन भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक अध्याय है।