प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 जून 2026 को जवाहरलाल नेहरू के सबसे लंबे समय तक सेवारत प्रधानमंत्री के रिकॉर्ड को तोड़ दिया।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 10 जून 2026 की तारीख सदा के लिए दर्ज हो जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दिन भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन जाएंगे। वह देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए बतौर प्रधानमंत्री 4,399 दिन पूरे करेंगे।
गुजरात के अत्यंत साधारण गैर-राजनीतिक परिवार से आने वाले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे मोदी का 2014 से लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतना और इतने लंबे समय तक विविधताओं वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश, यानी भारत का प्रधानमंत्री बने रहना अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है।अपने बारह वर्ष के शासनकाल में मोदी ने अनेक मोर्चों पर कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं और वैश्विक स्तर पर भारत को एक नई पहचान दिलाई है। संघ के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'हिंदुत्व' की विचारधारा से प्रभावित मोदी सरकार की हर नीति 2047 तक देश को 'विकसित भारत' बनाने की दिशा में अग्रसर है, फिर चाहे वह उनकी सामाजिक नीति हो, आर्थिक नीति हो या फिर विदेश नीति।
वैश्विक ऊहापोह और अराजकता के इस दौर में यदि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को साध पाने में सफल हो पा रहा है तो इसका कारण मोदी के बारह वर्ष के कार्यकाल में अपनाई गई विदेश नीति है, जिसकी प्रशंसा हो रही है और जिसका अध्ययन विदेश नीति के पंडित एवं जानकार बड़ी बारीकी से कर रहे हैं।2014 में जब मोदी ने देश की सत्ता संभाली तो कई विश्लेषकों को यह आशंका थी कि चूंकि वह केंद्र सरकार के किसी पद पर पहले नहीं रहे हैं, इस कारण शायद मोदी इस मामले में अपेक्षाकृत उतने सफल नहीं होंगे। परंतु इतने वर्षों में जिस तरह से मोदी के शासनकाल में भारत की वैश्विक साख और सम्मान में वृद्धि हुई है, उसे उनके आलोचक भी नकार नहीं सकते। कई टिप्पणीकारों का मानना है कि मोदी ने भी भारत की विदेश नीति में उसी तरह की रुचि दिखाई है, जिस तरह नेहरू दिखाया करते थे।
सनद रहे कि नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ पंद्रह वर्ष से अधिक समय तक देश के विदेश मंत्री भी रहे और इसीलिए लंबे समय तक भारतीय विदेश नीति में उनके वैचारिक दृष्टिकोण की छाप देखने को मिली। हालांकि, इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन वर्ष 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद देखने को मिला।
नेहरू और मोदी की तुलना के आधार
इस बात में कोई संशय नहीं है कि किसी भी वर्तमान नेता की अतीत के किसी दूसरे नेता से तुलना करना अपने आप में बहुत जटिल कार्य है, क्योंकि दोनों अलग-अलग परिप्रेक्ष्य एवं कालखंड में काम कर रहे होते हैं। परंतु चूंकि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने नेहरू के रिकॉर्ड को तोड़ा है, ऐसे में दोनों के बीच तुलना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है।जहां तक विदेश नीति की बात है, तो इस मामले में दोनों नेताओं की समझ में कुछ आमूलचूल अंतर हैं, जिसके कारण दोनों की नीतियों में भिन्नता बहुत स्पष्ट दिखाई देती है।
सबसे पहला अंतर तो दोनों नेताओं के अपने देश भारत को परिभाषित करने में ही दिखाई देता है। समाजवाद, आदर्शवाद और आधुनिकतावाद जैसी यूरोपीय विचारधाराओं के चश्मे से दुनिया को देखने वाले नेहरू के लिए भारत एक देश और राष्ट्र-राज्य के रूप में वर्ष 1947 में अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अस्तित्व में आया। वहीं मोदी के लिए भारत एक 'सभ्यतागत राज्य' है, जिसकी संस्कृति और इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, जो लोकतंत्र की जननी रहा है, जिसने अतीत में पूरे विश्व को अपने ज्ञान से रोशन किया है और जो प्राचीन काल से अस्तित्व में है। उनके अनुसार, 1947 में भारत केवल अंग्रेजी उपनिवेशवाद से मुक्त हुआ था।
दोनों नेताओं में दूसरा अंतर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को विदेश नीति से जोड़ने को लेकर है। जहां एक ओर नेहरू मानते थे कि चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, जहां मुसलमान बड़ी संख्या में रहते हैं, इसलिए इसे उसकी हिंदू संस्कृति और इतिहास से दूर रखा जाना चाहिए, ताकि मुसलमानों की भावनाएं आहत न हों। इसी कारण उनके कार्यकाल में भारत हर मंच पर स्वयं को एक आधुनिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में प्रस्तुत करता रहा, जिसका आधार उसकी वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था थी।इसके विपरीत, मोदी ने भारत की प्राचीन सनातन सभ्यता को विदेश नीति से दूर करने के बजाय उसे और मजबूती के साथ जोड़ा है। भारत की प्राचीन सभ्यता की नींव पर आगे बढ़ते हुए मोदी ने 'पंचामृत' को विदेश नीति के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें गरिमा, संवाद, समृद्धि, सुरक्षा तथा सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
इससे राजकीय यात्राओं और बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान भारत की विरासत, जैसे बौद्ध पर्यटन स्थल, आयुर्वेद, शास्त्रीय कलाएं और आध्यात्मिक परंपराओं को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने में मदद मिली है, जिससे भारत समकालीन चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान साझा करने वाले 'विश्व गुरु' के रूप में स्थापित हुआ है।तीसरा अंतर दोनों नेताओं की कूटनीतिक रणनीति को लेकर है। जहां नेहरू भारत को आदर्शवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर विश्वास, गुटनिरपेक्षता और उपनिवेशवाद-विरोधी विचारधारा के ढांचे में रखते थे, वहीं मोदी के नेतृत्व में भारत यथार्थवाद, हित-आधारित संबंधों और बहु-संरेखण की विचारधारा को अपनाते हुए न केवल अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए हुए है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी प्रभावी ढंग से साध रहा है।
इस बात को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। पहला उदाहरण चीन को लेकर नेहरू की समझ का है। अपने आदर्शवाद, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अति-विश्वास तथा उपनिवेशवाद-विरोधी और उदारवादी अंतरराष्ट्रीयतावाद की विचारधारा के चलते नेहरू चीन पर विश्वास करने की गलती कर बैठे, जिसका नुकसान भारत को 1962 के भारत-चीन युद्ध के रूप में उठाना पड़ा।दूसरा उदाहरण कश्मीर समस्या है। नेहरू ने शांतिवाद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विश्वास पर आधारित नैतिक कूटनीति से प्रेरित होकर 1 जनवरी 1948 को कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास इस उम्मीद से भेज दिया कि अंतरराष्ट्रीय निगरानी में जनमत संग्रह के जरिए इसका जल्द और निष्पक्ष समाधान निकल आएगा।
उनके इस कदम ने कानूनी विलय और सैन्य आवश्यकता से जुड़े एक द्विपक्षीय मुद्दे को लंबे अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 47 (1948) आया, युद्धविराम रेखाएं बनीं और पाकिस्तान ने बार-बार इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया, जिससे दशकों तक भारत की स्थिति जटिल बनी रही।दूसरी ओर, मोदी ने जम्मू-कश्मीर को भारत में पूरी तरह शामिल करने से जुड़े अपने साहसिक कदमों के जरिए इस विरासत को निर्णायक रूप से बदलने का प्रयास किया। 5 अगस्त 2019 को उनकी सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश और संसदीय प्रस्ताव के माध्यम से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए को समाप्त कर दिया तथा जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) के रूप में भारतीय संघ में पूरी तरह शामिल कर लिया।
इससे वह विशेष दर्जा समाप्त हो गया, जिसके कारण घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा मिलता था। उनके इस कदम के पीछे मोदी की पार्टी के वैचारिक प्रेरणास्रोत श्यामा प्रसाद मुखर्जी का वह सपना था, जिसके अंतर्गत वे कश्मीर में 'एक विधान, एक प्रधान और एक निशान' की व्यवस्था लागू कराना चाहते थे।