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लोकतंत्र की आधी रात की गिरफ्तारी

आपातकाल की आपबीती: मधु भैया नहीं, आधी रात को गिरफ्तार हुआ था लोकतंत्र

1975 में आपातकाल के दौरान मधु भैया की गिरफ्तारी और उनके परिवार के संघर्ष की दास्तान। इस घटना ने लोकतंत्र पर कैसे प्रहार किया, यह बताया गया है।


आपातकाल की आपबीती मधु भैया नहीं आधी रात को गिरफ्तार हुआ था लोकतंत्र 

चन्द्रवेश पाण्डे

25 जून 1975 की रात देश सो रहा था, लेकिन सत्ता जाग रही थी। लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार होने वाला था। उसी रात ग्वालियर के वरिष्ठ अधिवक्ता, जनसंघ और बाद में भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता माधव शंकर इंदापुरकर, जिन्हें सभी स्नेह से 'मधु भैया' कहते थे, गिरफ्तार कर लिए गए। संयोग देखिए, उस रात वे अपनी बहन शालिनी मुले को रेलवे स्टेशन छोड़ने गए थे। वहीं पुलिस कर्मियों ने घेरा डाल दिया और ट्रेन के छूटते ही कहा, 'हमें आपको साथ ले जाने का आदेश है।' कारण नहीं बताया पर काफी आग्रह के बाद उन्हें घर जाकर परिवार को सूचना देने की अनुमति मिली।

फालके की गोठ स्थित घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी मालती इंदापुरकर को पूरी बात बताई। तेरह वर्षीय पुत्र यशवंत मिसहिल स्कूल में नौवीं कक्षा के छात्र थे और पुत्री नंदिनी पद्मा विद्यालय में पढ़ती थीं। मालती जी बार-बार पूछती रहीं, 'कब लौटेंगे?' लेकिन इसका उत्तर स्वयं मधु भैया के पास भी नहीं था। वर्षों बाद उन दिनों को याद करते हुए मालती जी कहती हैं, 'हमें तो यह भी नहीं मालूम था कि इमरजेंसी क्या होती है। मैंने डिक्शनरी में उसका अर्थ खोजा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही था कि "ये कब लौटेंगे।'जयेन्द्रगंज थाने में मधु भैया को एक कमरे में बैठा दिया गया। कुछ देर बाद समाजवादी नेता और अधिवक्ता विष्णुदत्त तिवारी को भी वहीं लाया गया। एक जनसंघी और एक समाजवादी, विचार अलग थे, लेकिन उस रात दोनों का अपराध एक ही था, लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय होना।

थानेदार और पुलिसकर्मी सो गए तो कमरे में रखे टेलीफोन का उपयोग कर दोनों नेताओं ने मित्रों और साथियों को चेताना शुरू कर दिया। वरिष्ठ नेता नारायण कृष्ण शेजवलकर भी उनमें एक थे। संभवतः लोकतंत्र की अंतिम चेतावनियों में से एक किसी पुलिस थाने के भीतर से दी जा रही थी।अगले दिन उन्हें कोतवाली ले जाया गया। दो दिन बाद केंद्रीय जेल भेज दिया गया। इसी दौरान पुलिस अधीक्षक ने उनसे एक राजनीतिक कार्यकर्ता को फोन कर बुलाने का आग्रह किया ताकि उसे गिरफ्तार किया जा सके, लेकिन मधु भैया ने साफ इंकार कर दिया। 

शुरुआत में यह तक पता नहीं था कि आखिर हुआ क्या है। फिर समाचार मिला कि देश में आपातकाल लागू हो चुका है। संविधान के मूल अधिकार निलंबित हैं, मीसा के तहत गिरफ्तारियां हो रही हैं, अदालतों के दरवाजे बंद हैं और अखबारों पर सेंसरशिप लागू है। लोकतंत्र का गला घोट दिया गया है।करीब दो महीने बाद एक दिन अचानक मधु भैया और उनके साथियों को सामान सहित जेलर कार्यालय बुलाया गया। बिना कोई जानकारी दिए उन्हें रेलवे स्टेशन ले जाया गया। हिन्दुस्तान समाचार एजेंसी के पत्रकार बनवारीलाल बजाज को इसकी सूचना मिल गई। वे तत्काल मालती यशवंत को लेकर स्टेशन पहुंचे। जी और पुत्र यशवंत इंदापुरकर आज भी उस दृश्य को याद कर भावुक हो उठते हैं। 'जब हम पहुंचे, पिताजी, शीतला सहाय जी आदि को पुलिस घेरे में प्लेटफार्म पर लाकर ट्रेन में बिठा दिया गया, हमें उनसे बात तक नहीं करने दी गई। केवल एक झलक मिली। उन्होंने हमें देखा और हमने उन्हें। बस इतना ही।

भोपाल होते हुए उन्हें रायसेन जिले की बेगमगंज उपजेल भेजा गया। यह छोटी जेल थी, जहां पहले डकैत रखे जाते थे। यहीं उन्होंने अपने मीसाबंदी जीवन का अधिकांश समय बिताया। उनके साथ कुशाभाऊ ठाकरे, नारायण कृष्ण शेजवलकर, विष्णुदत्त तिवारी, प्यारेलाल खंडेलवाल, शीतला सहाय निर्भयसिंह पटेल जैसे अनेक वरिष्ठ नेता भी निरुद्ध थे। यशवंत जी बताते हैं कि परिवार या तो विवेक जी शेजवलकर के साथ उनकी फिएट कार से या रोडवेज की बस में बेगमगंज मिलने जाता था। वहां के जेलर श्री चतुर्वेदी संवेदनशील व्यक्ति थे। कई बार वे परिवार को अपने घर भोजन के लिए ले जाते थे। उन्होंने मधु भैया को जेल कार्यालय का काम सौंप दिया था। जेल के भीतर का इतिहास लिखा गया, लेकिन बाहर प्रतीक्षा करते परिवारों का दर्द कम दर्ज हुआ। मालती जी बताती हैं कि घर की आय लगभग रुक गई थी। वकालत की फीस देने कुछ लोग आते थे, लेकिन वे पत्र लिखकर मधु भैया से पुष्टि करने के बाद ही पैसा स्वीकार करती थीं। सरस्वती शिशु मंदिर के प्राचार्य अरविंद धारप ने उन्हें विद्यालय में नौकरी का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन संयुक्त परिवार के संबल इसकी आवश्यकता नहीं पड़ने दी।

लगभग बाईस महीनों तक परिवार ने आर्थिक और मानसिक संघर्ष झेला। बच्चों ने कभी कोई मांग नहीं की। वे केवल इतना कहते थे, 'अप्पा आ जाएंगे, तब ले लेंगे। उधर अनेक कार्यकर्ता भूमिगत रहकर मीसाबंदियों के परिवारों की सहायता कर रहे थे। पी.एन. केलकर कानूनी मदद करते थे। पूर्व मंत्री जगदीश गुप्ता सरदार के वेश में सक्रिय थे। संघ के वरिष्ठ प्रचारक तराणेकर जी और उनके सहयोगी अपरबल सिंह भी गुप्त रूप से परिवारों की चिंता करते थे। इसी दौरान स्वयं पैरोल पर आए अटल बिहारी वाजपेयी भी परिवार का हालचाल जानने उनके घर पहुंचे थे। यह उस दौर की आत्मीयता और संगठनात्मक संवेदना का प्रमाण था।

करीब इक्कीस महीनों के संघर्ष के बाद आपातकाल समाप्त हुआ और मधु भैया घर लौटे। उनकी यह कहानी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी की नहीं है। यह उस समय की स्मृति है जब आधी रात को लोकतंत्र गिरफ्तार हुआ था, जब नागरिकों को बिना अपराध बताए जेलों में डाल दिया गया था और जब हजारों परिवारों ने अनिश्चितता, भय और प्रतीक्षा को अपना दैनिक जीवन बना लिया था।

आज लोकतंत्र के उत्सव के बीच मधु भैया जैसे मीसाबंदियों की स्मृतियां हमें याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता केवल संविधान की पंक्तियों में नहीं बसती। वह उन लोगों के साहस में जीवित रहती है जिन्होंने सलाखें स्वीकार कर लीं, लेकिन अपने विचारों को कैद नहीं होने दिया। बहरहाल अपातकाल के तत्तकाल बाद हुए विधानसभा चुनावों में मधु भैया चुनाव लड़े, जीते और विधायक भी बनें। 



 

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