कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह के कारण राज्यसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी खारिज हुई। इस घटना ने पार्टी के अंदरूनी संघर्ष को उजागर किया।
राजदेव पांडेय
क्या कांग्रेस के नेताओं ने अपने ही राजनीतिक दल की संपूर्ण राजनीतिक हत्या की सुपारी ले रखी है? आज इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ 'हां' में ही है। स्वयं को गांधीवादी और शुचिता की राजनीति करने का दंभ भरने वाली कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार झूठ बोलती हैं। नैतिकता से उनका कोई वास्ता नहीं है। मीनाक्षी नटराजन के झूठ को कांग्रेस के किन निष्ठावान सिपाहियों ने भाजपा को जाकर बताया? यह अब राज भी नहीं है। इसलिए भाजपा इसमें अपनी संभावना तलाशे तो उसे दोष देना कांग्रेस का मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नेत्री मीनाक्षी नटराजन की मध्यप्रदेश से राज्यसभा सीट की उम्मीदवारी मंगलवार को निरस्त हो चुकी है। बेशक, मीनाक्षी का नामांकन खारिज होने का मामला सीधे तौर पर एक तकनीकी चूक से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने राज्यसभा की उम्मीदवारी के दौरान दिए शपथ पत्र में एक खास प्रकरण की सूचना न देने की गलती की। लेकिन इस गलती की सूचना नामांकन के कई दिन बाद विरोधी पक्ष के हाथ में आना महज संयोग नहीं है। दरअसल, यह कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से उपजा एक प्रयोग है। इस प्रयोग में कांग्रेस के ही किसी धड़े ने अपने ही उम्मीदवार के विरोध में प्रकरण से जुड़ी जानकारी जुटाकर बाहर कर दी। परिणामस्वरूप, राज्यसभा के लिए कांग्रेस की उम्मीदवारी शून्य हो गई। भाजपा का तीसरा उम्मीदवार निर्विरोध राज्यसभा पहुंच गया। दरअसल, यह कांग्रेस की तरफ से भाजपा को वॉकओवर देने जैसा हुआ।
इस सियासी प्रयोग से एक अंग्रेजी कहावत 'Crabs in a Bucket' (टोकरी में केकड़े) चरितार्थ हो गई। जिसे हिंदी में कहा जा सकता है कि किसी को आगे बढ़ने से रोकने की केंकड़ा मानसिकता रखना। दरअसल, इसका आशय यह है कि बाल्टी या टोकरी में रखे केकड़ों में से कोई एक बाहर निकलने की कोशिश करता है, तो दूसरे केकड़े उसे पकड़कर वापस नीचे खींच लेते हैं। इसलिए कोई भी बाहर नहीं निकल पाता। कांग्रेस के क्षत्रपों ने भी यही किया। साबित कर दिया कि "हम नहीं तो तुम भी नहीं।"फिलहाल, इससे साफ हो गया है कि कांग्रेस के अंदरूनी हालात बेहद बदतर हैं। आपसी खींचतान में लगे कांग्रेस के क्षत्रपों ने पिछले विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार से भी सबक नहीं लिया। वे अभी भी आपस में गलाकाट प्रतिस्पर्धा में डूबे हुए हैं।
मंगलवार को हुआ यह घटनाक्रम पूरी तरह से कांग्रेस आलाकमान के लिए बहुत बड़ा झटका ही नहीं, बल्कि चुनौती भी है। बात साफ हो गई है कि कांग्रेस आलाकमान का पार्टी की अंदरूनी कलह पर कोई नियंत्रण नहीं है। यूं कहें कि इसका अंदाजा भी उसे नहीं है। क्या यह हैरत की बात नहीं है कि एक ओर कांग्रेस आलाकमान अपने विधायकों को किसी भी प्रलोभन से बचाने के लिए चार्टर्ड प्लेन से उन्हें कर्नाटक ले जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी पर बड़े नाटकीय ढंग से सवाल उठ गया।बता दें कि मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीसरी सीट का चुनाव कांग्रेस की एकता के साथ उसके क्षत्रपों का भी 'लिटमस टेस्ट' माना जा रहा था। इस टेस्ट के जरिए कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की कई परतें खुलने वाली थीं।
पार्टी के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस अगर यह सीट गंवा देती, तो क्रॉस वोटिंग करने वाले बागी विधायकों के सरपरस्तों पर सवाल उठना तय था। पार्टी आलाकमान यह देखता कि इन बागियों को विधानसभा का टिकट किस क्षत्रप की पैरवी पर मिला था।दरअसल, तीसरी सीट के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस के स्थानीय गुटबाज कांग्रेसी सूबेदारों को रास नहीं आ रही थीं। यह झटका नटराजन को कम, सीधे पार्टी के सर्वेसर्वा राहुल गांधी को ज्यादा लगा है, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि मीनाक्षी उनकी गुड बुक में शामिल रही हैं।