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छत्रपति शिवाजी के कृषि सिद्धांत

हिंदवी स्वराज्य की अनुपम कृषि व्यवस्था

छत्रपति शिवाजी महाराज की कृषि नीतियाँ आज भी प्रेरणादायी हैं। कृषि व्यवस्था और किसान हितों के प्रति उनकी दूरदृष्टि का विस्तृत अनालिसिस।


हिंदवी स्वराज्य की अनुपम कृषि व्यवस्था

गिरीश जोशी

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक वर्ष 1674 में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन हुआ था। इस वर्ष उनके राज्याभिषेक के 452 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आज भी उनके हिंदवी स्वराज्य को आदर्श शासन व्यवस्था के रूप में क्यों स्मरण किया जाता है? इसका उत्तर उनके शासन के उन सिद्धांतों में निहित है, जिनका केंद्र प्रजा का कल्याण था। विशेष रूप से कृषि व्यवस्था और किसान हितों के प्रति उनकी दूरदृष्टि आज भी प्रेरणादायी है।

शिवाजी महाराज ने अपने राज्य में सर्वप्रथम कृषि भूमि का व्यवस्थित सर्वेक्षण कराया। भूमि की नाप-जोख कर उसे पाँच श्रेणियों प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा बंजर में विभाजित किया गया। भूमि मापन के लिए पाँच हाथ और पाँच मुट्ठी लंबी लकड़ी की छड़ी का उपयोग किया जाता था। बीस छड़ी लंबाई और बीस छड़ी चौड़ाई की भूमि एक बीघा मानी जाती थी तथा 120 बीघा का एक चवर, अर्थात लगभग 60 एकड़, निर्धारित था। इस वैज्ञानिक व्यवस्था के माध्यम से प्रत्येक गाँव की कृषि भूमि का विधिवत अभिलेखीकरण किया गया।

कृषि उपज के वितरण की व्यवस्था भी अत्यंत संतुलित थी। कुल उपज के पाँच भाग किए जाते थे, जिनमें तीन भाग किसान के पास रहते और दो भाग राज्य के कर के रूप में जमा होते थे। राज्य किसानों को पशु, मवेशी, खाद्यान्न तथा आवश्यकता पड़ने पर बिना ब्याज का ऋण भी उपलब्ध कराता था। इस ऋण की वसूली किसान की आर्थिक क्षमता के अनुसार की जाती थी, जिससे उस पर अनावश्यक बोझ न पड़े।शिवाजी महाराज से पूर्व मुगल, आदिलशाही और निजामशाही शासनकाल में वतनदारों का किसानों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण था। वे मनमाने ढंग से कर वसूलते और किसानों का शोषण करते थे। शिवाजी महाराज ने इस व्यवस्था को समाप्त कर वतनदारों के अधिकार सीमित किए तथा राज्य और प्रजा के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किया। इससे किसानों को राहत मिली और प्रशासन अधिक उत्तरदायी बना।

शिवाजी महाराज की कृषि नीति का सबसे प्रामाणिक प्रमाण 5 सितंबर 1676 को प्रभावली के सूबेदार रामाजी अनंत को लिखा गया उनका प्रसिद्ध पत्र है। यह पत्र हिंदवी स्वराज्य की जनकल्याणकारी शासन-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है।महाराज रामाजी को निर्देश देते हैं कि वे पूर्ण ईमानदारी और निष्पक्षता से शासन चलाएँ, प्रजा से किसी प्रकार की अनुचित अपेक्षा न रखें तथा इस बात का विशेष ध्यान रखें कि किसानों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि यदि प्रजा को कष्ट पहुँचेगा तो यह उन्हें स्वीकार नहीं होगा। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए शासन का उद्देश्य केवल राजस्व संग्रह नहीं, बल्कि प्रजा का सुख और सुरक्षा था।

पत्र में कर के रूप में प्राप्त अनाज के वैज्ञानिक भंडारण और विपणन पर भी विशेष बल दिया गया है। महाराज निर्देश देते हैं कि अनाज को उचित समय तक सुरक्षित रखा जाए, उसे नष्ट होने या उसमें कीट लगने से बचाया जाए तथा बाजार में अनुकूल अवसर आने पर अधिक मूल्य पर बेचा जाए, जिससे राज्य को अधिक लाभ प्राप्त हो। वे नारियल, खोपरा, सुपारी और काली मिर्च जैसी उपज के लिए भी सर्वोत्तम बाजार खोजने का निर्देश देते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अनेक बाजारों तक पहुँचने की बात कहते हैं। यह उनकी आर्थिक दूरदृष्टि और बाजार व्यवस्था की गहरी समझ को दर्शाता है।

शिवाजी महाराज किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं से भली-भाँति परिचित थे। उन्होंने अधिकारियों को आदेश दिया कि प्रत्येक गाँव में जाकर किसानों की स्थिति का आकलन करें। जिन किसानों के पास भूमि और श्रम तो है, लेकिन बैल, कृषि उपकरण अथवा भोजन का अभाव है, उन्हें निराश न रहने दिया जाए। ऐसे किसानों को बैल खरीदने के लिए बिना ब्याज ऋण दिया जाए तथा उनके परिवार के भरण-पोषण हेतु दो खंडी अनाज उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे निर्बाध रूप से खेती कर सकें। ऋण की वापसी किसान अपनी सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार करे। यह व्यवस्था आज की कठोर ऋण प्रणाली से कहीं अधिक संवेदनशील और मानवीय प्रतीत होती है।

स्वराज्य में भू-राजस्व धन अथवा अनाज दोनों रूपों में जमा किया जा सकता था। धन के रूप में कर देने पर लगभग 33 प्रतिशत तथा अनाज के रूप में देने पर 40 प्रतिशत राजस्व निर्धारित था। अनाज के रूप में राजस्व संग्रह के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य थे। पहला, युद्ध, अकाल या प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में राज्य के भंडारों में पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध रहे। दूसरा, अनुकूल बाजार मूल्य मिलने पर अनाज का विक्रय कर राज्य और किसानों दोनों को आर्थिक लाभ प्राप्त हो सके।यह संपूर्ण व्यवस्था स्पष्ट करती है कि शिवाजी महाराज केवल एक महान योद्धा नहीं थे, बल्कि दूरदर्शी प्रशासक और किसान हितैषी शासक भी थे। वे कृषि उत्पादन, भंडारण, वितरण, बाजार व्यवस्था और किसानों की आर्थिक सुरक्षा इन सभी पक्षों को समान महत्व देते थे।

आज, जब स्वतंत्र भारत की कृषि व्यवस्था अनेक चुनौतियों से जूझ रही है, तब छत्रपति शिवाजी महाराज के ोहिंदवी स्वराज्य की कृषि नीति हमें एक व्यवहारिक और जनकल्याणकारी दृष्टि प्रदान करती है। किसानों को सुलभ संसाधन, न्यायपूर्ण बाजार, विकेंद्रीकृत भंडारण तथा संवेदनशील ऋण व्यवस्था जैसे अनेक विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने साढ़े तीन शताब्दी पहले थे। यही कारण है कि हिंदवी स्वराज्य की कृषि व्यवस्था आज भी सुशासन और लोककल्याण का अनुपम आदर्श मानी जाती है।

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