बिहार में पांडुलिपियों के महासर्वेक्षण से भारतीय इतिहास एवं विज्ञान के कई रहस्यों का पता चला है। इससे ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि का पता चलता है।
प्रमोद भार्गव
बिहार ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वह विश्व ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। केंद्र सरकार के 'ज्ञान भारतम् मिशन' के अंतर्गत चल रहे पांडुलिपियों के महासर्वेक्षण में बिहार ने पूरे देश को पीछे छोड़ दिया है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां और अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को आश्चर्यचकित कर दिया है।
इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी उपलब्धि ब्राह्मण समाज और कर्ण कायस्थों की लगभग सात सौ वर्ष पुरानी वंशावलियां हैं। मिथिला के पंजीकारों के पास सुरक्षित ये पंजियां विवाह संबंधी परंपराओं से जुड़ी हुई हैं और भारत ही नहीं, विश्व की प्राचीनतम सामाजिक अभिलेखीय धरोहरों में गिनी जा सकती हैं।
पटना संग्रहालय में सुरक्षित अनेक बौद्ध ग्रंथ भी इस सूची में शामिल किए गए हैं। इन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन तिब्बत से लेकर आए थे। इन ग्रंथों की विशेषता यह है कि इनमें साधारण स्याही के स्थान पर सोने और चांदी के चूर्ण का उपयोग किया गया है। ये ग्रंथ आज भी भगवान बुद्ध की वाणियों को जीवंत बनाए हुए हैं।
दरभंगा स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में लगभग 5,500 तथा मिथिला शोध संस्थान में 12,500 से अधिक पांडुलिपियां संग्रहित हैं। इनमें से अधिकांश मिथिलाक्षर और कैथी लिपि में लिखी गई हैं। बिहार के 38 जिलों में अब तक 8,13,720 पांडुलिपियों का सत्यापन किया जा चुका है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि मिशन के अंत तक देश में एक करोड़ से अधिक महत्वपूर्ण पांडुलिपियों का पता चल सकता है।भारत में उपलब्ध पांडुलिपियों की कुल संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है। अनेक संस्थानों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में ज्ञान-विज्ञान का विशाल भंडार सुरक्षित है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. सुरेंद्र मोहन मिश्र के अनुसार, देश में लगभग डेढ़ करोड़ पांडुलिपियां उपलब्ध हो सकती हैं। राज्यसभा में भी यह जानकारी दी जा चुकी है कि ब्रिटेन के संग्रहालयों में भारतीय मूल की लगभग चार लाख पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, जिनमें से पचास हजार के आसपास प्रतियां भारत वापस लाई जा चुकी हैं।
इन पांडुलिपियों में खगोल विज्ञान, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा, रसायन, धातु विज्ञान, कृषि, प्रौद्योगिकी, युद्धकला, आवागमन, ईंधन, पर्यावरण और मानव मनोविज्ञान जैसे विविध विषयों पर सामग्री उपलब्ध है। सामाजिक जीवन के अनेक आयाम भी इनमें संरक्षित हैं। पांडुलिपियों के संरक्षण की चेतना भी हमारे पूर्वजों में थी, जिसका प्रमाण संस्कृत का यह प्रसिद्ध श्लोक है—
'जलाद्रक्षेत् तैलाद्रक्षेच्छिथिलबन्धनात्।
मूर्खहस्ते न मां दद्यादिति वदति पुस्तकम्॥'
अर्थात पुस्तक स्वयं कहती है कि मुझे जल, तेल और ढीले बंधन से बचाओ तथा मुझे मूर्ख के हाथ में मत सौंपो।भारतीय ज्ञान-संपदा की इसी विराटता से प्रभावित होकर जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने कहा था कि संसार में यदि किसी देश ने ज्ञान का सबसे बड़ा भंडार संचित किया है, तो वह भारत है।प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों के महत्व को समझाने वाला एक रोचक प्रसंग संस्कृत के विख्यात विद्वान डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी से जुड़ा है। उन्हें लंदन की इंडिया हाउस लाइब्रेरी में सुरक्षित सुंदरकवि कृत 'नाट्य-प्रदीप' की पांडुलिपि की आवश्यकता थी। उनके एक मित्र ने वहां से उसकी प्रतिलिपि मंगवाई। पांडुलिपि के स्थान पर एक माइक्रोचिप प्राप्त हुई, जिसे विशेष उपकरण की सहायता से पढ़ा गया। जब उसका प्रिंट निकाला गया तो वह अपेक्षा से कहीं अधिक विशाल निकला।
अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि वह 'नाट्य-प्रदीप' नहीं, बल्कि महाकवि दंडी के 'दशकुमारचरित' के तीसरे खंड की अधूरी प्रति थी। डॉ. त्रिपाठी ने उसका गहन अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि उसमें उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिक कथा निहित है। बाद में उन्होंने उसका गद्यानुवाद कर उपन्यास का रूप दिया, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया।इस कृति में खगोलीय घटनाओं, विक्रम संवत के आरंभ तथा तत्कालीन भारतीय समाज के अनेक ऐतिहासिक संकेत मिलते हैं। यह उदाहरण बताता है कि पांडुलिपियां केवल धार्मिक या आध्यात्मिक साहित्य नहीं हैं, बल्कि इतिहास, भूगोल, विज्ञान, राजनीति और संस्कृति के बहुमूल्य स्रोत भी हैं।
भारत में पांडुलिपियों के संग्रह और सूचीकरण का कार्य लंबे समय से चलता रहा है। 1803 में एशियाटिक सोसायटी ने पहली बार व्यवस्थित सूची-पत्र तैयार करने की शुरुआत की। सोसायटी के अध्यक्ष एच. टी. कोलब्रुक ने इस कार्य के लिए अतिरिक्त अनुदान की व्यवस्था कराई। बाद में विभिन्न विद्वानों और प्रशासकों द्वारा संस्कृत ग्रंथों का सर्वेक्षण कराया गया।1830 में फ्रेडरिक ने 350 संस्कृत ग्रंथों की सूची बनाई। 1859 तक यह संख्या बढ़कर 1,300 हो गई। 1891 में तैयार सूची में संस्कृत पांडुलिपियों की संख्या 32 हजार से अधिक दर्ज की गई। आगे चलकर हरप्रसाद शास्त्री ने 40 हजार और राहुल सांकृत्यायन ने लगभग 50 हजार ग्रंथों का पता लगाकर उनका सूचीकरण किया।
इन सूचियों के आधार पर जर्मन विद्वान श्लेगल ने पांडुलिपियों का विषयवार वर्गीकरण किया। इससे स्पष्ट हुआ कि भारतीय ज्ञान परंपरा किसी एक धर्म, दर्शन या विषय तक सीमित नहीं थी। वैदिक साहित्य, वेदांग, पुराण, इतिहास, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, काव्यशास्त्र, उपनिषद, जैन और बौद्ध दर्शन से लेकर चार्वाक चिंतन तक का विशाल साहित्य इसमें समाहित है। इन ग्रंथों में प्रकृति, समाज, मानव व्यवहार, नैतिकता, अध्यात्म और ज्ञान के विविध रूपों का गंभीर विश्लेषण मिलता है।भारतीय पांडुलिपि परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण बख्शाली पांडुलिपि है, जिसे प्राचीन गणित का अनमोल दस्तावेज माना जाता है। यह पांडुलिपि वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में प्राप्त हुई थी। भोजपत्रों पर संस्कृत में लिखी गई इस पांडुलिपि के केवल सत्तर पृष्ठ उपलब्ध हैं।
प्रारंभ में इसे नौवीं शताब्दी का माना गया था, किंतु ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और बोडलियन पुस्तकालय के शोधकर्ताओं द्वारा रेडियोकार्बन परीक्षण के बाद इसके कुछ भाग तीसरी-चौथी शताब्दी के सिद्ध हुए।इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें 'शून्य' के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त बिंदु का उल्लेख मिलता है। विद्वानों का मत है कि आधुनिक शून्य का विकास इसी भारतीय अवधारणा से हुआ। पांडुलिपि शारदा लिपि में लिखी गई है, जो उत्तर-पश्चिम भारत और कश्मीर क्षेत्र में प्रचलित थी।इसमें अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, क्षेत्रमिति, वर्गमूल, घनमूल, ब्याज, आय-व्यय और सरल समीकरणों से संबंधित नियम तथा उदाहरण दिए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय गणितीय परंपरा अत्यंत विकसित थी और उसका ज्ञान पीढ़ियों तक श्रुति परंपरा तथा बाद में लिखित ग्रंथों के माध्यम से सुरक्षित रखा गया।
वास्तव में पांडुलिपियां केवल अतीत की स्मृतियां नहीं हैं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं। इनके संरक्षण, अध्ययन और डिजिटलीकरण से इतिहास के अनेक अनछुए अध्याय खुलेंगे तथा विज्ञान, गणित, दर्शन और समाज संबंधी हमारी समझ और समृद्ध होगी।ज्ञान भारतम् मिशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।