शिक्षा के अधिकार के बावजूद, भारत में कई बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं। बाल श्रम और परिवारिक जिम्मेदारियां इसके प्रमुख कारण हैं।
प्रवीण कक्कड़
स्कूलों की छुट्टियां खत्म हो रही हैं। बाजारों में नए बस्ते, किताबों की खुशबू और रंग-बिरंगी यूनिफॉर्म नजर आने लगी हैं। स्कूलों में ‘प्रवेश उत्सव’ की तैयारियां हैं, ताकि नौनिहालों का स्वागत किया जा सके। लेकिन इस चमक-दमक के बीच क्या हम एक समाज के रूप में खुद से एक बेहद ईमानदार सवाल पूछने के लिए तैयार हैं? क्या ‘शिक्षा का अधिकार’ वाकई देश के हर आखिरी बच्चे तक पहुंच पाया है, या यह सिर्फ फाइलों और उत्सवों तक सीमित है?
आज से करीब साढ़े तीन दशक पहले, 1992 में शाहरुख खान की चर्चित फिल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ आई थी। फिल्म का राजू तो जेंटलमैन बन गया, लेकिन 2026 के भारत में आज भी चाय के ठेलों, ढाबों, ट्रैफिक सिग्नलों और मॉलों के बाहर न जाने कितने ‘राजू’ ऐसे हैं, जिन्हें जेंटलमैन बनने का अवसर ही नहीं मिला। कितनी ही ‘मुनिया’ और ‘गुड़िया’ हैं, जो स्कूल की घंटी सुनने के बजाय घरों में काम करने या छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाने को मजबूर हैं। उनके हिस्से की किताबें और सपने आखिर कहां खो गए?
आंकड़ों का आईना
भारत आज डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप और वैश्विक अर्थव्यवस्था की बात कर रहा है, लेकिन शिक्षा की तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई की ताजा रिपोर्ट बताती है कि प्राथमिक स्तर पर हमारा नामांकन लगभग लक्ष्य तक पहुंच जाता है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते ड्रॉपआउट दर लगभग 12.6 प्रतिशत हो जाती है। यानी स्कूल जाने वाले हर 100 बच्चों में से करीब 13 बच्चे हाईस्कूल की दहलीज लांघने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।नीति आयोग के ‘सतत विकास लक्ष्य’ और यूनिसेफ की संयुक्त रिपोर्ट भी संकेत देती हैं कि भारत में 6 से 14 वर्ष के लाखों बच्चे आज भी स्कूल से बाहर हैं, जो किसी न किसी रूप में बाल श्रम, घरेलू कार्य या असंगठित कामकाज से जुड़े हुए हैं।
मध्यप्रदेश की बात करें तो राज्य के शिक्षा विभाग और आरटीई पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि हर साल ‘राइट टू एजुकेशन’ के तहत निजी स्कूलों की आरक्षित सीटों पर बंपर आवेदन आते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीण और सुदूर आदिवासी अंचलों में हजारों सीटें खाली रह जाती हैं।समस्या केवल स्कूल में प्रवेश दिलाने की नहीं है, बल्कि बच्चे को लगातार शिक्षा से जोड़े रखने की है। जब कोई बच्चा स्कूल छोड़ता है, तो उसके लिए गरीबी, शोषण और सीमित अवसरों का दुष्चक्र और मजबूत हो जाता है।
आखिर बच्चे स्कूल से दूर क्यों हो जाते हैं?
इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन तीन प्रमुख कारण सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं।
पलायन
रोजगार की तलाश में परिवार जब एक स्थान से दूसरे स्थान (विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर) जाते हैं, तो बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। अस्थायी बस्तियों में रहने के कारण ये बच्चे औपचारिक शिक्षा तंत्र से कट जाते हैं।
प्रेरक माहौल का अभाव
अनेक परिवारों में पहली पीढ़ी स्कूल पहुंच रही है। वहां पढ़ाई को लेकर मार्गदर्शन और शैक्षणिक वातावरण सीमित होता है, जिससे बच्चे का मन पढ़ाई से उचटने लगता है।
जानकारी की कमी
बड़ी संख्या में वंचित वर्ग के अभिभावकों को यह पता ही नहीं होता कि सरकार उनके बच्चों के लिए कौन-कौन सी मुफ्त सुविधाएं और कानूनी अवसर उपलब्ध करा रही है।
शिक्षा का अधिकार : अवसर का दरवाजा
साल 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) देश के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कानूनों में से एक है। इसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त है।इस कानून की धारा 12(1)(सी) के तहत निजी स्कूलों की प्रारंभिक कक्षाओं में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हैं।सरकारी स्कूलों में भी मुफ्त प्रवेश, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और मध्याह्न भोजन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। नीतियों और योजनाओं की कमी नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इनका लाभ वास्तव में उन परिवारों तक पहुंचे, जिनके लिए इन्हें बनाया गया है।
एक छोटी कोशिश, भविष्य बदल सकती है
जब हम अपने आसपास काम करने वाले ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड, घरेलू सहायकों, माली या अन्य कर्मचारियों से मिलते हैं, तो क्या कभी उनसे पूछते हैं कि उनके बच्चे स्कूल जाते हैं या नहीं?यहीं से बदलाव शुरू हो सकता है। यदि हम किसी एक परिवार को आरटीई की जानकारी दे दें, किसी बच्चे का ऑनलाइन प्रवेश फॉर्म भरवा दें, या किसी अभिभावक को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित कर दें, तो वह प्रयास एक जीवन की दिशा बदल सकता है।
साक्षर से उच्च शिक्षित भारत
अक्षर ज्ञान देना साक्षरता है, लेकिन आत्मविश्वास, अवसर और बेहतर जीवन का रास्ता खोलना शिक्षा है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश का अंतिम बच्चा भी स्कूल की दहलीज पार कर पाएगा।अगली बार जब आप किसी बच्चे को स्कूल के समय काम करते या सड़कों पर भटकते देखें, तो यह मत सोचिए कि यह केवल सरकार की जिम्मेदारी है। उस बच्चे के भीतर देश का भविष्य छिपा है। आइए, इस प्रवेश उत्सव पर हम सब एक छोटा-सा संकल्प लें अपने आसपास कम से कम एक बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने में मदद करेंगे। जिस दिन देश का हर ‘राजू’ शिक्षा का समान अवसर पाएगा, उसी दिन वह अपनी जिंदगी का असली जेंटलमैन बन सकेगा।