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अमेरिका-ईरान युद्धविराम की ओर

समझौते की राह खोजते अमेरिका-ईरान

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध नए चरण में, युद्धविराम की ओर अग्रसर। सैन्य और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के संकेत।


समझौते की राह खोजते अमेरिका-ईरान

मेजर सरस् त्रिपाठी

लगभग 100 दिनों के बाद पश्चिम एशिया का युद्ध एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। फरवरी 2026 में प्रारंभ हुए अमेरिका-इस्रायल बनाम ईरान संघर्ष ने अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव, समुद्री नाकेबंदी, मिसाइल हमलों, ड्रोन युद्ध और प्रतिनिधि संगठनों—हिजबुल्ला, हूती, हमास आदि की सक्रिय भागीदारी के बाद एक पठारावस्था प्राप्त कर ली है, जहां कुछ नया हासिल करने की संभावना बहुत क्षीण हो चुकी है।

जून 2026 तक स्थिति यह है कि युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रकार के समझौते अथवा युद्धविराम की दिशा में बातचीत भी चल रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति दर्जनों बार युद्ध समाप्ति की घोषणा कर चुके हैं और इससे भी अधिक बार ईरान से समझौते की बात कर चुके हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सका है।अमेरिकी और इस्राइली अनुमानों के विपरीत जून 2026 तक भी ईरान की मिसाइल क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकी है और वह समय-समय पर इस्रायल तथा अमेरिकी हितों को निशाना बना रहा है। इतना ही नहीं, ईरान अब और अधिक प्रभावी तरीके से अपने मनवांछित लक्ष्यों को भेद रहा है।

अमेरिका ने तो घोषणा कर दी कि उसकी ओर से युद्ध समाप्त हो चुका है, लेकिन इस्रायल अभी भी दक्षिणी लेबनान में सैन्य अभियान चला रहा है तथा हिजबुल्ला के ठिकानों पर हमले कर रहा है। दूसरी ओर, हिजबुल्ला भी उत्तरी इस्रायल पर रॉकेट और ड्रोन हमले जारी रखे हुए है।तीसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया है कि वे शीघ्र ही ईरान के साथ युद्धविराम का समझौता करने वाले हैं और बातचीत अंतिम चरण में है। हालांकि अमेरिका ने विमानवाहक पोत समूह, रणनीतिक बमवर्षक, एफ-35 और एफ-22 लड़ाकू विमान, मिसाइल रक्षा प्रणालियां तथा नौसैनिक शक्ति क्षेत्र में तैनात रखी है। अमेरिकी सेनाएं फारस की खाड़ी और अरब सागर में निरंतर सक्रिय हैं।

ईरान ने यह युद्ध मुख्यतः ‘असममित युद्ध’ के रूप में लड़ा है। उसने अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन नेटवर्क, समुद्री क्षमताओं तथा हिजबुल्ला और हूती जैसे संगठनों का व्यापक उपयोग किया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव अभी भी अमेरिका और वैश्विक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक चुनौती बना हुआ है।अमेरिका को यह समझ आ गया है कि ईरान को सीधे सैन्य स्तर पर जीता नहीं जा सकता। इसके तीन असैनिक कारण हैं एक, हॉर्मुज जलडमरूमध्य; दो, ईरान का आकार और भूगोल; और तीन, ईरान की प्रॉक्सी यानी छिपी सैन्य शक्ति। अमेरिका और इस्रायल दोनों के लिए हूती, हिजबुल्ला और हमास बड़ी कठिनाई पैदा कर रहे हैं।

अमेरिका बार-बार धमकी देकर पीछे क्यों हटता है

यह प्रश्न राजनीतिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इसके कई कारण हैं।पहला कारण युद्ध की बढ़ती आर्थिक लागत है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुमान के अनुसार युद्ध के शुरुआती दिनों में ही अरबों डॉलर खर्च हुए थे। स्वतंत्र विश्लेषणों के अनुसार पहले छह दिनों में ही लगभग 11 अरब डॉलर से अधिक का व्यय हुआ था।दूसरा कारण युद्ध के क्षेत्रीय विस्तार का खतरा है। यदि युद्ध और बढ़ता है तो इराक, सीरिया, लेबनान, यमन तथा अन्य खाड़ी देशों तक फैल सकता है। यह पहले से ही लेबनान को अपने दायरे में समाहित कर चुका है।तीसरा कारण घरेलू राजनीतिक दबाव है। अमेरिकी जनता लंबे युद्धों से थक चुकी है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभव अभी भी अमेरिकी राजनीति को प्रभावित करते हैं।

चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण अमेरिका द्वारा लाख प्रयासों के बावजूद हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित न कर पाना है। इसके अवरुद्ध होने से वैश्विक तेल आपूर्ति और अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अमेरिका अभी तक हॉर्मुज को ईरान के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं कर सका है। इसलिए अमेरिका की नीति दबाव और बातचीत, दोनों को साथ लेकर चलने की रही है।

क्या अमेरिका मनोवैज्ञानिक रूप से युद्ध हार चुका है?

यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि अमेरिका मनोवैज्ञानिक रूप से युद्ध हार चुका है। अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। परंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि वह अपने घोषित राजनीतिक उद्देश्यों को शीघ्रता से प्राप्त नहीं कर सका।यदि किसी युद्ध का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी की इच्छाशक्ति को तोड़ना हो, तो ईरान अभी भी प्रतिरोध कर रहा है। यही कारण है कि अमेरिका सैन्य विजय के साथ-साथ राजनीतिक समझौते की दिशा में भी प्रयासरत दिखाई देता है।अमेरिका के पास अभी भी विशाल सैन्य भंडार है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसके हथियार समाप्त हो रहे हैं। हालांकि यह सच है कि मिसाइल रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ा है। महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ है। लाल सागर और मध्य पूर्व में लंबे अभियानों ने रसद लागत बढ़ा दी है। अर्थात समस्या हथियारों की कमी से अधिक उच्च लागत और पुनःपूर्ति की गति की है।

इसके अतिरिक्त, अमेरिका की मानव और आर्थिक क्षति भी काफी बढ़ चुकी है। जून 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है। शुरुआती सप्ताहों में ही लागत 11 अरब डॉलर से अधिक आंकी गई थी और वर्तमान कुल व्यय इससे कहीं अधिक माना जा रहा है।

इस्रायल की स्थिति भी अपेक्षा से अधिक कठिन है। उसे प्रारंभ में त्वरित सफलता की आशा थी, किन्तु युद्ध अपेक्षा से अधिक लंबा खिंच गया है। लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों ने उसके नागरिक जीवन, अर्थव्यवस्था और रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ाया है।प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भी घरेलू राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस्रायल को अपेक्षा से अधिक आर्थिक और सामरिक क्षति हुई है, भले ही वह सैन्य दृष्टि से अभी भी मजबूत स्थिति में बना हुआ हो।तेल अवीव, हैफा और अन्य शहरों में सरकार की युद्ध नीति के विरुद्ध प्रदर्शन भी हुए हैं। इस्रायल को हिजबुल्ला और हूती की अतिरिक्त मार भी झेलनी पड़ रही है। वह हिजबुल्ला को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं कर सका है, जबकि हूती समूह लाल सागर और समुद्री मार्गों के लिए चुनौती बना हुआ है।

बहु-मोर्चीय युद्ध ईरान, लेबनान और यमन इस्रायल के लिए अपेक्षा से अधिक कठिन सिद्ध हुआ है।

जून 2026 तक की स्थिति में न तो अमेरिका-इस्रायल गठबंधन निर्णायक विजय प्राप्त कर सका है और न ही ईरान अपने विरोधियों को पराजित कर पाया है। युद्ध ने यह सिद्ध किया है कि आधुनिक संघर्ष केवल सैन्य शक्ति से नहीं जीते जाते। आर्थिक सहनशक्ति, राजनीतिक इच्छाशक्ति, क्षेत्रीय गठबंधन और जनमत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।वर्तमान संकेत बताते हैं कि सभी पक्ष किसी न किसी प्रकार के समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि युद्ध को अनिश्चित काल तक जारी रखना किसी भी पक्ष के न तो हित में है और न ही सामर्थ्य में।

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