इंदौर महापौर ने सॉलिसिटर जनरल को पत्र लिखकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पर दिए बयान को लेकर आपराधिक अवमानना केस की मांग की है। मामला अब कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ सकता है।
इंदौर। सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पत्र लिखकर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की है। मामला उनके एक वायरल इंटरव्यू में अदालत को लेकर की गई टिप्पणी से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर “मिली-जुली चोरी” शब्द का इस्तेमाल किया था।
महापौर ने सॉलिसिटर जनरल को भेजा पत्र
इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को लिखे पत्र में दिग्विजय सिंह के खिलाफ कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971 की धारा 15(1)(b) के तहत आपराधिक अवमानना केस चलाने की मांग की है। महापौर ने अपने पत्र के साथ पीटीआई के एक वीडियो इंटरव्यू की पेन ड्राइव भी साक्ष्य के रूप में सौंपी है, जिसमें यह बयान दर्ज बताया जा रहा है।
विवादित बयान को लेकर उठे सवाल
महापौर द्वारा भेजे गए पत्र के अनुसार, दिग्विजय सिंह ने अपने बयान में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं पर टिप्पणी करते हुए कथित तौर पर “मिली-जुली चोरी” जैसी बात कही थी। इसी बयान को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ है और इसे न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करने वाला बताया जा रहा है।
सोच-समझकर दिया गया बयान का आरोप
पुष्यमित्र भार्गव ने अपने पत्र में दावा किया है कि वीडियो देखने से यह स्पष्ट होता है कि यह बयान जल्दबाजी या अनजाने में नहीं दिया गया, बल्कि इसे सोच-समझकर दिया गया है। उनके अनुसार, बयान से पहले कुछ सेकंड का ठहराव भी यह दर्शाता है कि यह टिप्पणी विचारपूर्वक की गई थी।
न्यायपालिका की साख पर असर का दावा
महापौर ने अपने पत्र में कहा है कि देश की सर्वोच्च अदालत को लेकर इस तरह की टिप्पणी केवल किसी फैसले की आलोचना नहीं है, बल्कि यह संस्थागत साख पर असर डालने वाला बयान है। उनके अनुसार, इससे जनता के बीच न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो सकती है।
कानूनी प्रक्रिया पर नजर
कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट के तहत किसी भी आपराधिक अवमानना की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए सॉलिसिटर जनरल या अटॉर्नी जनरल की सहमति जरूरी होती है। अब यह देखना अहम होगा कि सॉलिसिटर जनरल इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं। यदि सहमति मिलती है तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है।