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1975 में आपातकाल पर संगोष्ठी

1975 में कुर्सी बचाने के लिए तानाशाह ने लगाया था आपातकाल : प्रो. सोलंकी

1975 के आपातकाल को लोकतंत्र पर काला धब्बा बताया गया। इंदौर में इस विषय पर संगोष्ठी में कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।


1975 में कुर्सी बचाने के लिए तानाशाह ने लगाया था आपातकाल  प्रो सोलंकी

इंदौर में ‘आपातकाल की विभीषिका का काला अध्याय’ विषय पर संगोष्ठी

आपातकाल भारत के लोकतंत्र में एक ऐसा काला धब्बा है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता। आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या की गई, संविधान की हत्या की गई। यह बात मप्र भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी ने कही। वे गुरुवार को आपातकाल के 51 वर्ष पूरे होने पर भाजपा नगर द्वारा आयोजित 'आपातकाल की विभीषिका का काला अध्याय' विषय पर संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में तीन तरह के आपातकाल को परिभाषित किया गया है। एक राष्ट्रीय आपातकाल, जो तब लगाया जाता है जब दूसरे देश के साथ युद्ध छिड़ जाए। यह धारा 352 के तहत आता है। दूसरा, जब किसी राज्य की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए, तब राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। यह धारा 356 के तहत आता है। तीसरा, जब कोई देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस जाए और अर्थव्यवस्था चरमरा जाए, तब धारा 360 के अनुसार आर्थिक आपातकाल लगाया जा सकता है, जैसे आज पाकिस्तान की स्थिति है।

उन्होंने कहा कि 1975 में जो आपातकाल लगाया गया था, वह इन तीनों श्रेणियों में नहीं था। व्यक्ति जब अपनी कुर्सी बचाने के लिए तानाशाह बन जाता है, न्यायालय को नहीं मानता, संविधान को नहीं मानता, भारत की आत्मा लोकतंत्र को नहीं मानता और उसका गला घोंट देता है तथा पूरा शासन तंत्र अपने हाथ में ले लेता है, वही आपातकाल था।

न दलील थी, न अपील थी : विजयवर्गीय

नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि आपातकाल में कई लोगों को जेल में बंद कर दिया गया, जबकि कई लोगों ने जेल के बाहर रहकर आपातकाल के खिलाफ संघर्ष किया। उस समय न दलील थी और न अपील थी। अब लोकतंत्र इतना मजबूत हो गया है कि कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता। उन्होंने कहा कि आपातकाल के इस काले अध्याय से आने वाली पीढ़ी को परिचित कराना जरूरी है।संगोष्ठी में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एम. चुबा आओ, सुमित्रा महाजन, गोलू शुक्ला, मालिनी गौड़, मधु वर्मा, श्रवण सिंह चावड़ा, सत्यनारायण सत्तन, गोपीकृष्ण नेमा, सुदर्शन गुप्ता, पूर्व राज्यपाल विष्णु सदाशिव कोकजे, बाबूसिंह रघुवंशी, ईश्वर हिंदुजा, राधेश्याम यादव, उमा नारायण पटेल, कंचन सिंह चौहान, गणेश गोयल आदि उपस्थित थे।

उन्होंने कहा कि 24 जून को उच्चतम न्यायालय का फैसला आया था, लेकिन इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने के बजाय 25 जून की रात राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवाकर आपातकाल लागू कर दिया। इसके बाद सभी बड़े विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। कांग्रेस नेताओं और कलेक्टरों के इशारों पर लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। जो विरोधी थे, सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के असंतुष्ट लोगों को भी जेलों में बंद कर दिया गया।कांग्रेस ने लगातार संविधान को कुचलने का काम किया। आपातकाल जैसी स्थिति देश में फिर से न आए और संविधान की हत्या न हो, इसलिए भाजपा ने 'संविधान हत्या दिवस' मनाने का निर्णय लिया है। आप भी संविधान के प्रति जागरूक रहें। यदि आपको लगे कि कोई संविधान को तोड़ रहा है या उसकी हत्या करने का प्रयास कर रहा है, तो सजग रहें।

कांग्रेस ने घोंटा लोकतंत्र का गला : सुमित मिश्रा

नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा ने कहा कि आज हिंदुस्तान चांद तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब कांग्रेस ने संविधान को ताक पर रखकर लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया था।कार्यक्रम का संचालन महेश कुकरेजा ने किया एवं आभार हरप्रीत सिंह बक्शी ने माना।


 

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