अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य फिर खुलने की तैयारी में है। जानिए इसका वैश्विक तेल बाजार, भारत और मध्य पूर्व पर क्या असर पड़ेगा।
सुबह की शुरुआत एक ऐसी खबर से हुई जिसने न सिर्फ मध्य पूर्व बल्कि दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों की धड़कनें बदल दीं। महीनों से तनाव और सैन्य टकराव की खबरों के बीच अब संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच चला आ रहा संघर्ष आखिरकार थमता नजर आ रहा है।
यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार हुआ, तो 19 जून को दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होंगे। इसके साथ ही दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी चरणबद्ध तरीके से खोलने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
पाकिस्तान ने किया शांति समझौते का दावा
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया पर एक संदेश जारी कर दावा किया कि गहन कूटनीतिक बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों ने लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को रोकने पर सहमति जताई है। उन्होंने इस प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्की के योगदान का भी उल्लेख किया। कूटनीतिक हलकों में इसे हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पहलों में से एक माना जा रहा है।
पर्दे के पीछे चली लंबी बातचीत
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर जो दिखाई देता है, उसके पीछे कहीं ज्यादा जटिल बातचीत चल रही होती है। जानकार बताते हैं कि पिछले कई सप्ताह से विभिन्न देशों के प्रतिनिधि लगातार संपर्क में थे। मध्यस्थ देशों ने दोनों पक्षों के बीच भरोसे का माहौल बनाने की कोशिश की। यही वजह रही कि लंबे गतिरोध के बाद अब समझौते की जमीन तैयार होती दिख रही है।
ट्रंप ने होर्मुज को लेकर क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए दावा किया कि इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता लौट सकती है। उन्होंने कहा कि समझौते के बाद समुद्री मार्गों को सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से पूरी क्षमता के साथ संचालित किया जाएगा। यह सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। जब यह रास्ता बाधित होता है तो असर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक दिखाई देता है।
भारत के लिए क्यों अहम है होर्मुज?
जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य का नाम आता है, भारत का जिक्र अपने आप होने लगता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। ऐसे में इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर तेल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है। कुछ महीने पहले जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ा था, तब वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया था। यही कारण है कि भारतीय कारोबारी और ऊर्जा विशेषज्ञ इस समझौते पर विशेष नजर बनाए हुए हैं।
बाजारों को मिल सकती है राहत
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है और समुद्री मार्ग पूरी तरह खुल जाता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन को राहत मिल सकती है। इसका सकारात्मक असर तेल कीमतों से लेकर शिपिंग सेक्टर तक कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।
तेहरान में हुई अहम बैठक
समझौते को अंतिम रूप देने से पहले कतर के प्रतिनिधियों ने तेहरान में कई दौर की बातचीत की थी। सूत्रों के मुताबिक, इन बैठकों में युद्धविराम, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी प्रक्रिया ने दोनों पक्षों को एक साझा रास्ते पर लाने में अहम भूमिका निभाई।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ी नजर 19 जून पर है, जब प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने की बात कही जा रही है। यदि यह प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी होती है, तो न सिर्फ अमेरिका और ईरान के रिश्तों में नया अध्याय शुरू हो सकता है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीद भी बढ़ सकती है। फिलहाल दुनिया इंतजार कर रही है कि कूटनीति की यह पहल कितनी टिकाऊ साबित होती है और क्या यह वास्तव में उस क्षेत्र में स्थायी शांति की नींव रख पाएगी, जो वर्षों से संघर्ष और अस्थिरता का केंद्र रहा है।