सुबह जब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां खुलीं तो एक खबर ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहा तनाव अब एक शांति समझौते की तरफ बढ़ता दिख रहा है। लेकिन इस कहानी में दिलचस्प मोड़ यह है कि जंग के भारी नुकसान के बावजूद ईरान खुद को इस डील का बड़ा लाभार्थी बता रहा है।
दरअसल, 28 फरवरी से शुरू हुआ यह संघर्ष 107 दिनों तक चला। इस दौरान यह संघर्ष सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा। मिडिल ईस्ट के तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर भी साफ दिखा।
जंग में भारी नुकसान के बाद बातचीत की मेज पर बदली तस्वीर
शुरुआती चरण में ईरान को सैन्य और रणनीतिक स्तर पर बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले हुए और सुरक्षा ढांचे पर दबाव बढ़ा। दूसरी तरफ, संघर्ष लंबा खिंचने के साथ वैश्विक दबाव भी बढ़ता गया। तेल आपूर्ति पर असर, व्यापार मार्गों में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता ने सभी पक्षों को बातचीत की ओर धकेला। यही वह बिंदु था जहां कूटनीतिक प्रयास तेज हुए और धीरे-धीरे समझौते की जमीन तैयार हुई।
डील में ईरान को मिलीं 7 बड़ी राहतें
डील में ईरान को मिलीं 7 बड़ी राहतें
24 अरब डॉलर के फंड का हिस्सा होगा जारी
समझौते के तहत अमेरिका, ईरान के जब्त किए गए 24 अरब डॉलर के फंड का एक बड़ा हिस्सा रिलीज करने पर सहमत हुआ है। इससे तेहरान को तत्काल आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।
समुद्री ब्लॉकेड हटाने पर सहमति
अमेरिकी नौसेना अगले 30 दिनों के भीतर ईरान के समुद्री मार्गों से अपना ब्लॉकेड हटाएगी। इससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियां सामान्य होने का रास्ता साफ हो सकता है।
तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात को राहत
ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है। डील के मुताबिक, ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री पर लगी कई अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों को निलंबित किया जाएगा।
पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की सहायता
युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से बड़े वित्तीय पैकेज की बात सामने आई है। यह राशि ईरान के बुनियादी ढांचे और आर्थिक पुनर्निर्माण में मदद कर सकती है।
हॉर्मुज पर रहेगा ईरानी सुरक्षा नियंत्रण
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को दोबारा खोले जाने के बाद भी उसकी सुरक्षा व्यवस्था में ईरान की प्रमुख भूमिका बनी रहेगी। इसे तेहरान की बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है।
सैन्य विस्तार नहीं बढ़ाने का आश्वासन
अमेरिका ने कथित तौर पर लिखित प्रतिबद्धता दी है कि वह क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को और नहीं बढ़ाएगा। साथ ही नए प्रतिबंध लगाने से भी परहेज करेगा।
आंतरिक मामलों में दखल नहीं देने की गारंटी
समझौते की सबसे चर्चित शर्तों में से एक यह भी बताई जा रही है कि अमेरिका भविष्य में ईरान के राजनीतिक और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
क्या ईरान इसे अपनी जीत मान सकता है?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध और कूटनीति को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है। सैन्य स्तर पर नुकसान झेलने के बावजूद यदि कोई देश बातचीत में अपने प्रमुख हितों को सुरक्षित कर लेता है, तो उसे आंशिक कूटनीतिक सफलता माना जाता है। ईरान फिलहाल इसी तर्क के साथ इस समझौते को पेश कर रहा है। हालांकि आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि डील की शर्तें जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं।
तेहरान में हुई अहम कूटनीतिक हलचल
समझौते को अंतिम रूप देने से पहले कई दौर की बातचीत हुई, जिसमें मध्यस्थ देशों की भूमिका अहम रही। इन बैठकों में धीरे-धीरे दोनों पक्ष एक साझा सहमति की ओर बढ़े। अब सभी की नजर इस बात पर है कि यह समझौता जमीन पर कितना टिक पाता है और क्या यह वास्तव में लंबे समय तक क्षेत्रीय स्थिरता ला पाएगा।