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Why TMC Rebel MPs Joined NCPI Instead Of Claiming

TMC पर दावा छोड़ नई पार्टी में क्यों गए बागी सांसद? ममता को घेरने की रणनीति या कानूनी मजबूरी

TMC के बागी सांसदों ने पार्टी पर दावा करने के बजाय NCPI में विलय का फैसला क्यों किया? जानिए ममता बनर्जी के संगठनात्मक नियंत्रण और कानूनी रणनीति की पूरी कहानी।


tmc पर दावा छोड़ नई पार्टी में क्यों गए बागी सांसद ममता को घेरने की रणनीति या कानूनी मजबूरी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए बागी सांसदों ने बड़ा फैसला लेते हुए पार्टी पर दावा ठोकने के बजाय त्रिपुरा की अपेक्षाकृत निष्क्रिय राजनीतिक पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का रास्ता चुना है। इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है कि आखिर जब लोकसभा में बागी सांसदों के पास संख्या बल था तो उन्होंने सीधे TMC पर कब्जे की कोशिश क्यों नहीं की? राजनीतिक विश्लेषकों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कानूनी और संगठनात्मक दोनों तरह की मजबूरियां थीं।

संख्या थी, लेकिन पार्टी पर कब्जा आसान नहीं था

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि लोकसभा में बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन के बाद बागी गुट आसानी से तृणमूल कांग्रेस पर दावा कर सकता था। लेकिन पार्टी का संविधान इस राह की सबसे बड़ी बाधा बन गया। जानकारों के मुताबिक TMC के संविधान में पार्टी की सर्वोच्च शक्ति सांसदों या विधायकों के पास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कार्यसमिति (National Executive Committee) के पास है। यही समिति संगठन, चुनाव चिन्ह और पार्टी फंड से जुड़े अंतिम निर्णय लेती है।

ममता ने पहले ही कर दी थी तैयारी

पश्चिम बंगाल विधानसभा में बगावत के बाद मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने पार्टी की कई पुरानी समितियों को भंग कर नई समितियों का गठन शुरू कर दिया था। इन समितियों में उन्हीं नेताओं को जगह दी गई जो उनके और Abhishek Banerjee के प्रति वफादार माने जाते हैं। यही वजह है कि भले ही सांसदों और विधायकों का बड़ा वर्ग बागी हो गया हो, लेकिन पार्टी संगठन पर नियंत्रण अब भी ममता खेमे के पास बना हुआ है।

चुनाव चिन्ह और फंड पर दावा मुश्किल

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि बागी सांसद सीधे TMC पर दावा करते तो मामला चुनाव आयोग और अदालतों तक पहुंच सकता था। संगठनात्मक ढांचे पर ममता बनर्जी का नियंत्रण होने के कारण चुनाव चिन्ह और पार्टी फंड पर कब्जा हासिल करना बेहद कठिन हो जाता। ऐसी स्थिति में लंबी कानूनी लड़ाई और अनिश्चितता का खतरा था। इसलिए बागी नेताओं ने नया राजनीतिक मंच चुनने को ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना।

NCPI क्यों बनी बागियों की पसंद?

बागी सांसदों ने त्रिपुरा आधारित NCPI में विलय का फैसला लेकर संसद में अपनी अलग पहचान बनाए रखने की कोशिश की है। इससे उन्हें तुरंत राजनीतिक वैधता भी मिल गई और दल-बदल कानून से जुड़े जोखिम भी कम हुए। साथ ही वे संसद के भीतर एक संगठित समूह के रूप में अपनी भूमिका जारी रख सकेंगे।

भाजपा की भूमिका पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्षी दलों ने भाजपा पर भी सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ वामपंथी नेता और राज्यसभा सांसद Bikash Ranjan Bhattacharya ने आरोप लगाया कि बागी सांसदों की रणनीति के पीछे भाजपा की राजनीतिक गणना हो सकती है। हालांकि भाजपा की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

विधानसभा में सफल, लोकसभा में क्यों नहीं दोहराया मॉडल?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन से बागी गुट प्रभावशाली स्थिति में पहुंच गया था। लेकिन लोकसभा में वही मॉडल लागू नहीं हो सका क्योंकि वहां संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सांसदों ने समझ लिया था कि केवल संख्या बल के आधार पर पार्टी पर नियंत्रण हासिल करना संभव नहीं होगा। इसलिए उन्होंने अलग राजनीतिक पहचान बनाने का रास्ता चुना। 

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