टीएमसी की फायरब्रांड सांसद सायोनी घोष का नाम बागी सांसदों में आने के बाद बंगाल की राजनीति में नई हलचल मच गई है। जानिए पूरा घटनाक्रम।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नाम की हो रही है तो वह सायोनी घोष हैं। कभी ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सबसे मुखर युवा आवाज मानी जाने वाली सायोनी का नाम अब पार्टी के कथित बागी सांसदों की सूची में सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि यही सायोनी कुछ महीने पहले तक बीजेपी और नरेंद्र मोदी सरकार पर सबसे तीखे हमले बोलने वाले नेताओं में गिनी जाती थीं।
राजनीति में समय कितनी तेजी से करवट लेता है, इसका ताजा उदाहरण सायोनी घोष का मामला बन गया है। जिस नेता ने सार्वजनिक मंचों से टीएमसी के प्रति अपनी निष्ठा जताई, ममता बनर्जी को संघर्ष का प्रतीक बताया और बीजेपी पर लगातार हमले किए, उसी का नाम अब लोकसभा अध्यक्ष को भेजी गई उस चिट्ठी में बताया जा रहा है, जिसमें टीएमसी के 19 सांसदों ने अलग समूह के रूप में मान्यता मांगी है।
टीएमसी की आक्रामक प्रवक्ता से बागी सांसदों की कतार तक
33 वर्षीय सायोनी घोष बंगाली फिल्म और वेब सीरीज की दुनिया का चर्चित चेहरा रही हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने राजनीति में कदम रखा और टीएमसी में शामिल हुईं। उस चुनाव में उन्हें बीजेपी की अग्निमित्रा पॉल के खिलाफ मैदान में उतारा गया था, लेकिन जीत नहीं मिली। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा बनाए रखा। 2024 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से टिकट मिला और सायोनी संसद पहुंच गईं। इसके बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी की सबसे तेजतर्रार युवा सांसदों में शुमार होने लगीं। लोकसभा के भीतर और बाहर सरकार पर उनके हमले अक्सर सुर्खियां बनते थे। टीवी डिबेट्स से लेकर सोशल मीडिया तक, सायोनी की पहचान एक आक्रामक विपक्षी नेता की बन चुकी थी।
'सायोनी चड्ढा नहीं है' वाला बयान फिर चर्चा में
सायोनी घोष का एक पुराना बयान अब सोशल मीडिया पर फिर वायरल हो रहा है। जब आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं के भाजपा में जाने को लेकर बहस छिड़ी थी, तब सायोनी ने कहा था कि "सायोनी घोष है ना, वो चड्ढा नहीं है, इसलिए वो चड्ढा-चड्ढी नहीं होगा कभी।' उस समय उन्होंने दावा किया था कि बीजेपी के पास एजेंसियां, संसाधन और धनबल हो सकता है, लेकिन टीएमसी के पास ममता बनर्जी जैसी नेता हैं। यही वजह है कि अब जब उनका नाम कथित बागी सांसदों की सूची में सामने आया है तो उनके पुराने बयान भी नए सिरे से चर्चा में आ गए हैं।
चुनावी हार के बाद भी ममता के साथ खड़ी दिख रही थीं सायोनी
लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भी सायोनी घोष लगातार पार्टी लाइन पर बोलती नजर आ रही थीं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधा था। ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक के बाद उन्होंने कहा था कि टीएमसी चुनाव नहीं हारी है, बल्कि जनादेश की चोरी हुई है। उन्होंने दावा किया था कि जनता आने वाले चुनावों में इसका जवाब देगी। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद को ममता बनर्जी का समर्पित कार्यकर्ता बताते हुए पार्टी के संघर्ष को और तेज करने की बात भी कही थी। इसी वजह से उनके नाम का बागी सांसदों में सामने आना कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी हैरान कर रहा है।
18 मई का ट्वीट अब नए मायने दे रहा है
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा 18 मई को किए गए सायोनी घोष के एक ट्वीट की हो रही है। उन्होंने लिखा था कि जीतने के लिए केवल जीत की इच्छा काफी नहीं होती, बल्कि तैयारी, झटकों से उबरने की क्षमता और आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति भी जरूरी होती है, खासकर तब जब बाकी लोग हार मान लें। उस समय यह एक सामान्य प्रेरणादायक संदेश माना गया था। लेकिन अब जब बागी सांसदों की चिट्ठी की तारीख भी 18 मई बताई जा रही है, तब राजनीतिक विश्लेषक इस ट्वीट को अलग नजरिए से देख रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर सायोनी के मन में सवाल पैदा होने लगे थे और वही असंतोष आगे चलकर बड़े राजनीतिक फैसले में बदल गया।
बगावत की तैयारी और बीजेपी पर हमले साथ-साथ?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस समय कथित तौर पर बागी खेमे की गतिविधियां चल रही थीं, उसी दौरान सायोनी सार्वजनिक रूप से बीजेपी पर हमलावर बनी हुई थीं। अभिषेक बनर्जी पर हुए एक हमले को उन्होंने लोकतांत्रिक जनादेश पर हमला बताया था। जून के पहले सप्ताह में भी उन्होंने जादवपुर में रेहड़ी-पटरी वालों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बीजेपी सरकार की आलोचना की थी। यही वजह है कि उनके विरोधी जहां इसे राजनीतिक अवसरवाद बता रहे हैं, वहीं समर्थक इसे बदलते राजनीतिक हालात के अनुसार लिया गया फैसला बता रहे हैं।
काबा-मदीना वाला विवाद कैसे बना चुनावी मुद्दा?
पश्चिम बंगाल के चुनावी अभियान के दौरान सायोनी घोष तब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गई थीं, जब उन्होंने मंच से 'दिल में काबा और आंखों में मदीना' गीत गाया था। बीजेपी और उसके समर्थकों ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति का प्रतीक बताते हुए जोरदार तरीके से उठाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया, जब राज्य में पहले से ही घुसपैठ, पहचान और वोट बैंक की राजनीति जैसे मुद्दों पर तीखा ध्रुवीकरण चल रहा था। भाजपा को इस मुद्दे के रूप में एक ऐसा प्रतीक मिल गया, जिसे उसने चुनावी अभियान में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया। बाद में कई भाजपा नेताओं ने भी दावा किया कि इस विवाद ने मतदाताओं के एक वर्ग को प्रभावित किया।
क्या टीएमसी में बढ़ रहा है असंतोष?
बंगाल की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकारों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व, संगठन और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग राय सामने आने लगी हैं। कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ नेता संगठन में बढ़ते केंद्रीकरण और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असहज थे। हालांकि टीएमसी की ओर से ऐसे दावों पर आधिकारिक तौर पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की गई है। फिर भी 19 सांसदों के कथित बागी समूह की खबर ने पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।
एयरपोर्ट पर चेहरा छिपाने की तस्वीरों ने बढ़ाई अटकलें
हाल के दिनों में कोलकाता एयरपोर्ट से सायोनी घोष की कुछ तस्वीरें भी चर्चा में रहीं, जिनमें वह अपना चेहरा ढंककर बाहर निकलती दिखाई दीं। इन तस्वीरों को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की अटकलें लगाई गईं। हालांकि सायोनी या उनके करीबी सूत्रों की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। लेकिन राजनीतिक माहौल ऐसा है कि उनके हर कदम और हर बयान को अब नए संदर्भ में देखा जा रहा है।
क्या है बगावत की वजह
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सायोनी घोष वास्तव में टीएमसी से दूरी बना रही हैं या फिर यह केवल अस्थायी राजनीतिक असंतोष का मामला है। फिलहाल बंगाल की राजनीति में इतना जरूर माना जा रहा है कि सायोनी घोष का अगला कदम केवल उनके राजनीतिक भविष्य को नहीं, बल्कि टीएमसी के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। कभी ममता बनर्जी की सबसे आक्रामक युवा आवाज रहीं सायोनी अब किस राजनीतिक दिशा में जाती हैं, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।