राजनीतिक रूप से चुनावी मैदान में राजनीतिक दल और नेता मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए वे सभी वादे करने के लिए स्वतंत्र हैं, जिन्हें वे संवैधानिक व्यवस्थाओं के दायरे में और तय समयसीमा में पूरा कर सकें। लेकिन अनेक बार नेताओं और दलों द्वारा किए गए चुनावी वादे एक लंबी यात्रा पूरी होने के बाद भी अधूरे ही रह जाते हैं।
इसलिए यह स्वाभाविक रूप से तय होना चाहिए कि क्या राजनीतिक दल चुनावी मैदान में उतरते समय अपने पुराने कार्यों का स्पष्ट और लिखित विवरण प्रस्तुत करेंगे और आने वाले समय में चुनावी जीत के बाद अपने नए वादों की समयसीमा भी स्पष्ट करेंगे?
क्योंकि अब विकास और निर्माण से जुड़ी चुनावी घोषणाओं से इतर नेता और दल मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को नकद राशि या प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ के जरिए अपने पाले में करने का दलदली खेल खेलने लगे हैं। यह चुनावी चस्का अब लगभग प्रत्येक दल और नेता को ही नहीं भाने लगा है, बल्कि मतदाता भी अपना तात्कालिक लाभ देखकर इसे आत्मसात कर चुके हैं।
यही कारण है कि करीब चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से उस याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें चुनाव से पहले ‘अतार्किक मुफ्त उपहारों की घोषणा’ करने या उन्हें वितरित करने वाली राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त करने अथवा उसका पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। उस समय पीठ ने इसे गंभीर मुद्दा करार देते हुए कहा था कि कई बार मुफ्त उपहार योजनाओं का बजट नियमित बजट से भी अधिक हो जाता है।
सवाल यह है कि यदि कोई मतदाता मुफ्त की सौगात दिए जाने के प्रभाव में किसी उम्मीदवार को वोट देता है, तो क्या इसे एक तरह की सौदेबाजी नहीं कहा जाएगा? यदि किसी राज्य में कोई सत्ताधारी पार्टी चुनावों के ठीक पहले किसी योजना या कार्यक्रम के जरिए मतदाताओं को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ पहुंचाती है, तो उसकी जीत को कितना निष्पक्ष माना जाएगा?
दिनोंदिन बढ़ती मुफ्त उपहारों की राजनीति के बीच होने वाले चुनावों को किस हद तक स्वच्छ और स्वतंत्र कहा जा सकता है? देश में चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दलों की ओर से मतदाताओं को रिझाने के लिए जिस तरह निःशुल्क आर्थिक रियायतों की राजनीति की जा रही है, उसने एक तरह से चुनावी नतीजों की शुचिता को कसौटी पर रख दिया है।
भारतीय राजनीति में पिछले कई वर्षों से यह प्रवृत्ति और अधिक जटिल होती गई है। हालांकि इस मसले पर सवाल भी उठते रहे हैं और निःशुल्क रेवड़ियों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने को लोकतंत्र के लिए एक घातक चलन बताया गया है। विडंबना यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल इस प्रवृत्ति पर सवाल तो उठाते हैं, लेकिन मौका मिलने पर वे भी इसी तरीके को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।
जो दल या गठबंधन सत्ता में होते हैं और जो सत्ता में आना चाहते हैं, दोनों ही मुफ्त रियायतों को लेकर आपस में होड़ लगाते नजर आते हैं। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुफ्त उपहारों को भारतीय राजनीति में एक घातक प्रवृत्ति बताया है, लेकिन इस पर रोक को लेकर अब तक कोई ठोस नियमन सामने नहीं आ सका है।
यही वजह है कि आज राजनीतिक दलों के बीच यह होड़ दिखाई देती है कि वोट हासिल करने के लिए मतदाताओं को कौन कितना अधिक लाभ पहुंचाने की घोषणा करता है। नतीजतन, स्वच्छ चुनाव और विवाद रहित परिणाम अब एक जटिल प्रक्रिया की तरह प्रतीत होने लगे हैं।
आने वाले समय में यह उम्मीद करना शायद बेमानी होगा कि राजनीतिक दल स्वयं इस दिशा में कोई सुधारात्मक पहल करेंगे, जिससे चुनावी विजय के लिए मुफ्त की रेवड़ियों के चलन पर लगाम लगे। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दिया जाना, मुफ्त की चुनावी रेवड़ियों पर नियंत्रण की उम्मीद को एक बार फिर जीवित करता है।यह उम्मीद कितनी साकार होगी, यह तो समय के गर्भ में ही है।