महिला आयोग में 30 हजार केस लंबित, पीड़ित भटकने को मजबूर
मध्य प्रदेश में महिलाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, दलितों और किसानों को न्याय दिलाने के लिए बनाए गए संवैधानिक आयोग एक अरसे से बदहाली के शिकार हैं। प्रदेश के 20 आयोगों में से लगभग 40 प्रतिशत का पुनर्गठन अब तक नहीं हुआ है, जबकि कुछ आयोग प्रभार के भरोसे चल रहे हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य और सदस्य सचिव के 30 से अधिक पद वर्षों से रिक्त हैं। इसका सीधा असर न्याय पर पड़ा है। हजारों की तादाद में शिकायतें लंबित हैं और पीड़ित अदालतों के दरवाजे खटखटाने को मजबूर हैं।
अल्पसंख्यक आयोग 2020 से ताले में
अल्पसंख्यक आयोग के सभी चार पद 2020 से रिक्त हैं। मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन सहित 32 अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े 1,000 से अधिक मामले यहां वर्षों से लंबित हैं। आयोग में कोई सुनवाई सालों से नहीं हुई है, निर्णय का तो सवाल ही नहीं उठता।
सूचना आयोग समेत अन्य आयोग भी नाम के
सूचना आयोग में आयुक्तों की कमी के चलते 25 हजार से ज्यादा अपीलें लंबित हैं। आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा 10 आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन वर्तमान में आयुक्तों के सात पद खाली हैं। ऐसे में मुख्य सूचना आयुक्त और तीन आयुक्तों के पास काम का जबरदस्त दबाव है। अपीलें बढ़ने का यह भी मुख्य कारण है। वित्त आयोग, कृषक आयोग, सामान्य गरीब कल्याण आयोग और मानवाधिकार आयोग बिना अध्यक्ष और बिना बेंच के काम कर रहे हैं।
मानवाधिकार आयोगः बिना अध्यक्ष, बिना बेंच
मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष का पद लंबे समय से खाली है। एकमात्र सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि सुनवाई के लिए कम से कम दो सदस्यों की अनिवार्यता है। नतीजतन, आयोग सिर्फ नोटिस जारी करने तक सीमित है। उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में न अध्यक्ष है, न सचिव। सफाई कर्मचारी आयोग में अध्यक्ष है, पर सदस्य नहीं। पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रामकृष्ण कुसमरिया ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूर्णकालिक सचिव और स्टाफ की मांग की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बीच सूचना आयोग में आयुक्त के शेष पदों के लिए एवं बाल आयोग में नियुक्तियों के लिए प्रक्रिया शुरू किए जाने की खबर है।
महिला आयोग: 7 साल से खाली, शिकायतें 'फाइलों में कैद'
मध्य प्रदेश राज्य महिला आयोग आधी आबादी के अधिकार, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए गठित है, लेकिन यह सरकारी उदासीनता का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है। आयोग में 2018 के बाद से न अध्यक्ष है, न उपाध्यक्ष, न सदस्य। 2020 में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्ववर्ती सरकार की नियुक्तियों को असंवैधानिक बताकर निरस्त कर दिया गया। मामला अदालत में पहुंचा और तब से आयोग लगभग ठप पड़ा है। हालांकि अब यह मामला अदालत में भी निपट चुका है। श्यामला हिल्स स्थित महिला आयोग का कार्यालय आज सिर्फ आवेदन लेने का केंद्र बनकर रह गया है। आयोग में 30 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। हर साल औसतन 3,000 नई शिकायतें दर्ज हो रही हैं। एक भी नियमित बेंच न होने के कारण सुनवाई और फैसले शून्य हैं। विडम्बना यह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में मध्य प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में शामिल है, लेकिन जिस संस्था को महिलाओं के लिए त्वरित न्याय का मंच होना था, वह खुद निष्क्रिय ढांचा बन चुकी है। वर्षों से न्याय की आस लेकर पहुंचने वाली महिलाओं को सिर्फ रसीद और आश्वासन मिल रहा है।
एससी-एसटी आयोग: सचिव ही निभा रहे न्याय की भूमिका
अनुसूचित जाति आयोग में मार्च 2022 से अध्यक्ष और दोनों सदस्य पद खाली हैं। अनुसूचित जनजाति आयोग में भी यही हाल है। यहां करीब 900 शिकायतें लंबित हैं। इन आयोगों के पास सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां हैं, लेकिन अध्यक्ष और सदस्यों के बिना इन शक्तियों का उपयोग असंभव है। सचिव स्तर पर ही आवेदन लेकर जिलों को भेजना ही 'न्याय प्रक्रिया' बन गया है।
कांग्रेस का हमला
प्रदेश में कुल 20 आयोग हैं। इनमें 8 अध्यक्ष, 2 उपाध्यक्ष, 16 सदस्य और 4 सदस्य सचिव, कुल 30 नियुक्तियों से पूरा तंत्र दोबारा खड़ा किया जा सकता है। बावजूद इसके वर्षों से राजनीतिक और प्रशासनिक चुप्पी बनी हुई है। सवाल है कि जो आयोग महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए 'आखिरी उम्मीद' थे, वे आज खुद सिस्टम की अनदेखी के शिकार हैं। जब महिला आयोग में 30 हजार मामले धूल खा रहे हों, तो सवाल सिर्फ प्रशासन का नहीं, सरकार की संवेदनशीलता का है।
आयोगों में नियुक्तियां कब होंगी, इस बारे में शासन की तरफ से कोई भी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। उधर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले पर सरकार की आलोचना की है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का कहना है, "तमाम आयोग निष्क्रिय हैं। सरकार जानबूझकर नियुक्तियां नहीं कर रही। ये संवैधानिक संस्थाएं सिर्फ नाम की रह गई हैं। पीड़ितों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं। सरकार को तुरंत निष्पक्ष लोगों की नियुक्तियां करनी चाहिए।"