किसी भी लापरवाही या हादसे में एक जान का जाना भी असहनीय पीड़ा देता है। यह दर्द वही परिवार समझ सकता है, जिसने अपनों को खोया हो। भागीरथपुरा में यह पीड़ा एक-दो नहीं, बल्कि 18 जानों तक पहुंच चुकी है। अनधिकृत आंकड़ा 20 तक बताया जा रहा है। इसलिए यह दुख केवल एक मोहल्ले का नहीं, बल्कि पूरे इंदौर का सामूहिक शोक है। शहर, प्रदेश, देश और विदेश तक से संवेदनाएं, आक्रोश और शर्मिंदगी के भाव प्रकट हुए हैं। साथ ही इस कलंक से उबरने के लिए सार्थक प्रयासों की मांग भी उठ रही है।
लेकिन इसी बीच, 10 दिन की चुप्पी के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की ‘मातमपुर्सी’ राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई है। सवाल स्वाभाविक है कि क्या दिग्विजय सिंह को भागीरथपुरा की मौतों के लिए फुर्सत नहीं मिली, या फिर उन्होंने इस त्रासदी को राजनीतिक गुणा-भाग के तराजू पर तौलकर अनदेखा कर दिया?
राजनीति में हादसों के बाद शोक जताना अब एक स्थापित चलन बन चुका है। शायद ही कोई दल या नेता इससे अछूता हो। लेकिन जब संवेदनाएं मानसिकता और राजनीतिक स्वार्थ से छनकर आती दिखें, तब संदेह पैदा होता है। इस मामले में शासन, प्रशासन, नगर सरकार, राज्य सरकार और यहां तक कि केंद्र सरकार ने भी पहले दिन से सक्रियता दिखाई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं 31 दिसंबर को इंदौर पहुंचे, पीड़ितों से मिले, लापरवाही स्वीकार की गई और प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई।
इसके उलट कांग्रेस इस पूरे मामले में शुरुआत से ही असमंजस में दिखी। खासकर दिग्विजय सिंह की भूमिका पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि वे सामान्यतः छोटे से छोटे विवाद पर भी पहले दिन से मैदान में उतरते रहे हैं। लेकिन भागीरथपुरा जैसे भयावह हादसे में वे 11 दिन तक मौन रहे। 8 जनवरी को उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर न्यायिक जांच, मुआवजे की सीमाएं और जिम्मेदारी तय करने की बात कही।
उन्होंने लिखा- कुछ ट्रांसफर और मुआवजे से शहर का कलंक नहीं धुलता मैं इस हादसे की न्यायिक जांच की मांग करता हूं। पब्लिक के सामने सुनवाई हो और हाईकोर्ट के सिटिंग जज से इसकी जांच कराई जाए। मौत के मुआवजे से जिंदगी नहीं लौटती। गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय जिम्मेदारी तय हो और दोषियों को दंडित किया जाए।”
लेकिन इंदौर की गलियों में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि ‘राजाजी’ यह चिंता जताने में इतनी देर क्यों कर दी?
कांग्रेस के भीतर भी इसे लेकर बेचैनी रही। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने मौके पर मोर्चा संभाला और साफ कहा कि दिग्विजय सिंह को अब तक आ जाना चाहिए था। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रतिपक्ष नेता उमंग सिंघार सड़क पर उतरे, वार्डों में गए और जल के नमूने जुटाए। इसके बाद अचानक दिग्विजय सिंह की पोस्ट सामने आई, जो कहीं न कहीं अपनी ही पार्टी के सक्रिय नेताओं को काउंटर करती प्रतीत हुई।
निष्कर्ष यही है कि भागीरथपुरा मामले में 11वें दिन आई दिग्विजय सिंह की सक्रियता ने संवेदना से ज्यादा संदेह को जन्म दिया है। सवाल यह नहीं कि उन्होंने क्या कहा, सवाल यह है कि वे इतने दिन कहां थे। क्या इसलिए कि मृतकों में कोई मुस्लिम नहीं था? यदि यही हादसा किसी मुस्लिम-बहुल इलाके में होता, तो क्या दिग्विजय सिंह स्थायी धरने और अनशन पर नहीं बैठ जाते? यही प्रश्न इस पूरी ‘मातमपुर्सी’ को राजनीति के कठघरे में खड़ा करता है।