‘संघ कार्य के अनुकरणीय शिल्पी थे शरद जी’

Update: 2026-01-31 03:53 GMT

शरद स्मृति व्याख्यान में मुख्य वक्ता अखिल भारतीय सह-प्रचारक प्रमुख अरुण जैन ने सुनाए भावुक कर देने वाले संस्मरण

कार्यकर्ता का निर्माण हो या शाखाओं का विस्तार, शरद जी हर मामले में एक अनुकरणीय मिसाल स्थापित करते थे। वे रोग को पकड़ने और उसे दुरुस्त करने में माहिर थे। अर्चना प्रकाशन के सूत्रधार एवं मध्य भारत के पूर्व प्रांत प्रचारक स्व. शरदचंद्र मेहरोत्रा को याद करते हुए ये उदगार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह-प्रचारक प्रमुख अरुण जैन ने व्यक्त किए। वे शुक्रवार को मानस भवन में आयोजित शरद स्मृति व्याख्यान समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्यभारत प्रांत के प्रांत संघचालक अशोक पांडेय की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में अर्चना प्रकाशन के अध्यक्ष लाजपत आहुजा भी मंचासीन रहे।

अरुण जैन ने कहा कि शाखा लगाने में कितना परिश्रम लगता है और इसके लिए सतत प्रक्रिया अपनानी होती है, यह शरद जी ने अपने व्यवहार से कार्यकर्ताओं को सिखाया। संघ की शाखाएं बढ़ें, लेकिन उनकी गुणवत्ता भी बनी रहे, शरद जी का हमेशा यही प्रयास रहता था। वे संघ कार्य के कुशल शिल्पी थे। एक-एक कार्यकर्ता को गढ़ना और उसका ध्यान रखना, शरद जी की विशेष कुशलता थी।

बिरला नगर शाखा और मूसलाधार बरसात

अरुण जैन ने ग्वालियर का एक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि एक बार शरद जी को बिरला नगर की एक शाखा पर सुबह जाना था। तय कार्यक्रम से पहले मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। सभी ने सोचा कि अब शाखा पर जाना संभव नहीं होगा, लेकिन शरद जी ने स्पष्ट कहा कि जब सूचना दी गई है तो हमें जाना चाहिए।

किसी तरह सभी लोग शाखा के लिए निकल पड़े। संघ स्थान तक जाने का रास्ता पानी से भरा हुआ था। भारी बारिश के बीच जब वे वहां पहुंचे, तो करीब 30-35 तरुण स्वयंसेवकों ने ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ के नारे लगाते हुए उनका स्वागत किया। शरद जी का यह अनुशासन और प्रतिबद्धता आने वाले संघ प्रचारकों के लिए एक मिसाल बन गई।

शिवपुरी और ग्वालियर के आवासीय शिक्षा केंद्र शरद जी की देन

अरुण जैन ने कहा कि जब शरद जी मध्यभारत में प्रचारक होकर आए, तो संघ कार्य को नया आयाम मिला। उनके प्रयासों से शिवपुरी और ग्वालियर में आवासीय विद्यालय शुरू हुए। गोविंदनगर में शिक्षा और सेवा का जो प्रकल्प आज दिखाई देता है, उसकी नींव में शरद जी का योगदान रहा। वे धुन के पक्के थे। जिस काम की ठान लेते, उसे पूरा करके ही मानते थे। वे अत्यंत व्यवहारिक थे और धरातल पर कार्य करने वाले अभ्यासी थे।

देवपुत्र को राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित किया

अरुण जैन ने बताया कि साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय विचारों को स्थान दिलाने के उद्देश्य से शरद जी ने अर्चना प्रकाशन की नींव रखी। इसी प्रकार देवपुत्र पत्रिका को वृहद स्वरूप देने का कार्य भी उन्होंने किया। शुरुआत में देवपुत्र पत्रिका ग्वालियर से प्रकाशित होती थी, जिसे बाद में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित किया जाने लगा। आज देवपुत्र देश की सबसे अधिक प्रसार संख्या वाली बाल पत्रिका बन चुकी है।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रांत संघचालक अशोक पांडेय ने कहा कि किसी भी महापुरुष को याद कर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते। वे दीपस्तंभ होते हैं, जो हमें मार्ग दिखाते हैं। शरद जी अपने अंतिम समय तक देश और समाज की चिंता करते रहे। अपने ध्येय के लिए पूर्णतः समर्पित शरद जी का जीवन हम सबके लिए अनुकरणीय है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अर्चना प्रकाशन के निदेशक ओमप्रकाश गुप्ता ने प्रकाशन की स्थापना की पृष्ठभूमि और वर्तमान गतिविधियों की जानकारी दी। आभार ज्ञापन अरुण उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम में शहर के प्रबुद्धजन, लेखक, शिक्षाविद, शोधार्थी और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

इन पुस्तकों का हुआ विमोचन

कार्यक्रम के दौरान अर्चना प्रकाशन न्यास की वार्षिक स्मारिका ‘शताब्दी के निहितार्थ’ का लोकार्पण किया गया, जिसका संपादन प्रो. उमेश कुमार सिंह ने किया है। इसके साथ ही डॉ. विकास दवे की भारत का जय घोष-वंदे मातरम्, लाजपत आहुजा की धर्म की ढाल- गुरु गोविंद बहादुर तथा रमेश शर्मा की भगवान बिरसा मुंडा पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

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