'स्व' का जागरण होने पर राष्ट्र की सामूहिक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है: आर्लेकर
देश के प्रतिष्ठित वैचारिक और साहित्यिक आयोजन नर्मदा साहित्य मंथन के पांचवें सोपान का शुभारंभ
देश के प्रतिष्ठित वैचारिक और साहित्यिक आयोजन नर्मदा साहित्य मंथन के पांचवें सोपान का शुभारंभ शुक्रवार को देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के तक्षशिला परिसर स्थित मुख्य ऑडिटोरियम में गरिमामय वातावरण में हुआ। मां नर्मदा के पावन जल के मंगल प्रवेश और विधिवत पूजन के साथ तीन दिवसीय इस वैचारिक मंचन का श्रीगणेश हुआ। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि केरल के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर रहे। इस अवसर पर पुस्तक मेला और भव्य प्रदर्शनी भी लगाई गई, जो साहित्य, संस्कृति और भारतीय चिंतन की समृद्ध परंपरा को प्रदर्शित करती है।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री आर्लेकर ने स्वबोध को भारत के पुनरुत्थान का मूल मंत्र बताया। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति और समाज में 'स्व' का जागरण होता है, तब राष्ट्र की सामूहिक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि पहले आतंकी घटनाओं पर हमारी प्रतिक्रिया केवल शोक तक सीमित रहती थी, लेकिन आज भारत निर्णायक उत्तर दे रहा है। यह परिवर्तन स्वबोध का प्रत्यक्ष उदाहरण है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत को फिर से 'सोने की चिड़िया' बनाने की बजाय 'सोने का शेर' बनाना होगा। सोने की चिड़िया बनने पर भारत बार-बार लूटा गया, जबकि सोने का शेर आत्मरक्षा और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि स्वबोध के बिना न तो आत्मनिर्भर भारत की कल्पना संभव है और न ही विकसित भारत का सपना साकार हो सकता है।
स्वबोध से बदले परिवार और समाज
राज्यपाल ने भारतीय परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलावों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विदेशी शिक्षा और जीवनशैली की अंधी नकल के कारण हमने अपनी भाषा, संस्कृति और पारिवारिक संबंधों को कमजोर किया है। जब 'मा' सम्मी और 'पिताजी' 'डैडी' बन जाते हैं, तब केवल शब्द नहीं बदलते, बल्कि संबंधों की आत्मीयता भी प्रभावित होती है। उन्होंने स्वभाषा, स्वदेशी और स्वसंस्कृति को अपनाने का आह्वान किया और कहा कि स्वबोध की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए, तभी समाज और राष्ट्र सशक्त होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत से विश्व को बड़ी अपेक्षाएं थीं, लेकिन हम अपनी मौलिक दृष्टि के साथ विश्व के सामने स्वयं को प्रस्तुत नहीं कर सके। इसका कारण स्वबोध का विस्मरण रहा। अब समय आ गया है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़कर समग्र विकास की दिशा में आगे बढ़े।
'हम' की भारतीय अवधारणा
'भविष्य का भारत और हम' विषय पर आयोजित सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र संघचालक डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना ने संविधान की प्रस्तावना में निहित 'हम' शब्द की भारतीय अवधारणा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज किसी अनुबंध या स्वार्थ से नहीं, बल्कि एकात्मता के भाव से जुड़ा है। भारत माता हमारे लिए विकल्प नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। उन्होंने कहा कि भारत की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वह समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए भी अपनी परंपराओं को सुरक्षित रख सकता है। युवाओं की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि युवा ही विरासत और परंपरा के वास्तविक संवाहक हैं। आज का युवा सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र है, इसलिए उस पर यह जिम्मेदारी भी अधिक है कि वह शिक्षा, न्याय, प्रशासन और संविधान को भारतीय दृष्टि से समझे और आगे बढ़ाए।
भारत की असली पहचान उसके गांवों से: महाजन
द्वितीय सत्र में दीनदयाल शोध संस्थान के प्रमुख श्री अभय महाजन ने कहा कि भारत की असली पहचान उसके गांवों से है। गांवों के विकास के बिना भारत के उदय की कल्पना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि गांवों को संस्कारवान, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाना होगा। ग्रामोदय की सफलता सामाजिक समरसता, रोजगार और स्वास्थ्य से जुड़ी है। उन्होंने नानाजी देशमुख के विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि हमें अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीने की भावना विकसित करनी होगी।
शब्दों की शक्ति और देवनागरी की महिमा
तृतीय सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार बुद्धिनाथ मिश्र ने शब्दों की शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शब्द केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और चेतना का आधार हैं। उन्होंने देवनागरी लिपि की श्रेष्ठता बताते हुए कहा कि इसके प्रत्येक अक्षर का आध्यात्मिक महत्व है। भाषा और लिपि का सम्मान ही राष्ट्रीय चेतना को सशक्त करता है।
कर्तव्यबोध से सशक्त युवा
चतुर्थ सत्र में अध्येता अनुराग शर्मा ने युवाओं से अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति सजग रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि चरित्र, अनुशासन, सेवा भाव और देशभक्ति से युक्त युवा ही आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकते हैं। युवाओं को भारतीय महापुरुषों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
अयोध्या में भारत की प्राण-प्रतिष्ठा
पंचम सत्र में हनुमत पीठ अयोध्या के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी महाराज ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण है। राम भारतीय धर्म और संस्कृति के मूल हैं और रामचरित मानस विश्व कल्याण का मार्गदर्शक ग्रंथ है।
कार्यक्रम में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. राकेश सिंचाई, विश्व संवाद केंद्र मालवा के अध्यक्ष दिनेश गुप्ता, नर्मदा साहित्य मंथन के संयोजक श्रीरंग पेंढारकर सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी, साहित्य प्रेमी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। तीन दिवसीय नर्मदा साहित्य मंथन भारतीय चिंतन, संस्कृति और राष्ट्रबोध के विमर्श को नई दिशा देने का सशक्त माध्यम बनता दिख रहा है।