मेरे जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रवेश पिता के अनुशासित जीवन और मां की मीठी डांट से हुआ
रूपनारायण सिन्हा
संघ कार्य के 100: छत्तीसगढ़ योग आयोग, अध्यक्ष, रूपनारायण सिन्हा बताते हैं, जैसे ही मैने 18 वर्ष की आयु में कदम रखा, पिताजी ने मुझे संघ का विधिवत प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया। उनका मानना था कि एक बेहतर इंसान बनने के लिए संघ के सस्कार अनिवार्य है। मैंने तीनों वर्षों का प्रशिक्षण पूर्ण किया। मेरे जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ 1980 में आया, जब नागपुर में तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण के दौरान मुझे भाऊ राव देवरस को सुनने का अवसर मिला। उनकी वाणी में वह ओज था कि 24 वर्ष की अल्पायु में ही मैंने स्वयं को राष्ट्र कार्य के लिए समर्पित कर दिया और संघ का प्रचारक बन गया। प्रचारक जीवन की कठिन डगर पर जब भी थकान महसूस होती, पिताजी का मुस्कराता चेहरा और मां का वह संकल्पित व्यवहार मेरी ऊर्जा बन जाता था। घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर निकलना आसान नहीं था, लेकिन संस्कारों की नीव इतनी गहरी थी कि संकोच का कोई स्थान ही नहीं बचा।
पिता का संकल्प और मेरा समर्पण
मेरे जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रवेश किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि घर की दहलीज से हुआ। मेरे पिताजी स्वयं एक निष्ठावान स्वयंसेवक थे। उनकी अनुशासित दिनचर्या और निस्वार्थ व्यवहार ही मेरी पहली प्रेरणा बने। माताजी का योगदान भी उतना ही प्रखर था। वे मुझे शाखा जाने के लिए इस कदर प्रेरित करती थीं कि कभी-कभी शाखा न जाने पर भोजन न देने की मीठी डांट भी देती थीं। आज समझ में आता है कि वह दंड नहीं, बल्कि अपने पुत्र के भीतर राष्ट्र के प्रति जागरूकता जगाने का एक ममतामयी प्रयास था। उनकी उस डांट ने मुझे सिखाया कि राष्ट्र धर्म का पालन व्यक्तिगत सुखों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मां के हाथों परोसा गया वह भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं करता था, बल्कि उसमें संघ के संस्कारों की मिठास भी धुली होती थी।
संघ और सनातन- एक ही सिक्के के दो पहलू
मेरे अनुभव में संघ और सनातन एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। सनातन को केवल पढ़ा नहीं जाता. उसे जिया जाता है- अपने चरित्र, पवित्रता और शुचिता के माध्यम से। संघ भी ठीक यहीं करता है। वह व्यक्ति निर्माण करता है। वह मनुष्य को अहंकार से शून्य कर समाज के लिए पूर्ण समर्पित होने का साहस देता है। संघ की कार्यपद्धति लोकमंगल की वह धारा है जो विना किसी शोर के समाज के अंतिम छोर तक पहुंचती है। जिस प्रकार जल अपनी सह खुद बना लेता है, वैसे ही संघ ने भी 100 वर्षों की यात्रा में हर बाधा को पार किया है। संघ को बाहर से समझाना कठिन है, इसके वास्तविक भाव को समझने के लिए इससे जुड़ना और इसकी पवित्रता को अनुभव करना आवश्यक है। यह संगठन नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है।
कठिनाइयां और अडिग विश्वास
सिन्हा बताते हैं कि वह दौर भी आया, जब संघ पर प्रतिबंध लगा। मैं उस समय दसवीं का छात्र था और पिताजी को जेल भेज दिया गया था। जेल में जब मैं उनसे मिलने जाता तो मुझे लगा था कि शायद वे व्यथित होंगे, लेकिन उनके शब्द थे- राष्ट्र सर्वोपरि है, परिवार गौण है। उनके इन शब्दों ने मेरे मन को और अधिक दृढ़ कर दिया। किशोरावस्था की उन स्मृतियों ने मुझे सिखाया कि विचारधारा के लिए कष्ट सहना तपस्या है, पराजय नहीं। उन्हीं कठिन संघर्षों का फल है कि आज मुझे गर्व महसूस होता है कि मेरी तीसरी पीढ़ी (मेरे दोनों पुत्र) भी इसी राष्ट्र सेवा के मार्ग पर अग्रसर है। हमारे घर में स्व से पहले राष्ट्र की जो परंपरा शुरू हुई थी, वह आज भी अखंड ज्योति की तरह जल रही है।
संगठन में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से कुछ भी कहता नहीं, केवल कार्य करता जाता है। संघ के स्वयंसेवक आपस में कुछ नहीं कहते बोलते हैं। उनके अंतःकरण, उनकी भाषा हृदय की भाषा होती है। और वे मूक रहते हुए, कार्य कर सकते हैं।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार