भारत और बेनेजुएला एक-दूसरे से बहुत अलग देश है। दोनों के बीच भौगोलिक दूरी लगभग 14,250 किलोमीटर है। कराकास-दक्षिण अमेरिका की कभी जीवंत मानी जाने वाली राजधानी आज वैश्विक घटनाक्रम के केंद्र में है। वहां जो कुछ अचानक और चौकाने वाला हुआ वह केवल वेनेजुएला की कान्ने नहीं, बरिवा उसमें भारत और शेष विश्व के लिए गंभीर सवक छिपे हुए है।
पहला सबक 'लोकतंत्र' 'मानवाधिकार', 'अंतसाष्ट्रीय कानून' और 'सुशासन' जैसे चमकदार शब्द वैश्विक राजनति में अक्सर खोखले साबित होते हैं। व्यवहार में असहजता और कड़गी सच्चाई को उकने का औजार बन जाते हैं। भ्रष्ट और स्वार्थी नेतृत्व इन्हीं आदानादी नारों की आड़ में अपनी विफलताओं को छिपाता है। बाद में नव-औपनिवेशिक ताकते इनों हथियार की तरह इस्तेमाल करके अपने विस्तारवादी अर्थिक और राजनीतिक हितों को साधने का उपक्रम बनाते हैं। वेनेजुएला पर अमेरिका का औचक सैन्य हमाला कोई अपवाद नहीं है। यह उसी शाश्वत सिद्धांत को पुनस्थापित करता है, जो सदियों से वैश्विक राजनीति को संचालित करता आया है- 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस'। स्वयंभू 'सभ्य समाज का हाल यह है कि वह केवल शांति, संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर उपदेश देता है, लेकिन शक्ति के इस नग्न प्रदर्शन को रोकने की क्षमता नहीं रखता।
दूसरा गरीबी मिटाने और समृद्धि लाने का कोई लघु-मार्ग नहीं होता। इसके लिए प्रतिस्पधां कठोर परिश्रम और उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था अनिवार्य है। जो नीतियां संपत्ति सूजन करने जटिल के बजाय केवल संपत्ति के पुनर्वितरण को प्राथमिकता दें, वे अंततः देशों को आर्थिक तबाही और राजनीतिक पराधीनता की और ले जाती हैं। उत्पादन की उपेक्षा करके केवल पुनर्वितरण करना इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि मामास्तविक लोकतंत्र को धीरे-धरे, कानूनी रात से आर्थिक अराजकता की और धकेल देती है। जब असमानता को सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं का परिणाम मानने के बजाय केवल 'लूट' और भ्रष्टाचार वा प्रभाग बताया जाने लगता है, ती धन कमान हे नैतिक अपराध बना दिया जाता है। अक्सर वितीय अनुशासन की बात करने कते अभिजात्य कहलाते घोषित कर दिया जाता है। ऐसे माशील में उत्पादकता बढ़ाने के बजाय पुनर्वितरण आधारित राजनीति का मकसद कैसे भी सत्ता को पाना रह जाता है।
तीसरा सबक इतिहास से जुड़ा है। बीसवीं सदी की शुरुआत में यह माना गया कि दुनिया अब बर्ष युद्ध से ऊपर उठ चुकी है। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने इस भ्रम को तोड़ दिया। तब वैश्विक शांति के लिए 'राष्ट्र संप (1920-46) बना, जो पहले से अधिक विनाशकारी दूसरे विश्व युद्ध (1939-45) को नहीं रोक पाया। तब इस उम्मीद के साथ 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई कि भविष्य में कोई युद्ध नहीं होगा। लेकिन क्या यह उद्देश्य पूरा हुआ? चार प्रत्यक्ष युद्धझे में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ आतंकवाद की नीति अपनाना 1950-53 का कोरियाई संघर्ष 1948-49 और 1967 के इजराइल अस्थ युद्ध 1956 की स्वेज लदर्शी अमेरिका का वियतनाम पर हमला (1955-1975); 1962 का भारत-चीन युद्ध वर्ष 1978-89 तक चला सोवियत अफगान संपर्क 1989 का पनमा युद्ध दशकों से जायेगाजा संकट 1991 और 2003-11 का इराक बुद्ध: 2001-21 तक चला अफगानिस्कन युद्ध, 2022 से जारी रूस-मुक्रेन युद्ध, इजराइल आआधी सादी पहले भारत में जो कुछ भयावह हुआ, उससे यह सकुशल वापस लौट आया है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थ है लेकिन वेनेजुएला नहीं बच पाया। इस लैटिन अमेरिकी देश का पतन न तो प्रतिबंधों से शुरू हुआ और न ही उमास-ईरान-अमेरिका टकराप अब वेनेजुएला अमेरिका का हमला और दशकों से हजारों जिहादी हमले के सभी संयुका राष्ट्र की प्रासंगिकता और 'शक्ति' पर गंभीर सवाल खड़े करते है। चौथा सबक सभी देशों में ऐसे नेता होते हैं, जो सत्ता की अंधी दौड़ में जनता को असंभव सपने दिखाते हैं और उनकी भावनाओं से खेलकर सत्ता में आ जाते है।
कुर्सी मिलने के बाद वे आमरिक बादे पूरे नहीं कर पाते, जिससे धीरे-धीरे या अचानक निदेगी तानात में बदल जाते हैं। वेनेजुएला ऐसे ही नेताओं का शिकार रहा है, जिनकी सनको नीतियों ने देश को कर दियाः स्वतंत्रता के बाद भारत भी एक समय इसका शिकार सहा था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 के चुराव में गरीबी हटाओं का गहरा दिया, पूरे विक को 'पूंजीपतियों का एजेंट' बताकर भारी बहुमत से जीत हासिल की। उनको नैलियां उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के बजाय पुनर्वितरण और राष्ट्रीयकरण पर केंद्रित रहीं। इसमें नतीजा यह हुआ कि कालांतर में दूध वनस्पति पी गेहूं चावल जैसी अवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो गई और कालाबाजारी ने व्यव जन असंतोष को जन्म दिया। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने इंदिराजी का चुनाव रद्द कर दिया। इसपर उनहनि देश पर आपातकाल थोप दिया, जो मार्च 1977 तक जी रहा। की सकसे इसकी जड़े उस आकर्षक, लेकिन पालक, विवर में मिलती है जिसमें मान्यता थी कि केवल पुनर्वितरण ही उत्पादन का विकल्प हो सकता है। 1999-2013 तक बेनेजुएला के राष्ट्रपति रहे शवेने खुद को 'मसोता के रूप में पेश किया। उन्हेंने असमानता, पूंजीवादियों सायद और राष्ट्रीय स्तंगदा को लूट की बातें की। उनका तर्क था कि तेल से होने वाली आप सिर्फ जनता की है, न कि निजी कंपनियों या वैश्विक रपन्नतिक स्वदा की। देखते ही देखते हा से अधिक निजी कंपनियां जब्त कर ली गई। कीमत-मुनाफे बाँदर सरकारी नियंत्रण हो गय। अत्यधिक मुद्राएं उभरी गई. जिससे बेला महंगाई बढ़ी। निवेश के बजाय तेल संपदा का केवल उपभोग किया जाने लगा। वेनेजुएला में जीवनस्तर 74% गिर गया, आपूर्ति पर गई और भुखमरी बड़ गई।
पिछले कुछ समय से कहीग के शीर्ष नेता और वर्तनान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांभी पुनर्वितरण की मांग को भारत कर रहे है जिसमें अक्सर 'जितनी आचार्य, उतना हक नामक जुमला खेड़ा जाता है। कोई भी समाज सिर्फ पुनर्वितरण से समृद्ध नहीं हुआ है। सफल देश विभिन्न योजनाओं से मुनाके का पुनर्वितरण करते है। इंदिराजी और चावेज ने पुनर्वितरण के नाम पर आय के स्रोत को हट कर दिया था। राहुल भी सत्ता के लिए इसे दोहराना चाहते है।
इस पृष्ठभूमि में वेनेजुएला एक चेतावनी है। के देश लोकलुभावन वादों और पहचान आधारित पुनर्वितरण के जाल में फांसते हैं, वे अंततः पतन के रास्ते पर चल पड़ते है।