राष्ट्र निर्माण के 100 वर्ष: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यक्ति निर्माण से समाज और राष्ट्र उन्नति की यात्रा

डॉ. आलोक कुमार द्विवेदी

Update: 2026-01-08 04:20 GMT

किसी भी राष्ट्र की मूल उसकी सांस्कृतिक चेतना होती है और यही उसके आत्मगौरव का बोध भी कराती है। संस्कृति मूल्यों का समुच्चय है जो उस विशेष स्थान और समाज के व्यवहार, आचार विचार, और मनोभावों का जीवंत दर्पण होती है। स्वतन्त्रता व्यक्ति का श्रेष्ठ मूल्य है जिसके बिना वह अपने स्वरूप को न तो समझ सकता है और ना ही उसका प्रकटन ही कर सकता है। भारतवर्ष की अनवरत दासता की मुक्ति हेतु सतत रूप से स्वतन्त्रता का आन्दोलन चलता रहा और भारत के वीर सपूत अपने अप्रतिम बलिदान के लिए हर प्रकार से तत्पर रहे परंतु उसी दौरान जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि भारत कि स्वतन्त्रता का अमृत दिवस निकट आ रहा है तो कुछ मनीषियों का विचार इस महत्वपूर्ण बिंदु कि तरफ गया कि मिलने वाली स्वतन्त्रता का स्वरूप कैसा होगा? क्या स्वतन्त्रता मात्र राजनैतिक स्वतन्त्रता ही होगी? क्या इतना ही भारत जैसे गौरवशाली राष्ट्र के लिए पर्याप्त है या इसके साथ मानसिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता की भी आवश्यकता है।

आदरणीय केशव बलिराम हेडगेवार, एक चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रचिंतकने इसी कालखंड में यह महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। जब तक समाज संगठित, चरित्रवान और सांस्कृतिक रूप से जागरूक नहीं होगा, तब तक स्वतंत्र भारत भी कमजोर ही रहेगा। व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और इसके माध्यम से राष्ट्र उन्नति ही स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ होगा। यही विचार आरएसएस की स्थापना की वैचारिक पृष्ठभूमि बना। भारतीय राष्ट्र-जीवन के आधुनिक इतिहास में यदि किसी संगठन ने बिना सत्ता, बिना चुनाव और बिना सरकारी संरक्षण के समाज के भीतर गहरी वैचारिक और संगठनात्मक पैठ राष्ट्रीय बनाई है, तो वह है स्वयंसेवक संघ। वर्ष 1925 में नागपुर की एक छोटीसी बैठक से प्रारंभ हुआ यह संगठन 2025 में अपनी शताब्दी पूर्ण करते हुए न केवल भारत बल्कि विश्व का सबसे बड़ा स्वैच्छिक, अनुशासित और निरंतर सक्रिय सामाजिक सांस्कृतिक संगठन बन चुका है।

आरएसएस का यह सौ वर्ष का प्रवास केवल एक संस्था का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय समाज के आत्मबोध, पुनर्जागरण और राष्ट्र निर्माण की एक लंबी यात्रा है। 1920 के दशक का भारत गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। एक ओर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन था, जिसने भारत की राजनीतिक सत्ता छीन ली थी, तो दूसरी ओर भारतीय समाज भीतर से विखंडित, आत्महीन और दिशाहीन होता जा रहा था। जातीय विभाजन, सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक हीनताबोध और आक्रामक विभेद आधारित राजनीति राष्ट्रीय एकता को निरन्तर क्षीण करती जा रही थी। 1920 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के निधन के पश्चात् नागपुर में उनके अन्य अनुयायियों की भांति डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जो कि स्वयं कांग्रेस के मेम्बर थे, ने भी महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए कुछ राजनीतिक कार्यक्रमों से असहमति व्यक्त की।

विशेष रूप से खिलाफत आंदोलन के प्रति गांधी का दृष्टिकोण हेडगेवार के लिए गहन चिंता का विषय था। इसके साथ ही यह तथ्य भी उन्हें विचलित करता था कि 'गौ-रक्षा' जैसे सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण विषय को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के औपचारिक एजेंडे में स्थान नहीं दिया गया था। इन कारणों से हेडगेवार, अन्य तिलक अनुयायियों के साथ, गांधी के नेतृत्व से वैचारिक रूप से अलग हो गए। वर्ष 1921 में कटोल और भरतवाड़ा में दिए गए उनके राष्ट्रवादी भाषणों के कारण ब्रिटिश शासन ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया, जिसके अंतर्गत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

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