विश्व हिंदी दिवस आज: ‘वैश्विक मंच पर प्रभुत्व स्थापित करती हिंदी’

डॉ. अशोक कुमार भार्गव

Update: 2026-01-10 04:11 GMT

भारतीय सांस्कृतिक चेतना की समृद्ध विरासत हिंदी न केवल हमारी अस्मिता की पहचान है, वरन् हमारे राष्ट्र की आत्मा भी है। अब हिंदी केवल परस्पर संवाद और संपर्क का माध्यम ही नहीं रही, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी सर्जनात्मकता, जिजीविषा और समावेशिता के कारण अपने प्रभुत्व का निरंतर विस्तार कर रही है। विश्व में ऐसे भी अनेक स्थान हैं, जहां भारतीय मूल के लोग नहीं हैं, फिर भी वहां हिंदी बोली, समझी और पढ़ी जा रही है।

आज विश्व के सभी महाद्वीपों के लगभग 140 से अधिक देशों में हिंदी की स्वीकार्यता में निरंतर वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि विश्व में हिंदी प्रयोक्ताओं की संख्या लगभग 100 करोड़ से अधिक हो गई है, जो संयुक्त राष्ट्र संघ की छह आधिकारिक भाषाओं के कुल वक्ताओं की संख्या से भी कहीं अधिक है।

अब विश्व का मानचित्र बदल गया है। एक समय अंग्रेजों के साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त न होने का जो मिथक था, वह इतिहास बन चुका है। किंतु आज हिंदी के लिए यह गर्व का विषय है कि उसके बोलने, समझने और लिखने वालों का संसार इतना विराट हो गया है कि वहां सूर्य कभी अस्त नहीं होता।

भारतीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की प्रखरता को मुखरता के साथ अभिव्यक्त करने वाली हिंदी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने, प्रवासी भारतीयों में हिंदी के प्रति भावनात्मक संबंध को सुदृढ़ करने तथा विश्व में सकारात्मक वातावरण निर्मित करने के उद्देश्य से 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। यह सम्मेलन हिंदी के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ।

इस सम्मेलन के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए विश्व के विभिन्न देशों में अब तक 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की वर्षगांठ, अर्थात 10 जनवरी 2006 से, तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की पहल पर विश्व हिंदी दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में अधिकृत करने के भारतीय प्रस्ताव को सशक्त बनाना, हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना तथा इसके प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता और अनुराग सृजित करना रहा है।

फलस्वरूप हिंदी न केवल राष्ट्रीय आत्माभिमान का प्रतीक बनी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सांस्कृतिक संवाद, बौद्धिक विमर्श और भारतीय ज्ञान-परंपरा की सशक्त संवाहक भी बनी है। वैश्विक स्तर पर हिंदी की उपादेयता उसकी सरलता, सहजता, तकनीकी सटीकता, संवाद की आत्मीयता और समावेशी प्रकृति के कारण निरंतर बढ़ रही है।

1990 के दशक में जब भारत में उदारीकरण, वैश्वीकरण और औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, तब विश्व की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में आईं। मीडिया नायक रूपर्ट मर्डोक के स्टार चैनल तथा इसी तर्ज पर सोनी जैसे अन्य चैनलों ने भी अंग्रेजी कार्यक्रमों के साथ धूमधाम से भारत में पदार्पण किया। उस समय हिंदी के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न होती दिखाई दी, किंतु शीघ्र ही उन्हें यह बोध हो गया कि भारतीय बाजार तंत्र में अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय उत्पाद बेचने तथा व्यावसायिक और व्यापारिक लाभ अर्जित करने के लिए उपभोक्ताओं को आकर्षित करना है तो हिंदी का उपयोग अनिवार्य है।

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