हरकी पैड़ी में 1916 के कानून का हवाला देकर लगे सूचना पट, अहिंदू का प्रवेश निषेध

हरकी पैड़ी में 1916 के म्यूनिसिपल बायलॉज की जानकारी देने लगे पोस्टर, गंगा सभा ने बताया जागरूकता उद्देश्य।

Update: 2026-01-16 09:30 GMT

हरिद्वार। प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हरकी पैड़ी में इन दिनों लगाए गए कुछ सूचना पट चर्चा में हैं. इन पटों के जरिए 1916 के म्यूनिसिपल बायलॉज की जानकारी श्रद्धालुओं और आगंतुकों तक पहुंचाने की पहल की गई है, घाटों की व्यवस्था देखने वाली संस्था गंगा सभा का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी वर्ग को निशाना बनाना नहीं, बल्कि पुराने कानूनों के बारे में लोगों को जागरूक करना है । हरकी पैड़ी क्षेत्र के प्रवेश द्वारों पर लगाए गए इन बोर्डों में म्यूनिसिपल एक्ट का हवाला देते हुए नियमों का उल्लेख किया गया है ।

गंगा सभा: यह नई व्यवस्था नहीं, पुराना कानून है

गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने स्पष्ट किया कि यह कोई नया नियम लागू करने की कोशिश नहीं है. उन्होंने बताया कि 1916 में बने म्यूनिसिपल बायलॉज हरकी पैड़ी, ब्रह्मकुंड और आसपास के घाटों की धार्मिक मर्यादा, स्वच्छता और व्यवस्था को ध्यान में रखकर बनाए गए थे । उनके अनुसार, समय के साथ इन नियमों की जानकारी आम लोगों तक नहीं पहुंच पाई, जिससे कई बार अनजाने में गैर हिंदुओं द्वारा नियमों का उल्लंघन हो जाता है। इसी भ्रम को दूर करने के लिए सूचना पट लगाए गए हैं ।


श्रद्धालुओं को नियमों की जानकारी देना उद्देश्य

नितिन गौतम का कहना है कि हरिद्वार एक प्राचीन धार्मिक नगरी है, जहां देश-विदेश से करोड़ों सनातनी श्रद्धालु आते हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि लोगों को पहले से यह जानकारी हो कि किन क्षेत्रों में कौन से नियम लागू हैं। गंगा सभा का मानना है कि यदि नियम स्पष्ट रूप से सामने हों तो व्यवस्थाएं बेहतर रहती हैं और किसी तरह की गलतफहमी की स्थिति नहीं बनती । 

कुंभ और बढ़ती भीड़ को देखते हुए जरूरी कदम

गंगा सभा ने यह भी कहा कि भविष्य में कुंभ और अन्य बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। ऐसे में गैर हिंदू पत्रकार-सरकारी अधिकारियों की भी एंट्री हो बैन हो, पुराने कानूनों के प्रभावी पालन से पवित्र स्थलों की गरिमा और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सकती हैं। संस्था का कहना है कि प्रशासन के सहयोग से यदि 1916 के बायलॉज को सही तरीके से लागू किया जाए, तो हरकी पैड़ी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की परंपराएं और मर्यादा लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेंगी। फिलहाल, गंगा सभा की इस पहल को कानून संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।



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